700 करोड़ की परियोजना में गंभीर तकनीकी खामियों पर मुख्य सचिव ने दिए थे तत्काल कार्रवाई के निर्देश, लेकिन प्रोसीडिंग्स ही दबा दी गईं; तीन महीने बाद पत्र मिलते ही बीडीसी ने तत्कालीन जीएम अजय श्रीवास्तव एवं अन्य को जारी किया कारण बताओ नोटिस
भोपाल। युग क्रांति की सुर्खियों में रहा मध्यप्रदेश भवन विकास निगम (एमपीबीडीसी) की निर्माण परियोजनाओं में अनियमितताओं की कड़ी में अब सीहोर जिले का निर्माणाधीन बुधनी मेडिकल कॉलेज एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में आ गया है। करीब 700 करोड़ रुपये की लागत से बन रहे इस मेडिकल कॉलेज में सामने आई भारी तकनीकी खामियों पर स्वयं मध्य प्रदेश शासन के मुख्य सचिव ने कड़ा रुख अपनाते हुए जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध तत्काल कार्रवाई के निर्देश दिए थे। चौंकाने वाली बात यह है कि कार्रवाई के आधार बनने वाली वही आधिकारिक प्रोसीडिंग्स कथित तौर पर षड्यंत्रपूर्वक दबा दी गईं और लगभग तीन महीने तक एमपीबीडीसी को औपचारिक रूप से भेजी ही नहीं गईं।
सूत्रों के अनुसार, यह मामला लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग के निर्माण कार्यों की परियोजना परीक्षण बैठक से जुड़ा है। बैठक में तकनीकी कमियों को अत्यंत गंभीर मानते हुए मुख्य सचिव ने स्पष्ट निर्देश दिए कि जिन अधिकारियों की लापरवाही से यह स्थिति बनी है, उनके विरुद्ध तत्काल विभागीय कार्रवाई की जाए। लेकिन कार्रवाई आगे बढ़ने से पहले ही पूरी प्रोसीडिंग को दबा देने का खेल शुरू हो गया।
शुरुआत से ही मनमानी, तकनीकी निगरानी को किया गया कमजोर
जानकारी के अनुसार वर्ष 2023 में बुधनी मेडिकल कॉलेज का निर्माण कार्य प्रारंभ हुआ। सूत्रों का दावा है कि परियोजना शुरू होते ही कुछ अधिकारियों ने अपने हित साधने की रणनीति बना ली थी। आरोप है कि तत्कालीन डीजीएम अजय श्रीवास्तव ने पूरी व्यवस्था पर एकाधिकार स्थापित करने के उद्देश्य से तकनीकी परीक्षण, गुणवत्ता नियंत्रण और निगरानी से जुड़े अधिकारियों को प्रभावी भूमिका से बाहर कर दिया तथा बाद में जीएम का पद भी हासिल कर लिया।
इसके बावजूद निर्माण कार्य में आवश्यक तकनीकी अनुक्रम और गुणवत्ता नियंत्रण पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। परिणामस्वरूप जो कार्य प्रारंभिक चरण में किए जाने चाहिए थे, वे समय पर नहीं हुए। बाद में उन्हीं कमियों की भरपाई के लिए अतिरिक्त कार्य कराने पड़े, जिससे परियोजना की लागत में भारी वृद्धि हुई। बताया जाता है कि इन अतिरिक्त कार्यों के लिए आवश्यक प्रशासकीय स्वीकृति भी उपलब्ध नहीं थी।
70 करोड़ से अधिक का वेरिएशन पहुंचा मुख्य सचिव की समिति के सामने
निर्माण लागत में 70-80 करोड़ रुपये से अधिक के वेरिएशन का प्रस्ताव स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग के माध्यम से मुख्य सचिव की समिति के समक्ष भेजा गया। 28 मार्च 2026 को मुख्य सचिव अनुराग जैन की अध्यक्षता में हुई बैठक में पूरे मामले की समीक्षा की गई। बैठक के दौरान तकनीकी खामियों और लापरवाही को गंभीर मानते हुए मुख्य सचिव ने स्पष्ट निर्देश दिए कि इस स्थिति के लिए जिम्मेदार सभी तकनीकी अधिकारियों के विरुद्ध तत्काल कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
खेल में आया नया ट्विस्ट..
सूत्र बताते हैं कि बैठक के तुरंत बाद एमपीबीडीसी के प्रबंध संचालक ने प्रोसीडिंग आने पर आगे की कार्रवाई के लिए मुख्य महाप्रबंधक से विमर्श भी किया लेकिन इसी बीच पूरे मामले में नया मोड़ आ गया।
आरोप है कि एमपीबीडीसी के अभियंता प्रमुख अजय श्रीवास्तव ने अपने प्रभाव का उपयोग करते हुए स्वास्थ्य विभाग के चीफ इंजीनियर स्तर पर हस्तक्षेप कराया और मुख्य सचिव की आधिकारिक प्रोसीडिंग्स को ही रोक दिया गया। परिणामस्वरूप जिस आदेश के आधार पर तत्काल कार्रवाई होनी थी, वह एमपीबीडीसी तक औपचारिक रूप से लगभग तीन महीने तक पहुंच ही नहीं सका।
तीन महीने बाद पहुंची प्रोसीडिंग, तब जारी हुए कारण बताओ नोटिस
चूंकि प्रोसीडिंग्स की कवरिंग के साथ प्रतिलिपियां विभिन्न अधिकारियों को भेजे जाने के कारण इसकी जानकारी एमपीबीडीसी के शीर्ष प्रबंधन तक अनौपचारिक रूप से पहुंच गई। तदुपरांत जब स्वास्थ्य विभाग पर दबाव बनाया तब यह आधिकारिक पत्र 24 जून 2026 को प्राप्त हुआ। इसके तत्काल बाद निगम ने मुख्य सचिव के निर्देशों के पालन में तत्कालीन तकनीकी डीजीएम/जीएम अजय श्रीवास्तव (वर्तमान ईएनसी) एवं अन्य कुछ (डीजीएम/एजीएम) को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिए।
सबसे गंभीर सवाल यह है कि यदि मुख्य सचिव जैसे सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी के स्पष्ट निर्देशों वाली आधिकारिक प्रोसीडिंग्स भी महीनों तक दबाई जा सकती हैं, तो आखिर इसके पीछे किसका संरक्षण था? यदि आदेश समय पर लागू होते तो क्या जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई तीन महीने पहले नहीं हो जाती? और क्या इतने महत्वपूर्ण सरकारी दस्तावेज को रोकने वालों की भी जवाबदेही तय होगी?
