मोदी नेतृत्व की सरकार के 12 साल पूर्ण होने पर विशेष
नई दिल्ली। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में 2024 का लोकसभा चुनाव संपन्न हुआ और केंद्र में एक बार फिर एनडीए सरकार स्थापित हो गई है। लेकिन चुनावी आंकड़ों का सूक्ष्म विश्लेषण लोकतंत्र के एक ऐसे पहलू को उजागर करता है, जो राजनीतिक और संवैधानिक बहस का विषय बनता जा रहा है।
निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के अनुसार लोकसभा चुनाव 2024 में कुल मतदान लगभग 65.79 प्रतिशत हुआ। भाजपा को कुल पड़े मतों में लगभग 36.56 प्रतिशत वोट मिले, जबकि एनडीए गठबंधन का संयुक्त वोट शेयर लगभग 43 प्रतिशत रहा। इसका अर्थ यह है कि भाजपा को कुल पंजीकृत मतदाताओं का लगभग 24 प्रतिशत और एनडीए को लगभग 28 प्रतिशत समर्थन प्राप्त हुआ।
यानी देश की सत्ता उस गठबंधन के हाथ में है जिसे कुल मतदाता सूची में दर्ज नागरिकों के लगभग एक-चौथाई से थोड़ा अधिक मत प्राप्त हुए। यह तथ्य भारतीय लोकतंत्र की उस विशेषता को सामने लाता है जिसमें सरकार का गठन सीटों के बहुमत से होता है, न कि कुल मतदाताओं के बहुमत से। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भारत की वर्तमान “फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट” चुनाव प्रणाली में किसी प्रत्याशी या दल को अपने प्रतिद्वंद्वियों से अधिक वोट प्राप्त करना होता है। इसी कारण अपेक्षाकृत कम वोट प्रतिशत होने के बावजूद कोई दल या गठबंधन लोकसभा में स्पष्ट बहुमत हासिल कर सकता है और सरकार बना सकता है।
इसी संदर्भ में एक महत्वपूर्ण प्रश्न उभरता है। यदि कुल मतदाताओं के दृष्टिकोण से देखा जाए तो लगभग 28 प्रतिशत मतदाताओं ने ही एनडीए को प्रत्यक्ष समर्थन दिया। अर्थात देश के लगभग तीन-चौथाई मतदाता या तो किसी अन्य राजनीतिक विकल्प के साथ खड़े दिखाई दिए अथवा मतदान प्रक्रिया से स्वयं को दूर रखा। यही तथ्य इस बहस को जन्म देता है कि क्या सरकार को प्राप्त जनादेश वास्तव में देश की संपूर्ण मतदाता आबादी की बहुसंख्यक इच्छा का प्रतिनिधित्व करता है, या फिर यह संवैधानिक रूप से मान्य लेकिन सीमित जनसमर्थन का परिणाम है।
हालांकि लोकतांत्रिक व्यवस्था के समर्थक यह भी तर्क देते हैं कि मतदान न करने वाले प्रत्येक नागरिक को किसी दल का विरोधी नहीं माना जा सकता। लोकतंत्र में जनादेश उन्हीं मतों से निर्धारित होता है जो मतदान केंद्र तक पहुंचते हैं। इसके बावजूद यह सवाल बना रहता है कि जब किसी गठबंधन को कुल मतदाताओं के एक-तिहाई से भी कम प्रत्यक्ष समर्थन प्राप्त हुआ हो, तब उसे पूरे देश की निर्विवाद जन-इच्छा का प्रतीक मानने की सीमा क्या होनी चाहिए।
यही कारण है कि चुनावी आंकड़ों को लेकर एक नया विमर्श आकार ले रहा है। क्या भारत को भविष्य में ऐसी चुनावी व्यवस्था पर विचार करना चाहिए जिसमें वोट प्रतिशत और सीटों के अनुपात के बीच अधिक संतुलन दिखाई दे? क्या आनुपातिक प्रतिनिधित्व (Proportional Representation) जैसी प्रणालियों पर गंभीर चर्चा का समय आ गया है? यह प्रश्न अब केवल राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि लोकतंत्र की गुणवत्ता और प्रतिनिधित्व की वास्तविकता से जुड़ा विषय बनता जा रहा है।
वहीं राजनीतिक भाषणों में अक्सर “विश्वगुरु भारत” और “140 करोड़ देशवासियों का समर्थन” जैसे दावे सुनाई देते हैं। लेकिन चुनावी आंकड़ों का दूसरा पक्ष यह भी बताता है कि सत्ता में बैठे गठबंधन को कुल मतदाता आबादी के एक सीमित हिस्से का प्रत्यक्ष समर्थन प्राप्त हुआ है। ऐसे में जनादेश की व्यापकता और राजनीतिक दावों की वास्तविकता पर चर्चा होना लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया मानी जानी चाहिए।
2024 के चुनाव परिणामों ने एक बार फिर साबित किया है कि भारत में सरकार लोकप्रियता के सामान्य आकलन से नहीं, बल्कि संविधान द्वारा निर्धारित चुनावी गणित के आधार पर बनती है। किंतु यह भी उतना ही सत्य है कि लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति केवल सत्ता प्राप्त करने में नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक स्वीकार्यता और जनविश्वास अर्जित करने में निहित होती है। यही कारण है कि चुनावी आंकड़ों का यह विश्लेषण आने वाले वर्षों में भारतीय लोकतंत्र की प्रकृति, प्रतिनिधित्व और जनादेश की अवधारणा पर नई बहसों को जन्म दे सकता है।
