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शीतला माता हादसा: ट्रक मंदिर तक पहुंचा कैसे, कार्रवाई में जिम्मेदारों के नाम गायब क्यों?

15 से अधिक मौतों के बाद पुलिस कार्रवाई पर उठे सवाल, चीनौर थाना प्रभारी का नाम आदेश से बाहर होने और वरिष्ठ अधिकारियों को राहत मिलने पर निष्पक्षता कठघरे में; सात दिन की मजिस्ट्रियल जांच पर टिकी निगाहें

ग्वालियर। शीतला माता मंदिर हादसे में 15 से अधिक लोगों की मौत ने पूरे शहर को झकझोर दिया है। हादसे के बाद प्रशासन ने मजिस्ट्रियल जांच के आदेश देकर अपर जिला मजिस्ट्रेट सीबी प्रसाद को जिम्मेदारी सौंपी है। कलेक्टर रुचिका चौहान के निर्देश पर जांच सात दिनों के भीतर पूरी किए जाने की बात कही जा रही है। लेकिन जांच के नतीजे आने से पहले ही पुलिस विभाग की कार्रवाई सवालों के घेरे में आ गई है।

सबसे बड़ा सवाल है कि डबरा से धान लोड करके चीनौर के रास्ते मंदिर तक भारी ट्रक पहुंचने के पीछे रास्ते में तैनात पुलिसकर्मियों की भूमिका की चर्चा है, तो कार्रवाई में केवल कुछ नामों पर ही शिकंजा क्यों कसा गया? क्या जिम्मेदारी तय करने में पद, प्रभाव और पहुंच का अंतर आड़े आ रहा है?

₹200 लेकर रास्ता देने का आरोप, फिर ट्रक मंदिर तक कैसे पहुंचा?

सूत्रों, वायरल खबरों और प्रत्यक्षदर्शियों के हवाले से सामने आ रही जानकारी के मुताबिक, चीनौर और घाटी/रोड की ओर से मंदिर के रास्ते गुजरने के लिए दो ट्रकों को कथित तौर पर पुलिसकर्मियों द्वारा 200-200 रुपये लेकर अनुमति दी गई थी। बताया जा रहा है कि इनमें से एक ट्रक निकल गया, जबकि दूसरे ट्रक ने मंदिर क्षेत्र में मौत का तांडव मचा दिया। हालांकि, कथित लेन-देन और ट्रकों को अनुमति दिए जाने की पुष्टि स्वतंत्र साक्ष्यों तथा जांच से होना अभी बाकी है।

यदि इन आरोपों में सच्चाई है, तो मामला महज एक सड़क हादसे या ड्यूटी में लापरवाही तक सीमित नहीं रह जाता। यह सवाल बन जाता है कि प्रतिबंधित अथवा संवेदनशील मार्ग पर भारी वाहन को आगे बढ़ने का सिलसिला कहां से शुरू हुआ और यह अनुमति किस-किस ने दी, किस स्तर पर निगरानी विफल हुई और क्या रास्ते में मौजूद पुलिस व्यवस्था ने अपने कर्तव्य का पालन किया?

यद्यपि घाटी के ऊपर स्थित चेक पॉइंट और मंदिर परिसर का अधिकांश क्षेत्र आंतरी और झांसी रोड थाना क्षेत्र में है लेकिन ऐसे में यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि ट्रक वहां तक किस मार्ग से पहुंचा। क्या उसने चीनौर थाना क्षेत्र की सड़क का इस्तेमाल किया था? यदि हां, तो उस मार्ग पर तैनात पुलिसकर्मियों और संबंधित थाना प्रभारी की भूमिका की जांच किस आधार पर की गई या फिर ट्रक किसी दूसरे रास्ते अथवा हवाई मार्ग से पहुंचा? आधिकारिक बयान अनुसार जब चीनौर रोड से मंदिर तक ट्रक पहचने की बात कहीं गई है तो फिर इसके थाना प्रभारी को जवाबदेयी से रियायत किस आधार पर दी गई?

ड्यूटी खत्म होने के बाद वालों पर कार्रवाई, घटना के वक्त तैनात कर्मियों की जवाबदेही कहां?

पुलिस कार्रवाई को लेकर एक और गंभीर सवाल उठ रहा है। सूत्रों के मुताबिक, निलंबित पुलिसकर्मियों में कुछ ऐसे भी बताए जा रहे हैं जिनकी ड्यूटी हादसे से दो से तीन घंटे पहले समाप्त हो चुकी थी। यदि यह जानकारी सही है, तो जांच में यह स्पष्ट करना जरूरी है कि संबंधित कर्मचारियों को किस आधार पर जिम्मेदार माना गया और घटना के समय वास्तव में ड्यूटी पर मौजूद कर्मियों की भूमिका क्या थी।

हादसे के दौरान और उससे पहले कम से कम एक घंटे तक मौके, रास्ते अथवा संबंधित चेक पॉइंट पर तैनात पुलिसकर्मियों की जिम्मेदारी की जांच क्यों और किस सीमा तक हुई? क्या ड्यूटी चार्ट, वायरलेस संदेश, वाहन की आवाजाही और मौके पर मौजूद कर्मचारियों के बयानों का मिलान किया गया? किसी कर्मचारी की ड्यूटी समाप्त होना अपने आप में उसे निर्दोष साबित नहीं करता, ठीक उसी तरह केवल किसी स्थान या थाने से जुड़ा होना उसे दोषी ठहराने का आधार भी नहीं हो सकता। जिम्मेदारी साक्ष्यों से तय होनी चाहिए, न कि चुनिंदा नामों के आधार पर।

सीएसपी पर कार्रवाई, तो वरिष्ठ अधिकारियों की जवाबदेही का पैमाना क्या है?

