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पुलिस हाउसिंग में ‘आलोक मॉडल’ पर सवाल ?

करोड़ों की परियोजनाओं में नुकसान के बावजूद मिला प्रमोशन, अब वेतन वसूली माफी पर घिरे विवादों केेे बीच फिर चर्चाा में आलोक निगम 

भोपाल। मध्यप्रदेश पुलिस हाउसिंग एवं इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन में कार्यरत परियोजना यंत्री आलोक निगम एक बार फिर गंभीर सवालों के केंद्र में आ गए हैं। विभागीय सूत्रों के अनुसार, जिन परियोजनाओं और वित्तीय मामलों को लेकर वर्षों से विवाद उठते रहे हैं, उनमें आलोक निगम का नाम लगातार सामने आता रहा है। इसके बावजूद उन्हें न केवल महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी गईं, बल्कि हाल के वर्षों में पदोन्नति और विशेष प्रशासनिक संरक्षण मिलने के आरोप भी लग रहे हैं।

सूत्रों का दावा है कि सिवनी जिले के बरघाट में निर्मित आवासीय परियोजना की गुणवत्ता संबंधी खामियों के कारण शासन को लगभग 2 करोड़ रुपये की आर्थिक क्षति और भोपाल में किराये के वाहनों में करोड़ों के खेल का आरोप_इसके बावजूद संबंधित अधिकारी के विरुद्ध कठोर कार्रवाई के बजाय उन्हें प्रभारी अधीक्षण यंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद की जिम्मेदारी सौंप दी गई।

विवाद यहीं तक सीमित नहीं है। आरोप है कि आलोक निगम को वेतन निर्धारण में लाभ पहुंचाने के कारण लाखों रुपये का अतिरिक्त भुगतान हुआ। बाद में जब अधिक भुगतान की राशि की वसूली का प्रश्न उठा तो विभागीय स्तर पर उसे माफ कराने की प्रक्रिया अपनाई गई। सूत्रों के अनुसार लगभग 3.50 लाख रुपये की वसूली को लेकर लिए गए निर्णय ने वित्तीय नियमों और प्रशासनिक पारदर्शिता पर नए प्रश्न खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि निगम पुलिस हाउसिंग कॉरपोरेशन में फाइनेंस की जिम्मेदारी भी संभाल रहे हैं जबकि आशुतोष पांडे जैसे वित्त विभाग के क्लास वन ऑफिसर मौजूद है। इसी दौरन इनके द्वारा वेतन संबंधी इस क्रत्य को अंजाम दिया गया।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी अधिकारी को अतिरिक्त भुगतान हुआ है तो उसकी वसूली नियमों के अनुसार होना चाहिए। ऐसे मामलों में वसूली माफी का निर्णय केवल सक्षम वैधानिक प्रक्रिया के तहत ही संभव है। यही कारण है कि आलोक निगम से जुड़े प्रकरण को लेकर विभाग के भीतर और बाहर दोनों जगह चर्चाएं तेज हो गई हैं।

सूत्र यह भी बताते हैं कि पुलिस हाउसिंग की विभिन्न निर्माण परियोजनाओं में गुणवत्ता, वित्तीय प्रबंधन और प्रशासनिक निर्णयों को लेकर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। लेकिन आलोक निगम का नाम कई विवादित मामलों में आने के बावजूद उनकी जिम्मेदारियों में लगातार वृद्धि होना कई अधिकारियों और कर्मचारियों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। यदि यह अनदेखी के चलते अथवा जानबूझकर गलती की गई है तो दोनों हालातो में प्रबंध संचालक अनंत कुमार सिंह से इसमें सुधार अपेक्षा की जा सकती है क्योंकि चेयरमैन साहब से अपेक्षित सुधार की आशा रखना तो अंधे के समक्ष रोने के समान है।

कानूनी जानकारों का कहना है कि यदि किसी मामले में मिलीभगत, वित्तीय लाभ या नियमों के विपरीत निर्णय लेने के पर्याप्त प्रमाण मिलते हैं तो भारतीय न्याय संहिता (BNS) की आपराधिक षड्यंत्र संबंधी धाराओं के तहत भी जांच की जा सकती है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच होना आवश्यक है।

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिन मामलों में आर्थिक क्षति, अतिरिक्त भुगतान और प्रशासनिक निर्णयों पर प्रश्न उठ रहे हैं, उनमें आलोक निगम की भूमिका की निष्पक्ष जांच कब और किस स्तर पर होगी। यही प्रश्न अब पुलिस हाउसिंग के गलियारों से निकलकर सार्वजनिक बहस का विषय बनता जा रहा है कि इसी तरह से गलत तरीके से लिए गए वेतन की माफी मिलती रही तो यह खेल पूरे प्रदेश और देश में महामारी की तरह फैल जाएगा।