क्या सत्ता के साथ प्रशासनिक तंत्र का भी हो रहा है ‘यादवीकरण’?
भोपाल। मध्यप्रदेश में डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार को अब आम जनता के एक ऐसे सवाल का सामना करना पड़ रहा है, जिसे नजरअंदाज करना आने वाले समय में राजनीतिक रूप से भारी पड़ सकता है_क्या सरकार की प्रशासनिक नियुक्तियों में योग्यता और व्यापक प्रशासनिक संतुलन से ज्यादा मुख्यमंत्री के सजातीय और करीबी माने जाने वाले अधिकारियों को प्राथमिकता मिल रही है?
विपक्ष के आरोपों से अलग यदि पिछले कुछ समय की नियुक्तियों को देखें तो यादव उपनाम वाले अधिकारियों की महत्वपूर्ण पदों पर मौजूदगी आमजन एवं प्रशासनिक गलियारों में जरूर चर्चा का विषय बन रही है।
शीर्ष और विभिन्न विभागों में कार्यरत प्रमुख यादव अधिकारी (संक्षिप्त विवरण)
मध्य प्रदेश शासन के विभिन्न विभागों में कई वरिष्ठ और महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों पर ‘यादव’ उपनाम (सरनेम) वाले भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) और भारतीय पुलिस सेवा (IPS) के अधिकारी पदस्थ हैं। इसी तरह राज्य प्रशासनिक सेवा एवं निर्माण एजेंसियों में मुख्य पदों पर भारी तादात में इनकी पदस्थापनाऐं है।
भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) अधिकारी
• संदीप यादव (IAS – 2000 बैच): ये मध्य प्रदेश शासन के एक बेहद वरिष्ठ और कुशल अधिकारी हैं। वर्तमान में यह जल संसाधन विभाग के प्रमुख सचिव (Principal Secretary) के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। इसके साथ ही इनके पास एनआरआई विभाग (NRI Department) का अतिरिक्त प्रभार भी है।
• भरत यादव (IAS – 2008 बैच): इन्हें प्रशासनिक सुधारों के लिए जाना जाता है। ये पूर्व में मुख्यमंत्री सचिवालय में सचिव भी रह चुके हैं। वर्तमान में ये एम.पी. रोड डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (M.P. Road Development Corp) के प्रबंध निदेशक (Managing Director) के पद पर कार्यरत हैं।
• दिलीप कुमार यादव (IAS – 2014 बैच): प्रशासनिक फेरबदल के तहत इन्हें इंदौर नगर निगम (Indore Municipal Corporation) का कमिश्नर नियुक्त किया गया है। इसके अतिरिक्त इनके पास इंदौर मेट्रो रेल के प्रबंध निदेशक का भी जिम्मा है।
• प्रीति यादव (IAS): यह भी राज्य में सक्रीय प्रशासनिक सेवा की अधिकारी हैं और इन्हें आगर-मालवा (Agar Malwa) जिले के कलेक्टर (District Collector) पद की कमान सौंपी गई है।
• प्रदीप यादव (IAS – 2015 बैच): यह मध्य प्रदेश कैडर के एक युवा आईएएस अधिकारी हैं जो डिजिटल गवर्नेंस पहलों के लिए जाने जाते हैं।
• शिवम यादव (IAS – 2023 बैच): ये मध्य प्रदेश कैडर के नवनियुक्त युवा अधिकारी हैं जो वर्तमान में देवास जिले के बागली में एसडीओ (राजस्व) के पद पर तैनात हैं। [9]
भारतीय पुलिस सेवा (IPS) अधिकारी
• अंशुमन यादव (IPS – 1998 बैच): यह मध्य प्रदेश पुलिस के बेहद वरिष्ठ अधिकारी हैं। इन्हें अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (ADG), इंटेलिजेंस का महत्वपूर्ण प्रभार दिया गया है, साथ ही ये खेल एवं युवा कल्याण विभाग के प्रमुख दायित्वों से भी जुड़े रहे हैं।
• समीर यादव (SPS/IPS): इन्हें राज्य पुलिस सेवा से सुरक्षा और कानून व्यवस्था का लंबा अनुभव है और यह मुख्यमंत्री (CM) की सुरक्षा व्यवस्था के इन-चार्ज (In-charge of CM’s Security) के रूप में तैनात रहे हैं।
• विजय यादव (IPS – 1987 बैच): इन्होंने पूर्व में मध्य प्रदेश के लोक अभियोजन (Director Public Prosecution) के संचालक/महानिदेशक के रूप में अपनी सेवाएं दी हैं। *असित यादव -ग्वालियर महानिरीक्षक (प्रभारी) व उपमहानिरीक्षक। *धर्मवीर सिंह यादव-पुलिस अधीक्षक (SSP) ग्वालियर सहित अन्य..।
एक तरफ नियुक्तियां, दूसरी तरफ प्रशासनिक अस्थिरता
सवाल केवल यादव उपनाम वाले अधिकारियों की नियुक्ति का ही नहीं है बल्कि असली सवाल यह भी है कि क्या मध्यप्रदेश की प्रशासनिक मशीनरी को स्थिर, जवाबदेह और प्रदर्शन आधारित बनाया जा रहा है?
