4290 करोड़ के भोपाल-कानपुर कॉरिडोर की छह महीने में रिटेनिंग वॉल धंसी, टोल वसूली जारी; सवाल सीधे मोहन यादव और PWD मंत्री राकेश सिंह से
भोपाल। मध्य प्रदेश में सड़क, पुल और कॉरिडोर अब विकास की पहचान कम और निर्माण के बाद होने वाली टूट-फूट की खबरों की पहचान ज्यादा बनते जा रहे हैं। भोपाल-कानपुर आर्थिक कॉरिडोर के सागर-शाहगढ़ हिस्से में निर्माण शुरू हुए महज छह महीने के भीतर पठानवली घाटी के पास ओवरब्रिज की रिटेनिंग वॉल का बड़ा हिस्सा धंस जाना इसी गंभीर बीमारी का ताजा उदाहरण है। इसी कॉरिडोर पर पिछले तीन महीनों में रुरावन और इमलिया खेड़ा के बीच भारी साइन बोर्ड गिरने, बीला गांव के पास करीब 50 फीट सड़क बारिश में धंसने और अब पठानवली घाटी में रिटेनिंग वॉल टूटने जैसी घटनाएं सामने आई हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि 4290 करोड़ रुपये की परियोजना में आखिर गुणवत्ता नियंत्रण किस स्तर पर हो रहा है? जिस सड़क पर जनता से टोल वसूला जा रहा है, उसी सड़क पर जगह-जगह निर्माण और डायवर्जन से जुड़े सवाल खड़े हो रहे हैं। रिपोर्ट में NH-934 के सागर-भोपाल और छतरपुर हिस्से में सड़क निर्माण-डायवर्जन के कारण बदहाली तथा टोल वसूली का भी उल्लेख है।
यह केवल एक सड़क की कहानी नहीं है। भोपाल ईस्टर्न बाईपास पर बिलखिरिया के पास करीब 100 मीटर सड़क धंसने और लगभग 30 फीट गहरा गड्ढा बनने की घटना में भी MPRDC की सड़क और रिटेनिंग वॉल की गुणवत्ता पर सवाल उठे थे। अधिकारियों ने जांच की बात कही थी। ग्वालियर में हाल में नई सड़क के धंसने और उसमें कार फंसने की घटना ने भी निर्माण गुणवत्ता पर सवाल खड़े किए हैं।
मंत्री ने कहा था—लापरवाही बर्दाश्त नहीं होगी, तो अब कार्रवाई कहां है?
मध्य प्रदेश के लोक निर्माण विभाग की अपनी वेबसाइट के
अनुसार विभाग सड़क, पुल, ROB और फ्लाईओवर के निर्माण एवं रखरखाव के लिए जिम्मेदार है और वर्तमान में राकेश सिंह लोक निर्माण मंत्री हैं।
विडंबना देखिए_30 जुलाई 2026 को मंत्री राकेश सिंह ने खुद कहा था कि खराब सड़क मिलने पर कार्यपालन यंत्री के खिलाफ कार्रवाई होगी और लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। विधानसभा में भी विभाग ने सड़क निर्माण की गुणवत्ता और दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई की बात कही है।
तो फिर सवाल बिल्कुल सीधा है—अगर लापरवाही बर्दाश्त नहीं होगी तो इन लगातार सामने आ रहे मामलों में जिम्मेदारी किसकी तय हुई?
कितने इंजीनियर निलंबित हुए?
कितने अधिकारियों पर विभागीय कार्रवाई हुई?
कितने ठेकेदारों पर जुर्माना लगा?
कितने ठेके रद्द हुए?
और घटिया निर्माण की कीमत आखिर सरकारी खजाने से क्यों चुकाई जाए?
मुख्यमंत्री जी, क्या गांधीजी के तीन बंदर बनकर बैठी है पूरी व्यवस्था?
यह सवाल अब केवल लोक निर्माण मंत्री से नहीं, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से भी सीधे पूछना जरूरी है। क्योंकि वह पूरे प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था के मुखिया हैं। यदि करोड़ों-अरबों की सड़कें और पुल बनने के कुछ ही महीनों में धंसने, टूटने या बैठने लगें और इसके बावजूद जिम्मेदार अधिकारियों पर निर्णायक कार्रवाई दिखाई न दे, तो जनता यह सवाल पूछने के लिए मजबूर होगी कि आखिर जवाबदेही तय कौन करेगा?
क्या सरकार केवल नई परियोजनाओं के उद्घाटन और विकास के आंकड़े गिनाने तक सीमित रह जाएगी? या यह भी बताएगी कि निर्माण की गुणवत्ता की निगरानी करने वाले अधिकारियों और ठेकेदारों की जवाबदेही कहां है? और यदि मुख्यमंत्री भी इन घटनाओं को देखकर चुप रहते हैं, तो फिर यह सवाल केंद्र सरकार से भी है—क्या मध्य प्रदेश में हजारों करोड़ रुपये की सड़क और इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं की गुणवत्ता की कोई स्वतंत्र निगरानी नहीं होनी चाहिए?
केंद्र सरकार ने राज्य को और राज्य सरकार ने पूरी व्यवस्था को_क्या ठेकेदारों, इंजीनियरों और विभागीय फाइलों के भरोसे छोड़ दिया है? यह कहना अब अनुचित नहीं होगा कि कॉरिडोर/ सड़क/ब्रिज के धंसने के पीछे भ्रष्टाचार है। जब एक के बाद एक नई परियोजनाओं में गुणवत्ता संबंधी घटनाएं सामने आती हैं, तो स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट और जवाबदेही की मांग को नजरअंदाज करना भी जनता के साथ अन्याय है।
अब समय आ गया है कि मुख्यमंत्री और PWD मंत्री केवल “लापरवाही बर्दाश्त नहीं होगी” जैसे बयान देने के बजाय एक सार्वजनिक जवाब दें—4290 करोड़ के इस कॉरिडोर में गुणवत्ता की जिम्मेदारी किसकी थी? रिटेनिंग वॉल क्यों धंसी? दोषी कौन है? और कार्रवाई कब होगी?
क्योंकि जनता को उद्घाटन के फीते नहीं, ऐसी सड़कें चाहिए जो पहली बारिश और पहले बड़े दबाव में ही न धंसें।और अगर करोड़ों की परियोजनाएं बनने के साथ ही टूटने लगें, तो सवाल सड़क का नहीं रह जाता—सवाल पूरे शासन तंत्र की विश्वसनीयता का बन जाता है।
