प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरान अमेरिका युद्ध से उपजी बिषम परिस्थितियों के मद्देनजर पेट्रोल डीजल की कम खपत और सोना कम खरीदने का आग्रह क्या किया उनकी व्यापक आलोचना विपक्ष और लेफ्ट बुद्धिजीवियों ने आरम्भ कर दी। 2014 के बाद देश में एक बड़ा राजनीतिक और बौद्धिक वर्ग ऐसा है जो प्रधानमंत्री की हर विषय पर आलोचना को ही अपना धर्म मान बैठा है। इस अंध मोदी विरोधी वर्ग ने सामान्य विवेक के साथ देश के हितों पर विचारण की क्षमता भी खो दी है। भारत अपनी जरूरत का 90 फीसदी पेट्रोलियम पदार्थ खाड़ी और दूसरे देशों से मंगाता है।
इसी तरह सोना भी लगभग पूरा ही विदेश से आता है।नतीजतन भारत को अपने आयात का अधिकतर हिस्सा इन दोनों पदार्थो पर खर्च करना पड़ता है।प्रधानमंत्री मोदी ने इसी आर्थिकी को ध्यान में रखकर नागरिकों से पेट्रोलियम अनुशासन की अपील की थी। असल में मोदी विरोध की आत्म अग्नि में झुलसते लोगों को यह नही पता कि इस देश में संकट के समय ऐसी अपीलें समय समय पर राष्ट्र के नायक करते रहे हैं और जनता ने इन अपीलों पर अमल भी किया है।
प्रधानमंत्री मोदी इस समय देश के लोकप्रिय नायक है उनकी अपील पर 2015 से अभी तक एक करोड़ से ज्यादा लोग एलपीजी गैस पर मिलने वाली सब्सिडी छोड़ दी है। इसी तरह 1965 के भारत-पाक युद्ध और अकाल की छाया में लाल बहादुर शास्त्री ने जनता से सप्ताह में एक समय का भोजन त्यागने की अपील की थी। दोनों आह्वान इसलिए खास हैं क्योंकि ये संकट के समय व्यक्तिगत त्याग, सामूहिक एकता और राष्ट्र-प्रथम की भावना को केंद्र में रखते हैं।
मोदी जी ने स्पष्ट कहा, “सोने की खरीद विदेशी मुद्रा खाती है… देशहित में हम तय करें कि साल भर सोना न खरीदेंगे।” उन्होंने कोविड काल की याद दिलाते हुए वर्क फ्रॉम होम, वर्चुअल मीटिंग्स, पब्लिक ट्रांसपोर्ट, कार पूलिंग, इलेक्ट्रिक वाहनों और स्वदेशी सामानों पर जोर दिया। यह अपील इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत सोने का दूसरा सबसे बड़ा आयातक है (लगभग 70-80 बिलियन डॉलर सालाना) और यह कदम रुपए को मजबूत रखने, फॉरेक्स रिजर्व बचाने तथा आत्मनिर्भर भारत अभियान को गति देने वाला है।
‘जय जवान जय किसान’
1965 का भारत-पाक युद्ध चुनौतीपूर्ण था। 1962 के चीन युद्ध के बाद अर्थव्यवस्था कमजोर, विदेशी मुद्रा भंडार सीमित और अमेरिका ने खाद्यान्न निर्यात रोकने की धमकी दी। लाल बहादुर शास्त्री ने 19 अक्टूबर 1965 को इलाहाबाद में ‘जय जवान जय किसान’ का नारा दिया और राष्ट्रीय अपील की कि सप्ताह में एक दिन एक समय का भोजन न करें। उन्होंने पहले अपने परिवार पर लागू किया—पत्नी ललिता शास्त्री को शाम का खाना न बनाने को कहा। पूरे देश ने ‘शास्त्री व्रत’ अपनाया। रेस्तरां बंद हुए, लोग स्वेच्छा से उपवास रखने लगे।
यह आह्वान इसलिए खास था क्योंकि यह युद्ध के मैदान और खेत दोनों को जोड़ता था। सैनिकों का मनोबल बढ़ा, किसानों ने उत्पादन बढ़ाया। भारत ने युद्ध में पाकिस्तान को रोका और दीर्घकाल में हरित क्रांति की नींव पड़ी। शास्त्री जी की सादगी अदभुत थी। वे प्रधानमंत्री रहते सरकारी वेतन नहीं लेते थे। उन्हें सारा देश अपना नायक मानता था।
दोनों नेताओं ने ‘ऊपर से आदेश’ नहीं, बल्कि स्वैच्छिक त्याग की अपील की। शास्त्री ने परिवार से शुरू किया। शास्त्री की सादगी प्रसिद्ध है। मोदी की ‘चायवाले से प्रधानमंत्री’ छवि आमजन से जुड़ाव दिखाती है। दोनों आह्वान ‘जय जवान जय किसान’ की भावना को विस्तार देते हैं। शास्त्री ने मूल दिया, मोदी ने ‘जय अनुसंधान’ और आर्थिक सुरक्षा जोड़ा। शास्त्री का आह्वान हरित क्रांति का आधार बना। मोदी का आह्वान प्राकृतिक खेती, स्वदेशी और फॉरेक्स सुरक्षा को बढ़ावा दे सकता है।
दोनों में ‘भारत माता की जय’ की चेतना है। जनता ने शास्त्री का साथ दिया; मोदी के आह्वान पर भी व्यापक चर्चा और समर्थन है। शास्त्री का युद्धकालीन, प्रत्यक्ष अस्तित्व-रक्षा का; मोदी का आर्थिक, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का। 1965 में भारत गरीब था, आज उभरती अर्थव्यवस्था (5 ट्रिलियन डॉलर लक्ष्य) है।
ये दोनों आह्वान भारतीय लोकतंत्र की उस अनूठी परंपरा को दर्शाते हैं जिसमें प्रधानमंत्री जनता को सेवक की भूमिका में संबोधित करते हैं। मोदी जी का आह्वान आधुनिक संकट में पुरानी भावना (त्याग) को प्रासंगिक बनाता है, जबकि शास्त्री जी का आह्वान साबित करता है कि छोटा कद, बड़ा दिल राष्ट्र को एकजुट कर सकता है। समानता इस भावना में है कि संकट ‘हमारा’ है, समाधान भी ‘हमारा’। असमानता विकास चरण में है। बेशक, 1965 अस्तित्व की लड़ाई थी, अब वह स्थिति नहीं है।
भारतीय इतिहास में ऐसे आह्वान विरले हैं जो पीढ़ियों को प्रेरित करें। राष्ट्र-प्रथम में छोटे त्याग बड़े परिणाम लाते हैं। शास्त्री जी ने कहा था, “भूख से मरना पसंद, लेकिन स्वाभिमान से समझौता नहीं।” मोदी जी इसे आर्थिक स्वाभिमान में बदल रहे हैं। यह परंपरा भारत को मजबूत बनाती रहेगी। मोदी जी का विरोध करने वाले भूल जाते हैं कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी ऐसे ही आह्वान कर चुकी हैं।पूर्व गृह मंत्री पी चिदम्बरम के वीडियो आज उपलब्ध है जिनमें वह भी देश के लोगों से सोने की खरीद कम करने की अपील कर रहे है।
सुखद ही है कि देश की भाजपा शासित सरकारों ने प्रधानमंत्री की अपील पर अमल आरम्भ कर दिया है।आम नागरिकों में भी इस अपील का असर दिखने लगा है।
(लेखक सामाजिक कार्यकर्ता और स्तंभकार हैं)