पिछले ढाई साल में बड़ी संख्या में IAS अधिकारियों के तबादले हुए हैं। जुलाई 2025 तक उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक मोहन यादव सरकार बनने के बाद 18 महीनों में 300 से ज्यादा IAS अधिकारियों के तबादले हो चुके थे और मुख्यमंत्री सचिवालय में भी वरिष्ठ अधिकारियों के लगातार बदलाव हुए।
लिहाजा बहस सिर्फ यह नहीं होनी चाहिए कि कौन किस जाति का है, बल्कि यह भी होनी चाहिए कि_किस अधिकारी को कौन सा पद क्यों दिया गया?
उसका प्रदर्शन क्या रहा?
उसकी जवाबदेही क्या तय हुई?
और महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्ति का आधार क्या है?
‘यादव मॉडल’ पर भाजपा हाईकमान को भी सोचना होगा?
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज होने का दावा किया जा रहा है कि यदि सरकार की प्रशासनिक कार्यप्रणाली को लेकर बनी धारणाओं पर समय रहते नियंत्रण नहीं हुआ तो 2028 के विधानसभा चुनाव में एंटी-इनकंबेंसी भाजपा के लिए चुनौती बन सकती है। आम जनता अब मध्यपदेश की भाजपा सरकार की तुलना अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी (तथाकथित प्राइवेट लिमटेड) से कर रही है और प्रदेश को जातिगत ध्रुवीकरण का शिकार होते बता रही है!
प्रदेश की जनता का यह भी कहना है कि एक तरफ जनता की एक अदालत में मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव_ मोहन का अर्थ मोह +न अर्थात “जिसे किसी भी तरह का मोह नहीं” और वही सजातीयता के प्रति मोहित प्रतीत हो रहे हैं।
यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मध्य प्रदेश हमेशा से जाति, वर्ग अथवा धर्म से परे एक स्वच्छंद राजनीति का केंद्र रहा है। मध्यप्रदेश भाजपा की पहचान व्यक्ति विशेष की सरकार से ज्यादा संगठन आधारित सरकार की रही है। ऐसे में यदि जनता के बीच यह धारणा मजबूत होती है कि सरकार के महत्वपूर्ण पदों पर चयन का आधार योग्यता और प्रशासनिक प्रदर्शन के बजाय व्यक्तिगत निकटता अथवा जातीय पहचान है, तो इसका राजनीतिक नुकसान मुख्यमंत्री से ज्यादा पूरी भाजपा सरकार को उठाना पड़ सकता है।
सवाल मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से सीधे है—
आमजन एवं पात्रता अनुरूप दायित्वों से वंचित की ओर से युग क्रांति का सवाल है:
क्या मध्यप्रदेश में नियुक्तियों का आधार सिर्फ योग्यता और प्रशासनिक क्षमता है?
अगर जवाब हां है, तो सरकार को महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त अधिकारियों का मेरिट, अनुभव और प्रदर्शन का सार्वजनिक हिसाब सामने रखना चाहिए। क्योंकि लोकतंत्र में सरकार किसी जाति की नहीं बल्किपूरे मध्यप्रदेश की होती है।और अगर जनता को यह महसूस होने लगे कि “सरकार भाजपा की नहीं, व्यक्ति विशेष की हो गई है”, तो यही धारणा किसी भी लोकप्रिय सरकार के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक खतरा बन सकती है। लिहाजा इसकी चिंता प्रदेश के मुखिया एवं पार्टी हाई कमान को होनी चहिए
