सिंधिया ने उठाए सवाल, आठ पुलिसकर्मी निलंबित; क्या छोटे कर्मचारियों पर कार्रवाई कर बड़े जिम्मेदारों को बचाया जा रहा है?
ग्वालियर 18 अक्टूबर 2026। शीतला माता मंदिर हादसे में 15 लोगों की मौत ने पूरे शहर को झकझोर दिया है। लेकिन इस हृदयविदारक घटना पर शोक जताने और आर्थिक सहायता बांटने भर से क्या जिम्मेदारी पूरी हो जाती है?
सबसे बड़ा सवाल अब भी कायम है—रात के अंधेरे में भारी ट्रक मंदिर की ओर जाने वाली घाटी तक पहुंचा कैसे, जबकि रास्ते में जगह-जगह पुलिस की तैनाती और बैरिकेडिंग थी? क्या भीषण हादसे को अंजाम देने वाली इस गंभीर चूक के लिए सिर्फ निलंबन की औपचारिक कार्रवाई पर्याप्त है?
ट्रक रास्ता भटका या व्यवस्था ने रास्ता दिया?
पुलिस अधिकारियों के बयानों के मुताबिक, दिल्ली निवासी ट्रक चालक डबरा से माल लेकर पंजाब जा रहा था। रास्ते से अनजान चालक गूगल मैप के सहारे भटककर शीतला माता मंदिर की ओर जाने वाली घाटी तक पहुंच गया। बताया जा रहा है कि ट्रक के ब्रेक फेल होने से हादसा हुआ, हालांकि दुर्घटना के वास्तविक कारणों की पुष्टि जांच के बाद ही होगी।
लेकिन यहां सवाल सिर्फ चालक के रास्ता भटकने या ब्रेक फेल होने का नहीं है। ट्रक कोई साइकिल नहीं था, जिसे बैरिकेडिंग के बीच से निकाल लिया जाए। न ही वह आसमान से उतरकर घाटी में पहुंचा था। आखिर रास्ते में तैनात पुलिसकर्मियों और सुरक्षा व्यवस्था की नजरों से गुजरकर इतना भारी वाहन प्रतिबंधित या संवेदनशील क्षेत्र तक कैसे पहुंच गया? क्या किसी ने उसे रोका, जांचा या प्रवेश की अनुमति दी? यदि बैरिकेडिंग के बावजूद ट्रक आगे बढ़ा, तो यह महज चूक थी या किसी स्तर पर मिलीभगत—इसकी निष्पक्ष जांच जरूरी है। अवैध प्रवेश के बदले कथित वसूली की आशंका भी सामने आती है, जिसकी पुष्टि साक्ष्यों से की जानी चाहिए।
आठ निलंबन काफी नहीं, जवाबदेही ऊपर तक तय हो
केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अस्पताल पहुंचकर मृतकों और घायलों के परिजनों से मुलाकात की। उन्होंने घटना पर गहरा दुख जताते हुए कहा कि रात के अंधेरे में ट्रक वहां पहुंचा कैसे, यह गंभीर जांच का विषय है। उन्होंने मुख्यमंत्री से तीन बार चर्चा होने और उन्हें ग्वालियर आने का आग्रह करने की बात भी कही। सिंधिया ने स्पष्ट किया कि हादसे के जिम्मेदारों को बख्शा नहीं जाना चाहिए।
घटना के बाद आठ पुलिसकर्मियों को निलंबित किए जाने और सीएसपी को हटाने जैसी कार्रवाई की जानकारी सामने आई है। मृतकों के परिजनों को प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री राहत कोष से आर्थिक सहायता भी दी जा रही है। अस्पताल में भर्ती 31 मरीजों में से 13 को डिस्चार्ज किए जाने, तीन के भर्ती रहने और दो के आईसीयू में होने की जानकारी भी दी गई है।
सवाल यह है कि 15 अधिक जिंदगियां चली जाने के बाद क्या निलंबन और मुआवजा ही न्याय है? निलंबन अंतिम दंड नहीं है। यदि जांच में मौके पर तैनात कर्मियों की गंभीर लापरवाही, मिलीभगत या अवैध वसूली साबित होती है, तो बर्खास्तगी और आपराधिक कार्रवाई पर विचार होना चाहिए। साथ ही मुख्यमंत्री को पुलिस और प्रशासन के जिला प्रमुखों की भूमिका और जवाबदेही तय की जानी चाहिए।
पटवारियों पर सख्ती, तो इस मामले में नरमी और दिखावा क्यों?
स्वामित्व योजना के काम में देरी और अनुशासनहीनता के आरोपों पर पटवारियों के विरुद्ध बर्खास्तगी जैसी कठोर कार्रवाई की जा चुकी है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब प्रशासनिक काम में लापरवाही अथवा अनुशासनहीनता पर कर्मचारियों को दंडित किया जा सकता है, तो करीब डेढ़ दर्जन श्रद्धालुओं की जान लेने वाले इतने भीषण हादसे में जिम्मेदारी तय करने का पैमाना क्या होगा?
घटना की मजिस्ट्रियल जांच के आदेश दिए जाने की जानकारी है। अब जरूरी है कि जांच केवल ट्रक चालक, ब्रेक फेल होने और रास्ता भटकने तक सीमित न रहे। ट्रक के पूरे रूट, बैरिकेडिंग, प्रवेश बिंदुओं, ड्यूटी पर तैनात कर्मचारियों, उपलब्ध सीसीटीवी फुटेज और वायरलेस रिकॉर्ड की जांच हो। जहां भी लापरवाही या मिलीभगत सामने आए, वहां कार्रवाई पद देखकर नहीं, अपराध और जिम्मेदारी के आधार पर हो।
ग्वालियर को केवल मुआवजा नहीं, जवाब चाहिए। 15 से अधिक मौतों का हिसाब चाहिए। आखिर ट्रक को रोका क्यों नहीं गया और इस चूक की जिम्मेदारी किसकी है?
