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मध्यप्रदेश सरकार भ्रष्ट है या भ्रष्टाचार के लिए सरकार बनी है?

जनता और आंकड़े सवाल पूछ रहे हैं… 969 भ्रष्टाचार के आपराधिक प्रकरण जांच में, 1123 मामले अदालतों में लंबित

भोपाल 3 सितंबर 2026। मध्यप्रदेश में भ्रष्टाचार को लेकर सरकार के दावों और जमीनी हकीकत के बीच फासला लगातार बड़ा दिखाई दे रहा है। सवाल अब केवल यह नहीं है कि प्रदेश में भ्रष्टाचार हो रहा है या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि भ्रष्टाचार पर सरकार का नियंत्रण कितना प्रभावी है या फिर बढ़ावा जारी है!

मध्यप्रदेश विधानसभा में सरकार द्वारा दिए गए आंकड़े बताते हैं कि 31 जनवरी 2026 तक विशेष पुलिस स्थापना के 969 आपराधिक प्रकरण विवेचनाधीन थे, जबकि विभिन्न विशेष न्यायालयों में 1123 प्रकरण लंबित थे वहीं जनवरी 2022 से जनवरी 2026 के बीच विशेष न्यायालयों में भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में 462 आरोपियों को दंडित किया गया, जबकि 257 आरोपी बरी हुए।

यह आंकड़ा अपने आप में सरकार को भ्रष्ट घोषित नहीं करता, लेकिन एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा करता है—अगर भ्रष्टाचार रोकने के लिए इतनी संस्थाएं, नियम और निगरानी तंत्र मौजूद हैं, तो फिर इतने बड़े पैमाने पर मामले जांच और अदालतों में क्यों अटके हुए हैं?

CAG की रिपोर्टों ने भी उठाए गंभीर सवाल

भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितताओं की तस्वीर केवल विपक्ष के आरोपों से नहीं बनती। भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक यानी CAG की रिपोर्टें भी मध्यप्रदेश सरकार के अलग-अलग विभागों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाती रही हैं। ताजा दौर में CAG ने वर्ष 2026 में मध्यप्रदेश के राज्य वित्त, जल जीवन मिशन, मनरेगा और अन्य विभागों पर कई रिपोर्टें विधानसभा के समक्ष रखी हैं।

लोक निर्माण विभाग की सड़कों से संबंधित CAG की प्रदर्शन लेखापरीक्षा में तो मामला और गंभीर दिखाई देता है। वर्ष 2023-24 में ऑडिट के दौरान 14 सड़क कार्यों में अंतिम समय-विस्तार स्वीकृत किए बिना ही ठेकेदारों को 9.33 करोड़ रुपये का अंतिम भुगतान किए जाने का उल्लेख है। CAG के अनुसार इससे विलंब पर लगने वाली पेनल्टी की वसूली प्रभावित हुई। सरकार ने अपने जवाब में अलग कारण बताया, लेकिन भुगतान की प्रक्रिया पर ऑडिट आपत्ति दर्ज हुई।

सवाल सरकार से है, विपक्ष से नहीं..

मध्यप्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलाफ कुछ कुछ कार्रवाई होती है—यह सच है और विभागों के भीतर खुलेआम भ्रष्टाचार है_ यह और भी बड़ा सच है। सूत्र अनुसार जमीनी हकीकत यह है कि पूरे राज्य में रिपोर्ट लिखाने से लेकर ट्रांसफर- पोस्टिंग जैसे छोटे-बड़े काम बिना सुविधा शुल्क के मुमकिन नहीं है। लोकायुक्त, ईओडब्ल्यू अथवा अन्य जांच एजेंसी तक मामले सहनशीलता की पराकाष्ठा के बाद अत्यंत कम संख्या में पहुंच पाते हैं। बड़ी-बड़ी अधोसंरचनाओं का बनना और कार्य के दौरान अथवा समय से पूर्व बिखरना इसी भ्रष्टता और कमीशनखोरी के प्रमाण है।

462 मामलों में सजा इसका प्रमाण है। लेकिन दूसरी तरफ 969 आपराधिक मामले जांच में और 1123 मामले अदालतों में लंबित होना भी उसी व्यवस्था की दूसरी तस्वीर है। यही वह सवाल है जहां सरकार को जनता के सामने जवाब देना चाहिए_क्या भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई केवल मामला सामने आने के बाद शुरू होगी? क्या सरकारी तंत्र में ऐसी व्यवस्था नहीं होनी चाहिए कि करोड़ों रुपये के कामों में अनियमितता होने से पहले ही उसे रोका जा सके? और सबसे बड़ा सवाल_अगर भ्रष्टाचार रोकने के लिए सरकार के पास पूरी मशीनरी है, तो भ्रष्टाचार बार-बार सरकारी व्यवस्था के भीतर जगह कैसे बना लेता है?

आज मध्यप्रदेश की जनता के सामने असली सवाल यही है कि सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रही है या उसकी प्रशासनिक व्यवस्था भ्रष्टाचार के लिए पर्याप्त जगह छोड़ रही है या फिर बढ़ावा दे रही है! आखिरकार इसका जिम्मेदार कौन_कार्यपालिका का निकला पायदान या विधायिका का शीर्ष नेतृत्व अथवा दोनों?

जनता और आंकड़े यद्यपि फैसला नहीं सुनाते, लेकिन वे सरकार से जवाब जरूर मांगते हैं और लोकतंत्र में यही सबसे असहज सवाल होता है_सरकार भ्रष्ट है या भ्रष्टाचार रोकने में उसकी व्यवस्था लगातार विफल हो रही है और विफल होती इस पूरी व्यवस्था में आखिरकार प्रदेश के मख्यमंत्री डॉ मोहन यादव की क्या भूमिका रह जाती है? यदि समय रहते प्रदेश की जनता को इसका जवाब नहीं मिला तो मध्यप्रदेश की यादव सरकार का विपक्ष मे बैठना निश्चित है!