क्या जीएसटी प्रावधानों से भी बड़ी हो गई हैं आयुक्त की शक्तियां?
भोपाल। प्रदेश में जीएसटी कानून लागू होने के बाद कर चोरी रोकने के लिए सरकार ने विभाग को व्यापक अधिकार दिए, लेकिन सवाल यह खड़ा हो रहा है कि जब कानून इतना सशक्त है तो फिर मध्य प्रदेश में हजारों करोड़ रुपये की संभावित टैक्स चोरी आखिर किसके संरक्षण में जारी है?
CGST/SGST अधिनियम 2017 की धारा 67, 68, 71, 129 और 130 के अंतर्गत जीएसटी विभाग को माल के परिवहन (Transit), तलाशी (Search), जब्ती (Seizure) और कर वसूली तक के व्यापक अधिकार प्राप्त हैं। इन प्रावधानों के तहत जीएसटी आयुक्त (Commissioner) और उनके अधीनस्थ अधिकारियों का यह वैधानिक दायित्व है कि वे कर चोरी रोकने के लिए प्रभावी कार्रवाई करें।
यदि कोई अधिकारी इन शक्तियों का उपयोग नहीं करता, तो इसे केवल प्रशासनिक कमजोरी नहीं बल्कि “कर्तव्य में लापरवाही” माना जा सकता है। ऐसी स्थिति उच्च अधिकारियों, CBIC अथवा न्यायालयीय जांच का विषय भी बन सकती है।
आयरन एंड स्टील कारोबार में बड़ा खेल?
सूत्रों और व्यापारिक हलकों में चर्चा है कि प्रदेश में प्रतिमाह लगभग 700 से 800 आयरन एंड स्टील से भरे ट्रक बिना बिल और ई-वे बिल के विभिन्न जिलों में खपाए जा रहे हैं। ग्वालियर, जबलपुर, सतना, सागर, छतरपुर, कटनी, दतिया, गुना, अशोकनगर सहित अन्य क्षेत्रों में बड़े स्तर पर माल की खपत होने के आरोप लगाए जा रहे हैं।
इसी प्रकार महाराष्ट्र से आने वाला आयरन एंड स्टील इंदौर, उज्जैन, भोपाल, देवास और अन्य शहरों में पहुंच रहा है। आरोप है कि यदि स्वयं आयुक्त छत्तीसगढ़-जबलपुर बॉर्डर तथा महाराष्ट्र-इंदौर-उज्जैन सीमाओं पर अचानक जांच कराएं, तो वास्तविक आंकड़े और भी बड़े सामने आ सकते हैं।
बताया जा रहा है कि केवल इस सेक्टर में ही सरकार को प्रतिमाह लगभग 250 करोड़ रुपये तक के राजस्व का नुकसान हो सकता है। बड़े आयरन एंड स्टील व्यापारियों के यहां यदि सघन छापेमार कार्रवाई हो, तो वास्तविक और कागजी स्टॉक में भारी अंतर सामने आने की संभावना जताई जा रही है।
पान मसाला कारोबार पर भी सवाल
प्रदेश में पान मसाले की भारी खपत के बावजूद कर संग्रह उस अनुपात में नहीं बढ़ने पर भी सवाल उठ रहे हैं। राजश्री, विमल, तलब, करमचंद, जय, पटेल, किसान, राजनिवास, सागर प्लस, शुद्ध प्लस, गुरुजी, पानबहार, रजनीगंधा और पान पराग जैसे ब्रांडों की प्रदेशभर में बड़ी बिक्री बताई जाती है।
आरोप है कि यदि भोपाल स्थित राजश्री पान मसाला फैक्ट्री के बाहर ही विभागीय निगरानी हो, तो प्रतिदिन बड़ी संख्या में बिना बिल और ई-वे बिल के वाहन पकड़े जा सकते हैं। सूत्रों का दावा है कि केवल पान मसाला सेक्टर में ही राज्य सरकार को प्रतिमाह लगभग 200 करोड़ रुपये तक अतिरिक्त कर प्राप्त हो सकता है।
सोना-चांदी व्यापार में भी बड़ा अंतर?
पिछले एक वर्ष में सोने और चांदी की कीमतों में भारी उछाल आया है, लेकिन इसके अनुपात में टैक्स संग्रह में उल्लेखनीय वृद्धि नहीं दिखाई देने पर भी सवाल उठ रहे हैं।
व्यापारिक सूत्रों का कहना है कि यदि बड़े ज्वेलर्स पर सघन छापामार कार्रवाई की जाए, तो वास्तविक स्टॉक और दस्तावेजों में दर्ज स्टॉक के बीच “जमीन-आसमान” जैसा अंतर सामने आ सकता है। दावा किया जा रहा है कि इस सेक्टर में भी सरकार को हजारों करोड़ रुपये के राजस्व की संभावित हानि हो रही है।
कॉपर पाइप और एसी बाजार में भी कथित गड़बड़ी
प्रदेश में भीषण गर्मी के चलते एसी की बिक्री तेजी से बढ़ी है। एसी इंस्टॉलेशन में बड़ी मात्रा में कॉपर पाइप का उपयोग होता है, लेकिन आरोप है कि प्रदेश में कॉपर की वैध खरीद उस अनुपात में दिखाई नहीं देती।
सूत्रों के अनुसार दिल्ली से कुछ ट्रांसपोर्ट कंपनियों के माध्यम से बिना बिल और ई-वे बिल के कॉपर पाइप पूरे प्रदेश में सप्लाई की जा रही है। आरोपों में दीपक रोड लाइन, जय रोड लाइन और सिंह ट्रांसपोर्ट जैसे नाम भी चर्चा में बताए जा रहे हैं। दावा है कि यदि इनकी गाड़ियों की सघन जांच हो, तो सरकार को प्रतिमाह लगभग 25 करोड़ रुपये अतिरिक्त टैक्स प्राप्त हो सकता है।
आखिर चेकिंग, जांच और कार्रवाई क्यों नहीं?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब कानून विभाग को इतनी व्यापक शक्तियां देता है, तब बड़े स्तर पर कथित कर चोरी पर निर्णायक कार्रवाई क्यों नहीं हो रही?
क्या यह केवल प्रशासनिक विफलता है या फिर इसके पीछे कोई और खेल चल रहा है? प्रशासनिक गलियारों में यह चर्चा भी तेज है कि संबंधित व्यापारिक समूहों से कथित सांठगांठ की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
यदि कर चोरी रोकना अनिवार्य है, तो फिर नियमों से परे जाकर राजस्व को क्षति पहुंचाने वालों पर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही? क्या वित्त विभाग और सरकार को इस संभावित राजस्व नुकसान की पूरी जानकारी है? और क्या मुख्यमंत्री तक यह मामला गंभीरता से पहुंचा है?
प्रदेश में लगातार बढ़ते खर्चों और राजस्व बढ़ाने की जरूरत के बीच यह प्रश्न और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि आखिर हजारों करोड़ रुपये की संभावित टैक्स चोरी का जिम्मेदार कौन है _ व्यापारी, तंत्र या फिर कार्रवाई से बचता प्रशासन?
