आज जब पूरा विश्व वैश्वीकरण के दौर से गुजर रहा है, तब आत्मनिर्भरता केवल आर्थिक नीति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता का प्रश्न बन चुकी है। आत्मनिर्भरता का मूल भाव है—अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति स्वयं करना, चाहे वह दैनिक उपयोग की वस्तुएँ हों, तकनीक हो, शिक्षा हो या उद्योग।
वैश्वीकरण ने जहाँ दुनिया को निकट लाया है, वहीं कुछ शक्तिशाली राष्ट्रों को यह अवसर भी दिया है कि वे अपने आर्थिक हितों के लिए कमजोर देशों को नियंत्रित करें। आयात-निर्यात शुल्क, प्रतिबंध, तकनीकी निर्भरता और बाजार नियंत्रण के माध्यम से यह दबाव लगातार बढ़ रहा है। जो देश दवाइयों, हथियारों, मशीनरी और टेक्नोलॉजी के लिए दूसरों पर निर्भर हैं, वे अनचाहे समझौतों के लिए विवश होते हैं।
इस चुनौती का समाधान आत्मनिर्भर भारत की दिशा में ठोस कदम उठाने में निहित है। स्थानीय संसाधनों के उपयोग से उत्पादन, लघु व कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन और स्वदेशी तकनीक का विकास—यही वह मार्ग है जो भारत को आर्थिक रूप से सशक्त बना सकता है। जब हमारी वस्तुएँ गुणवत्ता और विश्वसनीयता के साथ वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा करेंगी, तभी किसी बाहरी दबाव का प्रभाव सीमित होगा।
इतिहास साक्षी है कि भारत कभी आत्मनिर्भरता का जीवंत उदाहरण था। भारतीय मसालों की विश्वव्यापी मांग ने देश को ‘सोने की चिड़िया’ की संज्ञा दिलाई। घर-घर कुटीर उद्योग थे, जिनसे न केवल रोजगार सृजन हुआ बल्कि समृद्धि भी आई। शिक्षा के क्षेत्र में नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालय विश्वविख्यात थे, जहाँ एशिया के अनेक देशों से विद्यार्थी अध्ययन हेतु आते थे। यही कारण था कि भारत को ‘विश्वगुरु’ के रूप में सम्मान प्राप्त हुआ।
आज स्थिति उलट है। बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ मुनाफे की होड़ में गुणवत्ता की अनदेखी कर रही हैं। आकर्षक विज्ञापनों के माध्यम से अस्वास्थ्यकर खाद्य पदार्थों को जीवनशैली का हिस्सा बनाया जा रहा है, जबकि हमारी पारंपरिक, पौष्टिक और सुलभ खाद्य संस्कृति हाशिए पर चली गई है। स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्परिणामों की चेतावनियाँ अनसुनी की जा रही हैं।
विडंबना यह भी है कि एक ओर विदेशी उत्पादों के बहिष्कार की बात होती है, वहीं दूसरी ओर उन्हीं देशों की तकनीक और वस्तुओं पर निर्भरता निरंतर बढ़ रही है। यह विरोधाभास आत्मनिर्भरता के विचार को कमजोर करता है। केवल प्रतीकात्मक विरोध नहीं, बल्कि व्यवहारिक परिवर्तन ही स्थायी समाधान है। आवश्यक है कि शिक्षा और उद्योग को पुनः समाज के केंद्र में लाया जाए। युवाओं को केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि उत्पादक बनाया जाए। स्थानीय उत्पादन, गुणवत्ता नियंत्रण और स्वदेशी नवाचार को राष्ट्रीय आंदोलन का स्वरूप देना होगा।
आत्मनिर्भरता के बिना न तो आर्थिक स्वतंत्रता संभव है और न ही वैश्विक सम्मान। यदि भारत को पुनः ‘सोने की चिड़िया’ बनना है, तो उसे अपने संसाधनों, ज्ञान और श्रम पर विश्वास करना होगा। यही मार्ग भारत को संपूर्ण विकसित राष्ट्र की ओर ले जाएगा।
( लेखक: डॉ. लाल सिंह, प्राध्यापक )
