भाषणों में युवा शक्ति की दुहाई, अब घोषणाओं की बौछार… सवाल यह कि जमीन पर कब दिखेगा असर?
बृजराज सिंह तोमर। नई दिल्ली से लेकर झारखंड तक युवाओं और छात्रों के आंदोलनों की गूंज अब महज किसी एक परीक्षा, भर्ती या राज्य सरकार की समस्या तक सीमित दिखाई नहीं दे रही है। जंतर-मंतर पर लंबे समय तक चले युवा आंदोलन और झारखंड में JPSC-JSSC से जुड़ी मांगों को लेकर तेज हुए प्रदर्शन इस बात का संकेत दे रहे हैं कि देश का युवा अब केवल भाषण सुनने वाला वर्ग नहीं रह गया है। वह सवाल पूछ रहा है, जवाब मांग रहा है और जरूरत पड़ने पर सड़क पर उतरने से भी पीछे नहीं हट रहा।
यही बदलता युवा तेवर शायद केंद्र की राजनीति को भी दिखाई देने लगा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार भारत को वैश्विक शक्ति बनाने की दिशा में युवाओं को सबसे बड़ी ताकत बताते रहे हैं। लेकिन 15 अगस्त 2026 के लाल किले के भाषण में जिस तरह युवाओं को लेकर रोजगार, AI प्रशिक्षण, मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग और खेल प्रतिभाओं की खोज जैसी घोषणाएं सामने आईं, उसने एक बड़ा राजनीतिक सवाल खड़ा कर दिया है—क्या नरेंद्र मोदी और भाजपा ने महसूस कर लिया है कि भारत के युवा को अब केवल ‘विकसित भारत’ का सपना सुनाना पर्याप्त नहीं होगा, उसे अपने वर्तमान का ठोस रास्ता भी चाहिए?
1 करोड़ युवाओं की AI ट्रेनिंग, मुफ्त कोचिंग और 3.5 करोड़ रोजगार का लक्ष्य
15 अगस्त की घोषणाओं में एक करोड़ युवाओं को AI प्रशिक्षण देने और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग जैसी पहल शामिल हैं। इसके साथ ही सरकार पहले से प्रधानमंत्री विकसित भारत रोजगार योजना के माध्यम से दो वर्षों में 3.5 करोड़ से अधिक रोजगार सृजित करने का लक्ष्य बता चुकी है। इस योजना का कुल परिव्यय करीब 99,446 करोड़ रुपये है और लगभग 1.92 करोड़ पहली बार रोजगार पाने वाले युवाओं को इसका लाभ मिलने का अनुमान है।
यह घोषणाएं निश्चित रूप से आकर्षक हैं। लेकिन आज का युवा इतना भर सुनकर संतुष्ट हो जाएगा, यह मान लेना शायद सबसे बड़ी राजनीतिक भूल होगी।
क्योंकि रोजगार की तलाश में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहा युवा जानता है कि उसके लिए घोषणा से ज्यादा महत्वपूर्ण भर्ती की समयबद्धता, परीक्षा की पारदर्शिता, पेपर लीक पर लगाम, नियुक्ति की निश्चितता और निजी क्षेत्र में सम्मानजनक वेतन वाला रोजगार है।
सरकार के PLFS आंकड़े बताते हैं कि 15-29 वर्ष के युवाओं की बेरोजगारी दर 2025 में 9.9 प्रतिशत रही। शहरी युवाओं में यह आंकड़ा 13.6 प्रतिशत था। यानी तस्वीर में सुधार के सरकारी दावे अपनी जगह हैं, लेकिन युवा रोजगार का सवाल अभी भी इतना बड़ा है कि उसे केवल आंकड़ों से खारिज नहीं किया जा सकता।
सवाल घोषणाओं का नहीं, भरोसे का है
यहां मोदी सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती रोजगार की नई घोषणा करना नहीं, बल्कि युवा और सरकार के बीच भरोसे की उस दूरी को कम करना है, जो लगातार आंदोलनों के बीच दिखाई दे रही है।
सरकार यह कह सकती है कि 2017-18 से 2023-24 के बीच देश में कुल रोजगार 47.5 करोड़ से बढ़कर 64.33 करोड़ हुआ और बेरोजगारी दर 6 प्रतिशत से घटकर 3.2 प्रतिशत हुई। सरकार यह भी बता सकती है कि प्रधानमंत्री विकसित भारत रोजगार योजना के तहत जून 2026 तक लगभग 70 लाख नए रोजगार सृजित होने की जानकारी दी गई थी।
लेकिन दूसरी तरफ जंतर-मंतर पर बैठा युवा अपने आसपास की वास्तविकता देखता है। वह भर्ती परीक्षा के लिए वर्षों इंतजार करता है। वह पेपर लीक की खबरें देखता है। वह परिणाम और नियुक्ति के बीच का लंबा अंतराल देखता है। वह निजी क्षेत्र की अस्थिर नौकरियों और प्रतियोगिता की बढ़ती मार को महसूस करता है।
यही कारण है कि आज के युवा को केवल यह बताना पर्याप्त नहीं कि भारत विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्था बन रहा है। वह पूछेगा—उस विकास में मेरी नौकरी कहां है? मेरी आय कहां है? मेरी सुरक्षा कहां है? मेरी योग्यता का सम्मान कहां है?
