ईओडब्ल्यू–लोकायुक्त में दर्ज शिकायतों का खुलासा, सरकार ने माना—जांच जारी
भोपाल। मध्यप्रदेश विधानसभा में आज एमपीआरडीसी से जुड़े तकनीकी सलाहकार आर.के. मेहरा के कथित भ्रष्ट कारनामों की गूंज सुनाई दी। प्रश्न क्रमांक 80 (क्र. 977) के तहत कांग्रेस पार्टी के लहार विधायक हेमंत सत्यदेव कटारे ने लोक निर्माण विभाग के मुख्य अभियंता आर.के. मेहरा, अधीक्षण यंत्री एल.के. दुबे, कार्यपालन यंत्री एवं सहायक यंत्री सहित अन्य अधिकारियों के खिलाफ ईओडब्ल्यू और लोकायुक्त में दर्ज शिकायतों का ब्योरा मांगा।
यद्यपि एमपीआरडीसी के तथाकथित कारनामों की सुर्खियां से साफ जाहिर है कि एमपीआरडीसी अपने आप में बड़ा सवाल है और इसके कारनामों की सदन में गूंज कोई नई बात नहीं है। इसके और भी मामले सदन में “सवाल- जवाब” की गुत्थी सुलझाने में प्रयास रहता है!
सरकार का जवाब: शिकायतें दर्ज, जांच जारी
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने सदन में स्वीकार किया कि:
* आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW) में 29.03.2023 को शिकायत क्रमांक 76/2023 दर्ज की गई।
* लोकायुक्त संगठन में शिकायत क्रमांक 3571/सी/25-26 दिनांक 07.01.2026 को दर्ज होकर पुलिस महानिदेशक को भेजी गई।
* संबंधित शिकायतें सत्यापनाधीन हैं।
* जांच उपरांत दोषी पाए जाने पर विधि अनुसार कार्रवाई का प्रावधान है।
सरकार ने यह भी माना कि लोकायुक्त में दर्ज शिकायत में आर.के. मेहरा (तत्कालीन चीफ इंजीनियर), एल.के. दुबे (कार्यपालन यंत्री) एवं एम.पी. सिंह (सहायक यंत्री) के नाम सम्मिलित हैं।
ओवरब्रिज निर्माण में आर्थिक अनियमितताओं का आरोप
सदन में यह मुद्दा भी उठा कि लोक निर्माण विभाग द्वारा आर्थिक अनियमितताएं कर बनवाए गए बड़विया ओवरब्रिज और संबंधित निर्माण कार्यों में गंभीर गड़बड़ियां सामने आईं।
प्रश्न के अनुसार_
रचना कंस्ट्रक्शन कंपनी (अंबलेश्वर, गुजरात) द्वारा बनाए गए ओवरब्रिज में वित्तीय अनियमितताओं की शिकायतें ईओडब्ल्यू और लोकायुक्त में दर्ज हैं।
यह भी पूछा गया कि क्या उक्त कंपनी को ब्लैकलिस्ट किया गया?
क्या ओवरब्रिज निर्माण का कार्य सबलेट कर दिया गया था?
यदि हां, तो क्या सबलेट ठेकेदार को नियमानुसार अनुभव था?
सरकार ने इन बिंदुओं पर विस्तृत तथ्य सार्वजनिक नहीं किए, केवल यह कहा कि शिकायतें सत्यापनाधीन हैं और दोष सिद्ध होने पर कार्रवाई होगी।
सवालों के घेरे में एमपीआरडीसी और तकनीकी सलाहकार
एमपीआरडीसी में तकनीकी सलाहकार की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है, जिस पर आरके मेहरा संविदा के रूप में पदस्थ हैं और यह एक मामले में जांच कमेटी के अध्यक्ष भी हैं। ऐसे में जब स्वयं विधानसभा में नाम लेकर शिकायतों का उल्लेख हो रहा है, तो यह केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और नैतिक जवाबदेही का भी प्रश्न बन गया है।
विपक्ष का आरोप है कि:
निर्माण कार्यों में मिलीभगत से आर्थिक अनियमितताएं हुईं।
नियमों को दरकिनार कर सबलेटिंग की गई।
गुणवत्ता और वित्तीय अनुशासन दोनों से समझौता हुआ।
कार्रवाई या केवल औपचारिकता ?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि_
2023 में दर्ज शिकायत पर अब तक ठोस कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
2026 में फिर वही नाम लोकायुक्त में क्यों पहुंचे?
क्या जांच केवल कागजी कार्रवाई बनकर रह जाएगी?
विधानसभा में उठे इस मुद्दे ने स्पष्ट कर दिया है कि एमपीआरडीसी और लोक निर्माण विभाग के भीतर की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हैं। यदि जांच निष्पक्ष और समयबद्ध नहीं हुई तो यह मामला प्रदेश में बड़े भ्रष्टाचार प्रकरण के रूप में उभर सकता है। युग क्रांति इस प्रकरण की निरंतर निगरानी करेगा और जांच की प्रगति पर पाठकों को अवगत कराता रहेगा।
