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सुरक्षा के नाम पर लूट ! स्कूली व यात्री वाहनों में पैनिक बटन बना कमाई का बटन

सुरक्षा का आदेश बना मुनाफे की व्यवस्था..

सरकारी गाइडलाइन नहीं, बाजार में मनमानी वसूली, परिहन अधिकारी असहाय..

भोपाल 3 जनवरी 2026। बच्चों और आम यात्रियों की सुरक्षा को लेकर लागू की गई पैनिक बटन और GPS/VLTD व्यवस्था मध्य प्रदेश में उद्देश्य से भटकती नजर आ रही है और बच्चों एवं यात्रियों की सुरक्षा से ज्यादा वाहन मालिकों के लिए पैनिक होती जा रही है। शासन ने स्कूली एवं यात्री वाहनों में इन उपकरणों को अनिवार्य तो कर दिया, लेकिन उनकी कीमत, इंस्टॉलेशन और सालाना सेवा शुल्क को लेकर कोई स्पष्ट गाइडलाइन तय नहीं की। इसी नीति-शून्य का लाभ उठाकर निजी कंपनियों ने पैनिक बटन को सुरक्षा उपकरण की जगह एक व्यवसायिक उत्पाद बना दिया है, जिसकी कीमत और उपयोगिता के बीच कोई संतुलन नहीं दिखता।

प्रदेश में वर्तमान में अनुमानित 1.20 लाख से अधिक स्कूली एवं यात्री वाहन इस नियम के दायरे में आते हैं। यदि एक वाहन पर औसतन 10 से 14 हजार रुपये तक वसूले जा रहे हैं, तो यह व्यवस्था सीधे तौर पर सैकड़ों करोड़ रुपये के कारोबार में बदल चुकी है, जबकि शासन के स्तर पर यह स्पष्ट नहीं है कि यह राशि किस मानक के आधार पर ली जा रही है।

कीमत तय नहीं, वसूली तय — वाहन मालिकों पर सीधा बोझ..

पैनिक बटन और GPS/VLTD सिस्टम की वास्तविक बाजार कीमत विशेषज्ञों के अनुसार 3,500 से 4,000 रुपये के बीच बताई जाती है। इसके बावजूद वाहन मालिकों से इंस्टॉलेशन के नाम पर 10 हजार से 14 हजार रुपये तक वसूले जा रहे हैं। इसके बाद हर साल मेंटेनेंस और डेटा सेवा के लिए 4 से 6 हजार रुपये तक का अतिरिक्त शुल्क लिया जा रहा है।
स्कूल संचालकों और बस ऑपरेटरों का कहना है कि नियम अनिवार्य होने के कारण उनके पास विकल्प नहीं है। भुगतान नहीं करने पर चालान, परमिट निरस्तीकरण और वाहन सीज करने की कार्रवाई का भय बना रहता है। इस स्थिति में सुरक्षा एक स्वैच्छिक व्यवस्था न रहकर आर्थिक मजबूरी में बदल गई है, जिसका सीधा असर परिवहन व्यवसाय और अंततः यात्रियों पर पड़ रहा है।

सिस्टम मौजूद, लेकिन आपात स्थिति में सवालों के घेरे में..

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि जिन पैनिक बटनों को आपात स्थिति में जीवन रक्षक बताया गया था, उनकी उपयोगिता पर ही सवाल उठने लगे हैं। कई जिलों में लगाए गए पैनिक बटन पुलिस कंट्रोल रूम या 112 सेवा से सीधे जुड़े नहीं हैं, जिससे बटन दबाने के बावजूद त्वरित सहायता सुनिश्चित नहीं हो पा रही है। तकनीकी ऑडिट और नियमित मॉनिटरिंग के अभाव में यह सिस्टम कई जगह केवल औपचारिकता बनकर रह गया है।

स्थानीय/क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी भी असहाय

जब इस समस्या को लेकर स्थानीय स्तर पर परिवहन अधिकारियों से शिकायत की जाती है, तो वाहन मालिकों को यह कहकर टाल दिया जाता है कि —
🟠 रेट तय करने या कंपनियों पर कार्रवाई का अधिकार उनके पास नहीं है।
🟠 कई जिलों में यह व्यवस्था पुराने टेंडर के तहत बीएसएनएल या चयनित एजेंसियों के माध्यम से संचालित हो रही है।
🟠 नई कंपनियों की एंट्री पर न तो निगरानी है, न मूल्य नियंत्रण।

कई स्थानों पर यह पूरी व्यवस्था पुराने टेंडर के तहत सीमित एजेंसियों के भरोसे संचालित हो रही है, जबकि नई कंपनियों की जवाबदेही और मूल्य नियंत्रण को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं हैं।

सुरक्षा का उद्देश्य आदेश जारी करने से पूरा नहीं होता, बल्कि पारदर्शी मूल्य निर्धारण, तकनीकी प्रभावशीलता और जवाबदेही से पूरा होता है। यदि पैनिक बटन केवल चालान से बचने का साधन बनकर रह गया और आपात स्थिति में काम नहीं आया तो यह बच्चों और यात्रियों दोनों की सुरक्षा के साथ समझौता होगा। अब आवश्यकता है कि शासन इस व्यवस्था को बाजार के भरोसे छोड़ने के बजाय स्पष्ट नीति और निगरानी के दायरे में लाए। यद्यपि इस पर कारगर नीति बनाने के क्रम में मध्य प्रदेश परिवहन आयुक्त विवेक शर्मा शासन स्तर पर विमर्श एवं पत्राचार कर रहे हैं।