भोपाल, बृजराज सिंह तोमर। मध्य प्रदेश के लोक निर्माण विभाग सहित अनेक सरकारी विभागों में इन दिनों “उच्च पद का चालू प्रभार” और “अतिरिक्त प्रभार” का ऐसा खेल चल रहा है, जिसने प्रशासनिक व्यवस्था की रीढ़ तक हिला दी है। यह व्यवस्था अब अपवाद नहीं, बल्कि एक संगठित “प्रभार संस्कृति” का रूप ले चुकी है, जहां नियम, योग्यता और वरिष्ठता को दरकिनार कर पसंदीदा अधिकारियों को एक साथ कई-कई पदों का जिम्मा सौंपा जा रहा है।
स्थिति यह है कि कई विभागों में निम्न श्रेणी अथवा छोटी रैंक के अपात्र अधिकारियों/कर्मचारियों को उनसे दो-तीन स्तर ऊपर के पदों का प्रभार तक दिया जा रहा है। इतना ही नहीं, एक ही अधिकारी को दो से लेकर चार-चार पदों तक का अतिरिक्त दायित्व सौंपा जा रहा है, जबकि उसी विभाग में समान योग्यता और समकक्ष रैंक के नियमित अधिकारी पर्याप्त संख्या में उपलब्ध हैं। सवाल उठता है कि आखिर यह “प्रभार कृपा” किन आधारों पर बांटी जा रही है?
कार्यपालन यंत्री (वीके झा) को मुख्य अभियंता लोक निर्माण परिक्षेत्र ग्वालियर, मुख्य अभियंता सेतु संभाग, अधीक्षण यंत्री गुना एवं अधीक्षण यंत्री सेतु सभाग ग्वालियर के रूप में चार पद और अधीक्षण यंत्री (केपीएस राणा) लोक निर्माण विभाग के तकनीकी प्रदेश प्रमुख अर्थात प्रमुख अभियंता_जैसे उदाहरण भारी सख्या में देखें जा सकते हैं।
क्या “प्रभार” अब योग्यता नहीं, निवेश का रिटर्न बन चुका है?
सरकारी गलियारों में चर्चा है कि यह पूरा खेल महज प्रशासनिक मजबूरी नहीं, बल्कि बड़े स्तर पर चल रही एक सुनियोजित भ्रष्ट व्यवस्था का हिस्सा बन चुका है। आरोप यह हैं कि जितना बड़ा पद, जितने अधिक प्रभार और जितनी कम पात्रता_ उतनी बड़ी “सेटिंग” और उतना बड़ा आर्थिक लेन-देन।
यही कारण है कि जब कोई अधिकारी भारी “इन्वेस्टमेंट” के दम पर कई पदों का प्रभार हासिल करता है, तो वह उन पदों को सेवा का माध्यम नहीं बल्कि “रिकवरी मॉडल” में बदल देता है। परिणामस्वरूप निर्माण कार्यों की गुणवत्ता गिरती है, नियमों की धज्जियां उड़ती हैं और सरकारी खजाने पर डाका पड़ता है।
विकास नहीं, व्यवस्था का विनाश
लोक निर्माण विभाग जैसे तकनीकी और संवेदनशील विभाग में यह अव्यवस्था सबसे अधिक खतरनाक साबित हो रही है। सड़क, पुल, भवन और अन्य निर्माण कार्यों में गुणवत्ता की गिरावट अब आम शिकायत बन चुकी है। जब एक ही अधिकारी कई-कई पद संभालेगा, तो वह न तो प्रशासनिक निगरानी कर पाएगा और न ही तकनीकी जवाबदेही निभा पाएगा।
इसका सबसे बड़ा नुकसान प्रदेश की जनता को भुगतना पड़ रहा है_ घटिया निर्माण, समय से पहले उखड़ती सड़कें, बढ़ती लागत और दुर्घटनाओं का खतरा।
पात्र अधिकारी हाशिए पर, “प्रभावशाली” मलाई पर
इस “प्रभार तंत्र” ने विभागीय मनोबल को भी तोड़ दिया है। योग्य और वरिष्ठ अधिकारी लगातार उपेक्षा और वंचना का शिकार हो रहे हैं, जबकि “प्रभावशाली” और “प्रबंधक क्षमता” वाले अधिकारी मलाईदार पदों पर कब्जा जमाए बैठे हैं। इससे विभागों में वैमनस्यता, असंतोष और गुटबाजी तेजी से बढ़ रही है।
यदि यही स्थिति जारी रही तो आने वाले समय में सरकारी सेवा का मूल सिद्धांत_ योग्यता, अनुभव और पारदर्शिता_ पूरी तरह समाप्त हो जाएगा।
क्या सरकार इस “प्रभार उद्योग” पर कार्रवाई करेगी?
देश और प्रदेश में सुशासन और भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन के बड़े-बड़े दावे करने वाली डबल इंजन सरकार इस “प्रभार उद्योग” पर कभी सर्जिकल स्ट्राइक करेगी? क्या मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के “जीरो टॉलरेंस ऑन करप्शन” के संकल्प के बीच यह खेल चलता रहेगा?
क्यों नहीं यह तय किया जाता कि —
- एक अधिकारी को एक ही पद का दायित्व मिलेगा।
- समकक्ष योग्यता और वरिष्ठता को प्राथमिकता दी जाएगी।
- अतिरिक्त प्रभार केवल वास्तविक आपात स्थिति में सीमित समय के लिए दिया जाएगा।
- सभी प्रभार आदेशों की सार्वजनिक समीक्षा और जवाबदेही तय होगी।
वरना यह “महामारी” पूरे सिस्टम को निगल जाएगी।
आज जरूरत केवल प्रशासनिक सुधार की नहीं, बल्कि उस मानसिकता पर प्रहार की है जिसने “प्रभार” को सेवा नहीं बल्कि कमाई का माध्यम बना दिया है। यदि इस अव्यवस्था पर तुरंत विराम नहीं लगाया गया, तो यह महामारी केवल मध्य प्रदेश ही नहीं बल्कि पूरे देश की प्रशासनिक संरचना को खोखला कर देगी। सरकार को तय करना होगा कि प्रदेश योग्यता से चलेगा या “प्रभार और प्रभाव” के गठजोड़ से?