नगर पुलिस अधीक्षक रवि भदौरिया को पद से हटाए जाने के बाद पुलिस विभाग की जवाबदेही को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। यदि प्रशासनिक स्तर पर (मॉनिटरिंग अधिकारी) सीएसपी के विरुद्ध कार्रवाई उचित मानी गई, तो अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक और पुलिस अधीक्षक की भूमिका की समीक्षा किस आधार पर की गई? क्या वरिष्ठ अधिकारियों की जिम्मेदारी, निगरानी और घटनास्थल तक भारी वाहन पहुंचने से जुड़े सुरक्षा इंतजामों की अलग से जांच हुई?

यहां सवाल किसी अधिकारी को बिना जांच दोषी ठहराने का नहीं, बल्कि एक समान कसौटी पर जवाबदेही तय करने का है। यदि सीएसपी की भूमिका और जवाबदेही की समीक्षा हो सकती है, तो उससे वरिष्ठ अधिकारियों की पर्यवेक्षण संबंधी जिम्मेदारी की जांच भी होनी चाहिए। दूसरी ओर, केवल उच्च पद पर होने के कारण किसी अधिकारी को दोषी मान लेना भी उचित नहीं होगा। कार्रवाई का आधार पद नहीं, बल्कि भूमिका, उपलब्ध जानकारी और कर्तव्य में हुई चूक के प्रमाण होने चाहिए।

आदेश से नाम हटने की चर्चा और कथित हस्तक्षेप के आरोप

कार्रवाई के शुरुआती दौर में चीनौर थाना प्रभारी शैलेंद्र घुरैया का नाम भी संभावित कार्रवाई के संदर्भ में चर्चा में आने की बात सूत्र बता रहे हैं। हालांकि, अंतिम आदेश में उनका नाम शामिल नहीं होने को लेकर सवाल उठ रहे हैं। क्या जांच में उनकी भूमिका की समीक्षा की गई? क्या उन्हें जिम्मेदारी से मुक्त करने के पीछे कोई तथ्यात्मक आधार था, या उनकी भूमिका की जांच अभी बाकी है? संबंधित आदेश और विभागीय रिकॉर्ड सामने आने के बाद ही स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

इस मामले में कुछ सूत्रों द्वारा भोपाल में सेवा भारती एवं रेड क्रॉस सोसाइटी से जुड़े प्रदेश स्तर के पदाधिकारी के कथित हस्तक्षेप या बचाव की बात भी कही जा रही है। लेकिन इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि और किसी संबंधित पदाधिकारी की भूमिका के प्रमाण फिलहाल सामने नहीं हैं। इसलिए यह जांच का विषय है कि क्या किसी बाहरी दबाव ने कार्रवाई को प्रभावित किया, अथवा नाम हटाने के पीछे कोई आधिकारिक और तथ्यात्मक कारण था। संबंधित पक्षों का जवाब सामने आना भी जरूरी है।

सात दिन की जांच: दूध का दूध, पानी का पानी होगा?

अब पूरी निगाहें मजिस्ट्रियल जांच पर हैं। जांच अधिकारी सीबी प्रसाद के सामने सबसे महत्वपूर्ण चुनौती केवल हादसे के तत्काल कारणों का पता लगाना नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था की जिम्मेदारी तय करना है जिसके बीच भारी ट्रक मंदिर तक पहुंचा। ट्रक ने कौन-सा रास्ता लिया, किसने उसे रोका या जाने दिया, कथित वसूली के आरोपों में कितनी सच्चाई है, घटना के समय किसकी ड्यूटी थी, किन अधिकारियों को पहले से क्या जानकारी थी और कार्रवाई के आदेश में नाम शामिल करने या हटाने का आधार क्या रहा—इन सभी बिंदुओं की निष्पक्ष पड़ताल जरूरी है।

सीसीटीवी फुटेज, चेक पॉइंट रिकॉर्ड, ड्यूटी चार्ट, वायरलेस संदेश, संबंधित अधिकारियों एवं प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और विभागीय आदेश जांच को निर्णायक दिशा दे सकते हैं। सात दिनों की समय-सीमा में जांच पूरी करने का लक्ष्य तभी सार्थक होगा, जब सभी महत्वपूर्ण साक्ष्यों को सुरक्षित रखकर प्रत्येक संबंधित व्यक्ति की भूमिका की निष्पक्ष समीक्षा की जाए।

शीतला माता मंदिर हादसे में मृतकों को सच्ची श्रद्धांजलि केवल निलंबन और पद से हटाने की कार्रवाई से नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने से मिलेगी। यदि रास्ते में तैनात किसी कर्मचारी ने लापरवाही की, तो उसके विरुद्ध कार्रवाई होनी चाहिए; यदि पर्यवेक्षण में वरिष्ठ स्तर पर चूक हुई, तो उसकी भी जांच होनी चाहिए। और यदि किसी व्यक्ति पर लगाए गए आरोप निराधार हैं, तो उसे भी तथ्यों के आधार पर स्पष्ट किया जाना चाहिए। सात दिन बाद आने वाला जांच निष्कर्ष केवल हादसे की कहानी नहीं, बल्कि यह भी बताएगा कि कार्रवाई वास्तव में साक्ष्यों के आधार पर हुई या जवाबदेही तय करने में कोई महत्वपूर्ण कड़ी छूट गई।