ईओडब्ल्यू–लोकायुक्त में प्रकरण के बावजूद आरके मेहरा बने तकनीकी सलाहकार, विधानसभा में सरकार ने माना मामला दर्ज
भोपाल 27 फरवरी 2026। मध्यप्रदेश विधानसभा में उठ एक सवाल ने मध्यप्रदेश रोड डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (एमपीआरडीसी) की कार्यप्रणाली पर एक और गंभीर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। जिसमें विधि-विधाई एवं तकनीकी कार्यों से संबंधित विभाग के ‘तकनीकी सलाहकार’ जैसे अहम पद पर नियम विरुद्ध नियुक्ति होना बताया जा रहा है।
अटेर विधायक हेमंत कटारे द्वारा पूछे गए प्रश्न के लिखित उत्तर में 18 जनवरी 2026 को मुख्यमंत्री मोहन यादव ने स्वयं स्वीकार किया कि एमपीआरडीसी के तकनीकी सलाहकार एवं लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) के तत्कालीन प्रमुख अभियंता आर.के. मेहरा के विरुद्ध ईओडब्ल्यू एवं लोकायुक्त में प्रकरण पंजीबद्ध हैं।
नियम क्या कहते हैं?
सामान्य प्रशासन विभाग के सेवा नियमों के अनुसार—
* किसी भी संविदा या प्रतिनियुक्ति पद पर नियुक्ति के लिए यह अनिवार्य है कि संबंधित उम्मीदवार के विरुद्ध विभागीय जांच लंबित न हो।
* ईओडब्ल्यू, लोकायुक्त, अन्य जांच एजेंसियों या न्यायाधिकरण में कोई प्रकरण दर्ज न हो।
* उम्मीदवार को आवेदन के साथ शपथपत्र (एफिडेविट) के माध्यम से यह घोषणा देनी होती है कि उसके विरुद्ध कोई आपराधिक/विभागीय प्रकरण लंबित नहीं है।
ऐसे में यहां सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जब सरकार स्वयं यह स्वीकार कर रही है कि आर.के. मेहरा के विरुद्ध ईओडब्ल्यू और लोकायुक्त में मामले दर्ज हैं, तो फिर उन्हें एमपीआरडीसी जैसे महत्वपूर्ण तकनीकी पद पर संविदा नियुक्ति किस आधार पर दी गई?
अवैध नियुक्ति या नियमों की अनदेखी ?
यदि नियमों के बावजूद नियुक्ति हुई है, तो यह न सिर्फ प्रशासनिक प्रक्रिया पर प्रश्नचिन्ह है, बल्कि यह भी संदेह उत्पन्न करता है कि कहीं गलत या भ्रामक एफिडेविट तो प्रस्तुत नहीं किया गया?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि एफिडेविट में तथ्य छुपाए गए हों, तो यह दंडनीय अपराध की श्रेणी में आ सकता है। वहीं यदि सरकार को पहले से जानकारी थी, तब नियुक्ति प्रक्रिया में छूट किस स्तर पर और किसके आदेश से दी गई—यह भी जांच का विषय है।
जवाबदेही तय होगी या संरक्षण जारी रहेगा?
एमपीआरडीसी प्रदेश की सड़कों और टोल परियोजनाओं से जुड़ा व्यापक तंत्र है। जिसमें तकनीकी सलाहकार जैसे महत्वपूर्ण पद पर नियुक्त व्यक्ति की निष्पक्षता और विधिक स्थिति सर्वोपरि होनी चाहिए।
विधानसभा में सरकार की स्वीकारोक्ति के बाद अब निगाहें इस पर हैं कि—क्या नियुक्ति रद्द की जाएगी ? क्या एफिडेविट की जांच होगी? या फिर नियमों को ताक पर रखकर संरक्षण की राजनीति जारी रहेगी?
प्रदेश की सड़कों से लेकर सदन तक गूंज रहे तमाम प्रश्नों सहित इस प्रकरण ने प्रशासनिक पारदर्शिता पर फिर एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। अब देखना यह है कि सरकार इस मामले में कार्रवाई करती है या इसे भी फाइलों में दबा दिया जाएगा।
