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पुलिस की तर्ज पर PWD में भी होगी रिव्यू DPC?

174 सहायक यंत्रियों की पदोन्नति पर उठे सवाल, शील्ड कवर से लेकर वरिष्ठता और गोपनीय प्रतिवेदन तक विवाद

भोपाल। मध्यप्रदेश पुलिस मुख्यालय द्वारा हाल ही में समीक्षा के बाद 161 पुलिसकर्मियों की पदोन्नतियां निरस्त किए जाने के बाद अब निगाहें लोक निर्माण विभाग की हालिया पदोन्नति सूची पर टिक गई हैं। पुलिस में 78 निरीक्षकों और 83 उपनिरीक्षकों की पदोन्नति विभागीय जांच, दंड और अन्य पात्रता संबंधी कारणों से वापस ली गई है।

ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या लोक निर्माण विभाग भी अपनी 174 सहायक यंत्रियों से कार्यपालन यंत्री बनाए जाने की प्रक्रिया की समीक्षा करेगा?

174 पदोन्नतियों पर सवाल, 70 से अधिक नाम शील्ड कवर में क्यों?

लोक निर्माण विभाग के सूत्रों का दावा है कि हालिया पदोन्नति प्रक्रिया में रिक्तियों की संख्या और पदोन्नत किए गए अधिकारियों की संख्या को लेकर सवाल हैं। सूत्रों के मुताबिक लगभग 125 संभागीय पदों के विरुद्ध 174 सहायक यंत्रियों को कार्यपालन यंत्री बनाया गया है।

सबसे बड़ा सवाल उन अनुभवी इंजीनियरों को लेकर उठ रहा है, जिनकी लंबी सेवा के बावजूद उनके नाम शील्ड कवर में रखे गए। दूसरी ओर 2019 में लोक सेवा आयोग से चयनित कुछ इंजीनियरों को कथित रूप से पदोन्नति का लाभ दिए जाने पर वरिष्ठता, न्यूनतम सेवा अवधि और गोपनीय प्रतिवेदनों के परीक्षण को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

यदि पदोन्नति नियमों में निर्धारित अंतिम वर्ष की गोपनीय चरित्रावली ही विचारणीय थी, तो बाद की अवधि की CR को आधार बनाया गया या नहीं—यह पूरा रिकॉर्ड सार्वजनिक जांच का विषय होना चाहिए।

सवाल सिर्फ प्रमोशन का नहीं, प्रक्रिया की पारदर्शिता का है

विभाग के भीतर आरोप लगाए जा रहे हैं कि कुछ ऐसे इंजीनियरों के विरुद्ध लंबित विभागीय कार्रवाई अथवा जांच को समाप्त कर पदोन्नति का रास्ता साफ किया गया, जबकि कुछ अन्य अधिकारियों को शील्ड कवर में रखकर पदोन्नति से बाहर कर दिया गया। निर्माण भवन में पदस्थ सहायक यंत्री राकेश तिवारी और मध्यप्रदेश सड़क विकास निगम से जुड़े संजीव जैन के मामलों को लेकर भी विभागीय स्तर पर अलग-अलग सवाल उठाए जा रहे हैं। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित रिकॉर्ड की जांच आवश्यक है।

यही वजह है कि अब सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि कौन प्रमोट हुआ और कौन नहीं, बल्कि यह है कि—

क्या सभी अधिकारियों पर समान नियम लागू हुए?
क्या वरिष्ठता सूची और रिक्तियों का सही अनुपात अपनाया गया?
क्या शील्ड कवर के नियम समान रूप से लागू हुए?
क्या विभागीय जांच/दंड वाले अधिकारियों की पात्रता की विधिवत समीक्षा हुई?
और क्या पदोन्नति में विचार की गई CR सभी अधिकारियों के लिए एक समान अवधि की थी?

PWD के सामने अब पुलिस से बड़ा सवाल

पुलिस मुख्यालय ने समीक्षा DPC के जरिए यह संदेश दिया है कि पदोन्नति के बाद भी यदि पात्रता संबंधी गंभीर तथ्य सामने आते हैं तो आदेश की समीक्षा और पदावनति/रिवर्ट की कार्रवाई संभव है। अब यही कसौटी लोक निर्माण विभाग पर भी लागू होती है।

यदि 174 पदोन्नतियों की प्रक्रिया पूरी तरह नियमसम्मत है तो विभाग के पास DPC की कार्यवाही, रिक्त पदों की गणना, वरिष्ठता सूची, शील्ड कवर में रखे गए अधिकारियों के कारण और पदोन्नत अधिकारियों की पात्रता स्पष्ट करने का सबसे बेहतर अवसर है। और यदि जांच में कहीं नियमों का उल्लंघन मिलता है तो रिव्यू DPC कराकर गलत पदोन्नतियों को निरस्त करना ही सुशासन और पारदर्शिता का संदेश होगा।

अब सवाल मुख्यमंत्री और लोक निर्माण विभाग से है_क्या पुलिस की तरह PWD भी अपनी पदोन्नति सूची की समीक्षा करेगा, या 174 पदोन्नतियों पर उठे सवाल फाइलों के नीचे दब जाएंगे?