दागियों से दाग-दाग मध्य प्रदेश और लोक निर्माण: भाग-1
अदालत ने “दागी अफसर” को अतिरिक्त प्रभार देने पर लगाई रोक, अगले ही दिन शासन ने बांट दिए नए प्रभार
भोपाल, एस बी राज। क्या मध्यप्रदेश में अब शासन और न्यायपालिका के बीच नियमों की व्याख्या को लेकर टकराव जैसी स्थिति बन रही है? यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि एक ओर मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय जबलपुर ने दागी अधिकारी को अतिरिक्त प्रभार दिए जाने के मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए पीडब्ल्यूडी के प्रमुख सचिव से व्यक्तिगत शपथपत्र तलब किया,
वहीं दूसरी ओर अगले ही दिन लोक निर्माण विभाग ने ऐसे अधिकारियों को नए अतिरिक्त प्रभार सौंप दिए जिनके नाम स्वयं जाति प्रमाण पत्र जांच और लंबित शिकायतों में सामने आ चुके हैं।
हाईकोर्ट ने पूछा था_ “2004 के सर्कुलर की अनदेखी क्यों?”
7 मई 2026 को जबलपुर हाईकोर्ट ने पीडब्ल्यूडी ब्रिज ज़ोन भोपाल से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान बेहद गंभीर टिप्पणी की थी। अदालत ने पूछा कि आखिर 2004 के उस सरकारी सर्कुलर का पालन क्यों नहीं किया गया, जिसमें स्पष्ट उल्लेख है कि जिन अधिकारियों के खिलाफ विभागीय या अन्य गंभीर जांच लंबित हो, उन्हें उच्च अथवा अतिरिक्त प्रभार नहीं दिया जाना चाहिए। अदालत ने प्रमुख सचिव, लोक निर्माण विभाग से व्यक्तिगत शपथपत्र तक मांग लिया और चेतावनी दी कि संतोषजनक जवाब नहीं मिलने पर जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई पर विचार किया जा सकता है।
इतना ही नहीं, अदालत ने विवादित आदेश के प्रभाव पर अंतरिम रोक भी लगा दी।
मगर अगले ही दिन शासन ने जारी कर दिया नया आदेश
हैरानी की बात यह है कि हाईकोर्ट के सख्त रुख के अगले ही दिन यानी 8 मई 2026 को लोक निर्माण विभाग द्वारा जारी आदेश क्रमांक 1/1/4/20/2026/स्था/19 में कार्यपालन यंत्री योगेंद्र कुमार-प्रभारी आलीशान यंत्री नर्मदापुरम को अतिरिक्त प्रभार के रूप में मुख्य अभियंता, इंदौर परिक्षेत्र का दायित्व सौंपा गया, जबकि अधीक्षण यंत्री जिले सिंह बघेल-प्रभारी मुख्य अभियंता (भवन) को मुख्य अभियंता (भवन), जबलपुर का अतिरिक्त प्रभार दे दिया गया।
सबसे गंभीर बात यह है कि इन दोनों अधिकारियों के नाम जाति प्रमाण पत्र संबंधी विवाद और शिकायतों में सामने आ चुके हैं, जिनका अंतिम निराकरण अब तक नहीं हुआ है।
2008 में शिकायत, 2022 में विजिलेंस रिपोर्ट… फिर भी मलाईदार प्रभार?
मामला केवल आरोपों तक सीमित नहीं है। 8 मई के आदेश से जुड़े अधिकारियों में से एक के खिलाफ 2008 में राज्य स्तरीय छानबीन समिति में शिकायत दर्ज हुई थी। मामला विशेष भर्ती अभियान के तहत नियुक्ति और जाति प्रमाण पत्र की वैधता से जुड़ा था।
2022 में विजिलेंस रिपोर्ट आने के बाद भी मामला निर्णायक निष्कर्ष तक नहीं पहुंचा। रिपोर्ट में उल्लेख किया गया कि एससी-एसटी आरक्षण का लाभ उसी राज्य में मान्य होता है जहां व्यक्ति या उसके पूर्वज 1950 से पूर्व निवासरत रहे हों। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि संबंधित अधिकारी तत्कालीन सहायक यंत्री योगेंद्र कुमार के परिवार की मूल निवास स्थिति उत्तरप्रदेश के आगरा जिले के ग्राम नरहौली से जुड़ी है। साथ ही इसी शिकायत श्रृंखला में जिले सिंह बघेल का नाम भी शामिल है।
क्या अदालत के संकेतों को नजरअंदाज कर रहा विभाग?
अब सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि जब हाईकोर्ट स्वयं यह पूछ रहा है कि दागी अथवा जांच झेल रहे अधिकारियों को अतिरिक्त प्रभार किस नियम के तहत दिए जा रहे हैं, तो फिर ठीक अगले दिन ऐसे आदेश जारी करना क्या न्यायिक संवेदनशीलता की अनदेखी नहीं माना जाएगा?
प्रशासनिक गलियारों में चर्चा है कि पीडब्ल्यूडी में पोस्टिंग और अतिरिक्त प्रभार अब “प्रशासनिक आवश्यकता” से अधिक “प्रभाव और प्रबंधन” का विषय बन चुके हैं। करोड़ों के निर्माण कार्य, टेंडर, फील्ड नियंत्रण और बजट वाले पदों पर कब्जे की लड़ाई इतनी गहरी हो चुकी है कि नियम, सर्कुलर और यहां तक कि अदालत की टिप्पणियां भी गौण होती दिखाई दे रही हैं।
क्या पोस्टिंग सिस्टम बन चुका है “काली अर्थव्यवस्था” का हिस्सा?
सूत्रों का दावा है कि विभाग में अतिरिक्त प्रभार केवल कामकाज की व्यवस्था नहीं बल्कि प्रभाव, पहुंच और आर्थिक हितों का केंद्र बन चुके हैं। यही कारण है कि कई अधिकारी एक साथ दो-दो, तीन-तीन और चार-चार पदों पर काबिज दिखाई देते हैं।
अब सवाल केवल दो अधिकारियों का नहीं रह गया है। सवाल यह है कि:
- क्या पूरे विभाग में सतर्कता मंजूरी की प्रक्रिया का पालन हो रहा है?
- क्या जांच लंबित अधिकारियों को व्यवस्थित तरीके से “सेट” किया जा रहा है?
- क्या शासन के भीतर ऐसा समानांतर तंत्र सक्रिय है जिसे अदालत की टिप्पणियों की भी परवाह नहीं?
जनता पूछ रही_ आखिर किसके संरक्षण में चल रहा यह खेल?
जब अदालत नियमों की बात कर रही हो और शासन उसी समय विवादित प्रभार बांटता नजर आए, तब स्वाभाविक रूप से पूरे सिस्टम की पारदर्शिता कटघरे में आ जाती है।
जनता का पैसा, जनता की सड़कें, जनता के पुल… लेकिन फैसले किन हितों को ध्यान में रखकर लिए जा रहे हैं _ अब यह सवाल और भी बड़ा हो चुका है।