युवा अब वोटर ही नहीं, सवाल पूछने वाली ताकत है
भारत की सबसे बड़ी ताकत उसका विशाल युवा वर्ग है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश की लगभग 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम उम्र की है। यही वर्ग भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश को आर्थिक ताकत में बदल सकता है। लेकिन यही ताकत सत्ता के लिए चुनौती भी बन सकती है, यदि उसकी आकांक्षाओं और वास्तविकता के बीच लगातार दूरी बनी रहे।
जंतर-मंतर से लेकर झारखंड तक छात्रों का सड़क पर उतरना इसी चेतावनी को पढ़ने का अवसर है। झारखंड में JPSC-JSSC से जुड़े मुद्दों को लेकर आंदोलन तेज हुआ है और छात्रों ने 20 अगस्त को मुख्यमंत्री आवास के घेराव की घोषणा तक की है। यह आंदोलन भले राज्य सरकार के खिलाफ हो, लेकिन इसके भीतर मौजूद मुद्दे—भर्ती, परीक्षा व्यवस्था, पारदर्शिता और रोजगार—पूरे देश के युवा मानस से जुड़े हैं।
दिल्ली में Gen-Z को लेकर भाजपा की राजनीतिक सक्रियता भी इसी बदलते परिदृश्य की ओर संकेत करती है। जंतर-मंतर के आंदोलनों के बाद राजनीतिक दलों का युवाओं की ओर बढ़ता ध्यान बताता है कि आने वाले समय में युवा केवल चुनावी भीड़ नहीं, बल्कि राजनीतिक एजेंडा तय करने वाली ताकत बन सकता है।
मोदी के सामने असली परीक्षा अब शुरू
नरेंद्र मोदी के लिए चुनौती यह नहीं है कि वे युवाओं को कितनी बार ‘भारत की शक्ति’ कहकर संबोधित करते हैं। चुनौती यह है कि भारत का युवा अपनी शक्ति का परिणाम अपने जीवन में कब महसूस करेगा।
AI की ट्रेनिंग मिले—लेकिन उसके बाद रोजगार भी मिले।
मुफ्त कोचिंग मिले—लेकिन परीक्षा समय पर हो।
भर्ती निकले—लेकिन नियुक्ति भी समय पर हो।
नौकरी का लक्ष्य घोषित हो—लेकिन उसका स्वतंत्र और पारदर्शी हिसाब भी जनता के सामने आए।
स्टार्टअप की बात हो—लेकिन छोटे शहरों के युवा को भी पूंजी, बाजार और अवसर मिलें।
यही वह कसौटी है जिस पर आने वाले वर्षों में मोदी सरकार की युवा नीति को परखा जाएगा।
भाजपा और नरेंद्र मोदी यदि सचमुच यह महसूस कर चुके हैं कि भारत का युवा देश की सबसे बड़ी शक्ति है, तो अब उस शक्ति से केवल तालियां मांगने का समय खत्म हो चुका है। अब उस शक्ति को परिणाम चाहिए।
देश का जागृत युवा को लंबे भाषणों से प्रभावित करना आसान नहीं है। वह घोषणा सुनता है, लेकिन उसका इंतजार जमीन पर परिणाम का होता है। वह आंकड़ा देखता है, लेकिन अपने हाथ में नियुक्ति पत्र भी चाहता है। वह ‘विकसित भारत’ का सपना सुनता है, लेकिन अपने वर्तमान को भी सुरक्षित देखना चाहता है, और यही कारण है कि जंतर-मंतर से उठती आवाज को केवल एक आंदोलन समझना राजनीतिक भूल होगी।
यह उस पीढ़ी की दस्तक है जो पूछ रही है—भारत वैश्विक शक्ति कब बनेगा, यह तो बताया जा रहा है; लेकिन उस भारत में हमारे लिए अवसर कब बनेंगे? मोदी सरकार के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या वह इस दस्तक को समय रहते समझेगी, या फिर अगली बार यही युवा केवल सवाल पूछने नहीं, जवाब लेने के लिए और बड़ी संख्या में सड़कों पर होगा?
