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भ्रष्टाचार पर कांग्रेस का ‘कैंसर’ वाला बयान, आंकड़ों ने खोली सियासत की पोल

जीतू पटवारी के 1,063 मामले और 7 सजा के आंकड़े पर बड़ा सवाल_EOW में 70 फैसलों में 40 दोषसिद्धि, कांग्रेस बताए उसके शासनकाल में भ्रष्टाचार पर क्या था हिसाब?

भोपाल, 1 सितंबर 2026। मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार को लेकर कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने भाजपा सरकार पर हमला बोलते हुए इसे ‘बीमारी नहीं, कैंसर’ करार दिया है। पटवारी ने लोकायुक्त के 1,063 आपराधिक मामलों में केवल 7 दोषसिद्धियों का हवाला देकर सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ 1,063 और 7 का आंकड़ा बताकर मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार की पूरी तस्वीर सामने आ जाती है?

आंकड़े बताते हैं कि तस्वीर इससे कहीं ज्यादा जटिल है। सरकार द्वारा विधानसभा में दिए गए जवाब के अनुसार वर्ष 2020 से जनवरी 2026 के बीच EOW के जिन 70 मामलों में न्यायालय का फैसला आया, उनमें 40 मामलों में दोषसिद्धि और 30 में बरी किया गया। यानी फैसला हुए मामलों में EOW की दोषसिद्धि दर करीब 57 प्रतिशत रही। हालांकि इन मामलों में फैसला आने में औसतन 13 साल 7 महीने लगे, जो न्यायिक प्रक्रिया की रफ्तार पर गंभीर सवाल जरूर खड़ा करता है।

सवाल भाजपा से ही नहीं, कांग्रेस से भी—भ्रष्टाचार पर राजनीति कब तक?

लोकायुक्त के आंकड़े निश्चित रूप से सरकार के लिए असहज सवाल खड़े करते हैं। वर्ष 2022-23 से संबंधित आंकड़ों के मुताबिक 1,063 आपराधिक मामले दर्ज हुए, जिनमें 393 की जांच पूरी हुई, 208 में चालान पेश हुए और 7 मामलों में दोषसिद्धि हुई। 134 मामले अभियोजन स्वीकृति के इंतजार में भी बताए गए हैं। यानी सरकार को यह जवाब देना ही होगा कि भ्रष्टाचार के मामले दर्ज होने के बाद कार्रवाई की रफ्तार इतनी धीमी क्यों है? अभियोजन स्वीकृति में देरी क्यों होती है? और दोषसिद्धि तक पहुंचने वाले मामलों की संख्या इतनी कम क्यों है? लेकिन इसी सवाल के साथ कांग्रेस से भी एक बड़ा सवाल बनता है_क्या भ्रष्टाचार भाजपा के सत्ता में आने के बाद पैदा हुआ है?

मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार कोई नई बीमारी नहीं है। वर्ष 2020 से 2026 तक के EOW आंकड़े बताते हैं कि शिकायतों की बड़ी संख्या के बावजूद केवल सीमित मामलों में आपराधिक प्रकरण दर्ज हुए। 2020 से जनवरी 2026 तक EOW को 19,775 शिकायतें मिलीं, लेकिन अपराध दर्ज होने वाले मामले 566 रहे। इसका मतलब साफ है—भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई केवल सत्ता पक्ष पर आरोप लगाने से पूरी नहीं होगी।

कांग्रेस को भी बताना होगा – सत्ता में रहते ‘शिष्टाचार’ क्या था?

कांग्रेस आज भ्रष्टाचार पर सरकार को कठघरे में खड़ा कर रही है, लेकिन उसे यह भी बताना चाहिए कि उसके शासनकाल में लंबित भ्रष्टाचार मामलों, अभियोजन स्वीकृतियों और दोषसिद्धियों की स्थिति क्या थी।

इतिहास गवाह है कि सरकारें बदलती रहीं, लेकिन भ्रष्टाचार की शिकायतें, जांच, अभियोजन और अदालतों में लंबित मुकदमे बने रहे। वर्ष 2018 में भी लोकायुक्त को तत्कालीन भाजपा सरकार के कार्यकाल के लंबित 245 मामलों में 281 आरोपियों के खिलाफ अभियोजन की अनुमति का मुद्दा उठाना पड़ा था। यानी अभियोजन स्वीकृति का संकट किसी एक सरकार की खोज नहीं है।

इसलिए आज कांग्रेस यदि भ्रष्टाचार पर सवाल उठा रही है तो सवाल उठाना उसका लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन जनता यह भी पूछ सकती है—क्या कांग्रेस के पास भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई ऐसा मॉडल है, जिसे उसने सत्ता में रहते सफलतापूर्वक लागू किया हो?

भ्रष्टाचार पर राजनीति करने से ज्यादा जरूरी है भ्रष्टाचार के खिलाफ ऐसी व्यवस्था बनाना जिसमें FIR से लेकर जांच, अभियोजन स्वीकृति, चार्जशीट और अंतिम सजा तक हर चरण की समय-सीमा तय हो।

सरकार के लिए भी आईना, कांग्रेस के लिए भी

जीतू पटवारी का ‘कैंसर’ वाला बयान राजनीतिक रूप से तीखा जरूर है, लेकिन आंकड़े यह भी बताते हैं कि समस्या केवल किसी एक दल या सरकार की नहीं है। समस्या उस पूरे सिस्टम की है जिसमें शिकायतें बड़ी संख्या में आती हैं, जांच वर्षों चलती है, अभियोजन स्वीकृति अटकती है और अदालतों में मुकदमे लंबे समय तक चलते हैं।

इसलिए भाजपा सरकार को आंकड़ों से बचने के बजाय लंबित अभियोजन स्वीकृतियों, जांच और मुकदमों की समयबद्ध समीक्षा करनी चाहिए और कांग्रेस को भी केवल ‘भ्रष्टाचार-कैंसर’ का राजनीतिक नारा देने के बजाय यह बताना चाहिए कि अगर वह सत्ता में आती है तो इस कैंसर का इलाज क्या होगा? क्योंकि प्रदेश की जनता को भ्रष्टाचार पर भाषण नहीं, परिणाम चाहिए। भ्रष्टाचार भाजपा का हो या कांग्रेस के समय का—भ्रष्टाचार, भ्रष्टाचार है। और जनता को दल नहीं, कार्रवाई चाहिए।