ग्वालियर, कुलैथ। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री का किसी सरकारी कार्यक्रम में जाना स्वाभाविक माना जाता है, लेकिन कुलैथ में एक ऐसे युवक के निजी कार्यक्रम में उनकी उपस्थिति ने राजनीतिक हलकों में तीखी चर्चा छेड़ दी है। सवाल सिर्फ कार्यक्रम का नहीं, बल्कि उस संदेश का है जो इससे संगठन और प्रशासन—दोनों को गया।
बताया जा रहा है कि संबंधित युवक कुछ वर्ष पहले ही में शामिल हुए हैं, जबकि उनके पिता पूर्व में समाजवादी और कांग्रेस की राजनीति से जुड़े रहे हैं। ऐसे में मुख्यमंत्री का निजी आयोजन में शामिल होना—वह भी पूरे प्रशासनिक अमले की मौजूदगी के साथ—क्या संगठनात्मक मर्यादा के अनुरूप है? यही प्रश्न पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच गूंज रहा है।
प्रशासनिक तंत्र भी हुआ सक्रिय
मुख्यमंत्री के आगमन के साथ ही एसपी, कलेक्टर सहित पूरा प्रशासनिक अमला कार्यक्रम स्थल पर मौजूद रहा। सरकारी हेलिकॉप्टर सीधे कार्यक्रम स्थल पर उतरा। आलोचकों का कहना है कि इससे यह संदेश गया कि “व्यक्ति विशेष” को सत्ता का विशेष संरक्षण प्राप्त है। यदि यह निजी आयोजन था, तो प्रशासनिक सक्रियता क्यों?
संगठन बनाम व्यक्ति विशेष
भाजपा की कार्यसंस्कृति में “संगठन सर्वोपरि” का सिद्धांत बार-बार दोहराया जाता है। ऐसे में स्थानीय कार्यकर्ताओं का एक वर्ग मानता है कि कार्यक्रम की जानकारी और समन्वय संगठन स्तर पर नहीं हुआ। कई पुराने कार्यकर्ता केवल “चेहरा दिखाने” पहुंचे, लेकिन भीतर ही भीतर असंतोष स्पष्ट था।
सवाल उठता है—क्या पार्टी के पुराने समर्पित नेताओं को दरकिनार कर नए चेहरों को तरजीह दी जा रही है?
ग्वालियर में बढ़ती नाराज़गी
जहां एक ओर मुख्यमंत्री मोहन यादव पर प्रदेश में जातिगत बढ़ावा देने के आरोप जनता में सरेआम देखे जा सकते हैं, वहीं आज ग्वालियर अंचल में वर्षों से संगठन की लाइन पर चलने वाले नेताओं को मुख्यमंत्री से समय मिलना मुश्किल बताया जाता है। वहीं, सपा से हाल में भाजपा में आए सामान्य कार्यकर्ता के निजी कार्यक्रम में शीर्ष नेतृत्व की उपस्थिति—स्थानीय राजनीति में असंतुलन का संकेत मानी जा रही है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि सजातीय समीकरणों के मोह में यदि संगठनात्मक संतुलन बिगड़ा, तो इसका दीर्घकालिक असर पड़ सकता है और ऐसा पहली मर्तबा ही नहीं हुआ।
शीर्ष नेतृत्व तक जाए बात?
कुछ कार्यकर्ताओं का मानना है कि इस पूरे घटनाक्रम की जानकारी प्रधानमंत्री और गृहमंत्री तक पहुंचाई जानी चाहिए, ताकि संगठनात्मक अनुशासन और संतुलन पर स्पष्ट संदेश जाए। उनका तर्क है_“बाहरी लोगों के सहारे न सरकार टिकती है, न संगठन।”
कुलैथ का यह कार्यक्रम केवल एक निजी आयोजन नहीं, बल्कि संगठन और सरकार के रिश्तों पर उठता बड़ा सवाल बन गया है। क्या यह रणनीतिक राजनीतिक विस्तार है या संगठनात्मक मर्यादा का अतिक्रमण? ग्वालियर की सियासत में यह बहस अभी थमने वाली नहीं।
