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भ्रष्टता की नई तरकीबों के बादशाह की नजर_ फिर भोपाल पर

दाग-दाग मध्य प्रदेश और लोक निर्माण: भाग 3

भोपाल/ग्वालियर। सत्ता और प्रशासनिक गलियारों में सुर्ख़ियों एवं सूत्रों के हवाले से लगातार चर्चाओं के केंद्र में बने लोक निर्माण विभाग से जुड़े मामलों पर युग क्रांति के विशेष धारावाहिक “दाग-दाग मध्य प्रदेश और लोक निर्माण” में आज एक ऐसे कारिंदे की परतें खुलने जा रही हैं, जिसने भोपाल PWD में महत्वपूर्ण पदों पर रहते हुए कथित तौर पर भ्रष्टाचार की नई-नई तकनीकों को व्यवस्था का हिस्सा बना दिया। जिसके चलते वह राजधानी से 400 किलोमीटर दूर ग्वालियर में पदस्थ है।

सूत्रों का दावा है कि यह वही अधिकारी है जिसने सप्लीमेंट्री शेड्यूल, विशेष मरम्मत और वीआईपी सुविधाओं के नाम पर ऐसी कार्यप्रणाली विकसित की, जिससे नियम-कायदों की आत्मा को दरकिनार कर करोड़ों रुपए के कार्यों को मनमाने ढंग से अंजाम दिया गया। आरोप यह भी हैं कि इसी वजह से उसे राजधानी की मलाईदार कुर्सियों से हटाकर परियोजना क्रियान्वयन इकाई (PIU) में भेजा गया।

लेकिन अब बताया जा रहा है कि PIU में अपेक्षित “कमाई” और घटते प्रोजेक्ट्स से परेशान यह प्रभारी मुख्य अधिकारी फिर से भोपाल में प्रभावशाली पदों पर वापसी के लिए सक्रिय हो गया है। विभागीय हलकों में चर्चा है कि राजधानी में दोबारा पकड़ बनते ही पुराने नेटवर्क और कथित तौर पर गाढ़ी कमाई का वही “फॉर्मूला मॉडल” के साथ फिर सक्रिय हो सकते हैं, जिनकी वजह से पहले विभाग की कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में आई थी।

सूत्रों के अनुसार वर्ष 2019 में सत्ता परिवर्तन के बाद कांग्रेस सरकार में मुख्यमंत्री निवास, मंत्रियों के बंगलों तथा वीआईपी परिसरों में “विशेष मरम्मत”, “सुविधा विस्तार” और “उन्नयन” के नाम पर करोड़ों रुपए की मंजूरियां दी गईं। आरोप है कि इसी दौरान लगभग ₹1008.56 लाख के PWD को स्वीक्रत MOW/AR/SR मद के कार्यों को ऐसी व्यवस्था के जरिए अंजाम दिया गया, जिसमें सामान्य टेंडर प्रक्रिया को दरकिनार कर दूसरे विभाग में पहले से चल रहे कार्यों में सप्लीमेंट्री शेड्यूल (अनुपूरक कार्य) जोड़कर काम कराए गए।

सबसे बड़ा सवाल यही खड़ा हो रहा है कि जब मंजूरी लोक निर्माण विभाग (PWD) को मिली थी, तो फिर कार्य किसी अन्य विभाग अर्थात PIU के पुराने अनुबंधों के माध्यम से आखिर किस नियम और अधिकार के तहत कराए गए? विभागीय जानकारों के अनुसार सामान्य परिस्थितियों में ऐसे कार्यों के लिए PWD को स्वयं अलग से टेंडर आमंत्रित करने चाहिए थे, क्योंकि कार्य की प्रकृति, स्वीकृति और वित्तीय अधिकार उसी विभाग के अधीन थे।

सवाल केवल प्रक्रिया का नहीं, बल्कि शासन को संभावित आर्थिक नुकसान पहुंचाने का भी खड़ा हो रहा है। विभागीय हलकों में इसे “सप्लीमेंट्री शेड्यूल मॉडल” के नाम से चर्चित एक ऐसे तंत्र के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें नियमों की तकनीकी व्याख्या का इस्तेमाल कर प्रतिस्पर्धात्मक निविदा प्रक्रिया से बचने के आरोप लग रहे हैं। इस कथित अनुसंधान पर विस्तृत व्याख्या अगले एपिसोड में होगी।

निर्माण भवन से जुड़े सूत्र यह भी बताते हैं कि इस पूरे खेल में एक ऐसा कथित “सलाहकार/ सिपैसलार” सक्रिय था, जिसे कभी निर्माण भवन में रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़ा गया था और आज भी वह अपने आका की तरक्की के लिए अजमेर शरीफ पर चादर चढ़ा रहा है। यही कारण है कि विभाग के भीतर अब यह चर्चा और तेज हो गई है कि भ्रष्टाचार केवल व्यक्तियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने “सिस्टम” का रूप ले लिया है।

युग क्रांति के इस विशेष अभियान में अगले अंक में उन फाइलों, स्वीकृतियों, नोटशीटों, सप्लीमेंट्री शेड्यूल के खेल और कथित नेटवर्क का विस्तृत खुलासा किया जाएगा, जिनके जरिए करोड़ों रुपए के कार्यों को नियमों की आड़ में अंजाम दिए जाने के आरोप लग रहे हैं।

क्रमशः…खुलासा विस्तार से