मप्र शासन को भेजे ज्ञापन में शिक्षकों ने कहा – ‘विश्रामावकाश’ के नाम पर छीने जा रहे अर्जित अवकाश के अधिकार
भोपाल। मध्यप्रदेश में लागू हुए मप्र अवकाश नियम 2025 को लेकर अब शिक्षक एवं कर्मचारी संगठनों में असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। शिक्षक-व्याख्याता एवं प्राचार्य संवर्ग के प्रांतीय संयोजक शिववीर सिंह भदौरिया ने मुख्य सचिव, प्रमुख सचिवों और संबंधित विभागों को विस्तृत ज्ञापन भेजकर नए नियमों में कई गंभीर विसंगतियों और कर्मचारी विरोधी प्रावधानों का आरोप लगाया है।
ज्ञापन में कहा गया है कि सरकार एक तरफ महिला सशक्तिकरण और “लाड़ली बहना” जैसी योजनाओं का प्रचार कर रही है, वहीं दूसरी ओर कामकाजी महिलाओं को मिलने वाले संतान पालन अवकाश में वेतन कटौती जैसी व्यवस्था लागू कर दोहरी नीति अपना रही है।
730 दिन के अवकाश में आधे पर ‘वेतन कटौती’ का सवाल
ज्ञापन के अनुसार नए नियमों में महिला कर्मचारियों को मिलने वाले कुल 730 दिन के संतान पालन अवकाश में पहले 365 दिन पूर्ण वेतन, लेकिन शेष 365 दिन केवल 80 प्रतिशत वेतन देने का प्रावधान रखा गया है। संगठन ने इसे घरेलू महिलाओं और कामकाजी महिलाओं के बीच “स्पष्ट भेदभाव” बताया है।
साथ ही यह भी कहा गया कि 180 दिन के मातृत्व अवकाश तथा लंबी अवधि के संतान पालन अवकाश की स्वीकृति के अधिकार अलग-अलग स्तरों पर बांट दिए गए हैं, जिससे समय पर स्वीकृति और वेतन भुगतान में बाधा आने की आशंका बढ़ गई है।
“विश्रामावकाश” बना शिक्षकों के अधिकारों पर प्रहार?
ज्ञापन में स्कूल शिक्षा विभाग पर सबसे तीखा हमला “विश्रामावस्था” संबंधी नियमों को लेकर किया गया है। आरोप है कि शिक्षकों को अवकाश अवधि में निर्वाचन, जनगणना, RTE प्रवेश, परीक्षा और अन्य शासकीय कार्यों में लगातार लगाया जाता है, लेकिन बदले में अर्जित अवकाश का लाभ देने में विभाग आनाकानी करता है।
शिक्षक संगठनों का कहना है कि पहले के नियमों में अवकाश अवधि में रोके जाने पर 30 दिन तक अर्जित अवकाश का स्पष्ट अधिकार था, लेकिन नए नियमों में इसे सीमित और जटिल बना दिया गया है।
ज्ञापन में यह भी कहा गया कि जिला स्तर से लेकर संकुल, बीआरसी, डीईओ और प्रशासनिक अधिकारियों तक द्वारा शिक्षकों को कभी भी कार्य के लिए रोक लिया जाता है, लेकिन बाद में सक्षम अधिकारी की औपचारिक स्वीकृति न होने का हवाला देकर अर्जित अवकाश नगदीकरण से वंचित कर दिया जाता है।
सेवानिवृत्त शिक्षक का मामला बना उदाहरण
ज्ञापन में सिवनी जिले के एक सेवानिवृत्त प्राचार्य का उदाहरण देते हुए आरोप लगाया गया कि वर्षों तक चुनाव ड्यूटी और अन्य कार्य करने के बावजूद अर्जित अवकाश नगदीकरण के लिए अब उनसे ही सक्षम अधिकारी की स्वीकृति प्रस्तुत करने को कहा जा रहा है।
संगठन ने इसे “प्रशासनिक विफलता का बोझ कर्मचारियों पर डालना” बताया है।
जनगणना और समर कैम्प ड्यूटी पर भी विवाद
ज्ञापन में जनगणना कार्य के दौरान ऑनलाइन उपस्थिति की बाध्यता पर भी सवाल उठाए गए हैं। संगठन का कहना है कि भीषण गर्मी में कर्मचारी सुबह-शाम समय बदलकर काम कर रहे हैं, लेकिन ऑनलाइन उपस्थिति प्रणाली व्यवहारिक नहीं है।
इसके अलावा समर कैम्प और मंडल द्वितीय परीक्षा में शिक्षकों की ड्यूटी अनिवार्य करने के बावजूद अर्जित अवकाश के स्वत्व पर कोई स्पष्ट आदेश जारी नहीं होने पर भी नाराजगी जताई गई है।
मुख्य मांगें क्या हैं?
ज्ञापन में सरकार से मांग की गई है कि —
सभी विभागों में अवकाश स्वीकृति के अधिकार स्पष्ट रूप से प्रत्यायोजित किए जाएं।
महिला कर्मचारियों को पूरा संतान पालन अवकाश पूर्ण वेतन सहित दिया जाए।
शिक्षकों को “विश्रामावकाश” की श्रेणी से हटाकर अन्य कर्मचारियों के समान अवकाश अधिकार दिए जाएं।
चुनाव, जनगणना और अन्य शासकीय कार्यों में लगाए गए शिक्षकों को अर्जित अवकाश का लाभ सुनिश्चित किया जाए।
सेवानिवृत्ति के समय अर्जित अवकाश नगदीकरण में आ रही प्रशासनिक बाधाएं समाप्त हों।
ज्ञापन ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है_क्या सरकार की महिला सशक्तिकरण और कर्मचारी हितैषी नीतियां सिर्फ प्रचार तक सीमित हैं, जबकि जमीनी स्तर पर कर्मचारी अब भी अवकाश, वेतन और अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं? अब निगाह इस बात पर है कि मंत्रालय और संबंधित विभाग इस विस्तृत ज्ञापन पर क्या रुख अपनाते हैं।
