हाईकोर्ट के एक सवाल से हिल सकता है पूरा सिस्टम, कई विभागों में मच सकती है हलचल !
भोपाल, बृजराज सिंह, 9 मई 2026। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय जबलपुर द्वारा लोक निर्माण विभाग (PWD) के प्रमुख सचिव से व्यक्तिगत शपथपत्र मांगना केवल एक अधिकारी के अतिरिक्त प्रभार का मामला नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे पूरे मध्यप्रदेश के प्रशासनिक ढांचे पर बड़ा न्यायिक प्रश्न माना जा रहा है।
अदालत ने (WP-16652-2026 dt:07.05.2026) में जिस गंभीरता से 2004 के उस सरकारी सर्कुलर का उल्लेख किया है, जिसमें दागी अधिकारियों को उच्च या अतिरिक्त प्रभार देने पर रोक की बात कही गई है, उससे अब प्रदेशभर के विभागों में बैठे उन अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो गए हैं जो स्वयं जांच के घेरे में होने के बावजूद कई-कई पदों का प्रभार संभाल रहे हैं।
हाईकोर्ट का सवाल: नियम खत्म हुए या मनमानी चल रही है?
जबलपुर हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट पूछा है कि आखिर किस नीति या नियम के तहत ऐसे अधिकारी को अतिरिक्त प्रभार दिया गया जिसके खिलाफ गंभीर विभागीय कार्रवाई और वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े मामले लंबित बताए गए हैं। अदालत ने यह तक कहा कि यदि 2004 के बाद कोई नई नीति बनी है तो उसे रिकॉर्ड पर लाया जाए, अन्यथा यह माना जाएगा कि विभाग “मनमर्जी” से फैसले ले रहा है।
यही वह टिप्पणी है जिसने पूरे प्रशासनिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। क्योंकि यह मामला केवल एक पोस्टिंग का नहीं, बल्कि उस “संरक्षण तंत्र” का प्रतीक माना जा रहा है जिसमें जांच झेल रहे अधिकारियों को भी मलाईदार जिम्मेदारियां मिलती रहती हैं।
प्रदेश में कितने “प्रभारी साम्राज्य”?
मध्यप्रदेश के कई विभागों—विशेषकर लोक निर्माण, जल संसाधन, नगरीय प्रशासन, विद्युत और निर्माण एजेंसियों—में वर्षों से यह व्यवस्था चल रही है कि एक ही अधिकारी दो-दो, तीन-तीन और कई बार चार-चार पदों का प्रभार संभालता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि_
क्या हर ऐसे अधिकारी को सतर्कता मंजूरी (Vigilance Clearance) मिली हुई है?
क्या उनके खिलाफ विभागीय या आपराधिक जांच लंबित नहीं हैं?
यदि जांच लंबित है, तो फिर अतिरिक्त प्रभार किस आधार पर दिया गया?
क्या सरकार ने अपने ही सर्कुलर को निष्प्रभावी बना दिया है?
नियम क्या कहते हैं?
सरकारी सेवा नियमों, सतर्कता दिशा-निर्देशों और प्रशासनिक सिद्धांतों के अनुसार सामान्यतः ऐसे अधिकारी जिन्हें “दागी” श्रेणी में माना जाता है—अर्थात जिनके खिलाफ गंभीर विभागीय जांच, भ्रष्टाचार, वित्तीय अनियमितता या आपराधिक प्रकरण लंबित हों—उन्हें अतिरिक्त प्रभार देने से बचा जाता है।
ऐसी स्थिति में यदि प्रशासनिक मजबूरी में प्रभार देना भी पड़े तो सक्षम प्राधिकारी को स्पष्ट कारण दर्ज करने होते हैं। यही कारण है कि हाईकोर्ट अब सरकार से पूछ रहा है कि क्या इन नियमों का पालन हुआ भी था या नहीं।
क्या अब बड़े स्तर पर पोस्टिंग आदेशों की पड़ताल होगी?
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि हाईकोर्ट इस मामले में सख्त रुख अपनाता है और 2004 के सर्कुलर को प्रभावी मानता है, तो प्रदेशभर में वर्षों से जारी अतिरिक्त प्रभारों और पोस्टिंग आदेशों की समीक्षा की मांग उठ सकती है। इसका सीधा असर उन अधिकारियों पर पड़ सकता है—
जो जांच लंबित होने के बावजूद महत्वपूर्ण पदों पर बैठे हैं,
जो एक साथ कई निर्माण इकाइयों का नियंत्रण संभाल रहे हैं,
या जिनके खिलाफ शिकायतें होने के बाद भी उन्हें “फील्ड पोस्टिंग” मिलती रही हैं।
मंत्री और सिस्टम दोनों कटघरे में
यह पूरा मामला सीधे तौर पर केवल अफसरशाही तक सीमित नहीं है। विपक्ष लंबे समय से आरोप लगाता रहा है कि ट्रांसफर-पोस्टिंग अब “प्रशासनिक प्रक्रिया” नहीं बल्कि “सिस्टम आधारित कारोबार” बन चुकी है।
लोक निर्माण विभाग में बड़े निर्माण कार्य, पुल, सड़कें, करोड़ों के टेंडर और फील्ड पोस्टिंग हमेशा से प्रभावशाली मानी जाती रही हैं। ऐसे में यदि जांच झेल रहे अधिकारियों को भी अतिरिक्त प्रभार मिलता है, तो स्वाभाविक रूप से राजनीतिक संरक्षण और विभागीय सांठगांठ के सवाल उठते हैं।
अब नजर 12 मई की सुनवाई पर
फिलहाल सबसे बड़ी नजर अगली सुनवाई पर है, जहां पीडब्ल्यूडी के प्रमुख सचिव को अदालत के सामने यह स्पष्ट करना होगा कि:
* क्या 2004 का सतर्कता आयोग का सर्कुलर आज भी प्रभावी है?
* यदि हां, तो उसका पालन क्यों नहीं हुआ?
* यदि नहीं, तो नई नीति क्या है?
* और क्या जांच झेल रहे अधिकारियों को अतिरिक्त प्रभार देना अब विभागीय “नॉर्मल प्रैक्टिस” बन चुकी है?
यदि उच्च न्यायालय इस मामले में व्यापक टिप्पणी कर दी, तो यह फैसला केवल एक अधिकारी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे मध्यप्रदेश की पोस्टिंग संस्कृति पर दूरगामी असर डाल सकता है।
“दागियों से दाग-दाग मध्य प्रदेश और लोक निर्माण”… युग क्रांति की विशेष रिपोर्ट .. क्रमशः
