अनुभव की आड़ में अवसरों पर ताला? आयु सीमा वृद्धि से सिमटता युवा भविष्य..
संपादक की प्रस्तुति। प्रदेश/देश में शासकीय सेवाओं में आयु सीमा वृद्धि का मुद्दा अब केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं रहा, बल्कि यह युवाओं के भविष्य से जुड़ा बड़ा जनसवाल बनता जा रहा है। सेवानिवृत्ति आयु 58 से बढ़ाकर 60 वर्ष, कई विभागों में 62 वर्ष तक, संविदा नियुक्तियों के लिए 65 वर्ष और सलाहकार जैसे पदों पर 70 वर्ष तक सेवा की संभावनाओं से नई बहस छिड़ी है।
सरकार का पक्ष स्पष्ट है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में राज्य सरकार का तर्क है कि अनुभवी अधिकारियों का प्रशासनिक ज्ञान, नीति-निर्माण की समझ और कार्यानुभव शासन की निरंतरता के लिए आवश्यक है। जटिल परियोजनाओं और दीर्घकालिक योजनाओं के सफल क्रियान्वयन में वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
परंतु दूसरी ओर युवाओं का सवाल भी उतना ही ठोस है—यदि पदों पर सेवानिवृत्त अधिकारियों को पुनर्नियुक्त किया जाएगा, तो नई पीढ़ी को अवसर कब और कैसे मिलेंगे? प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में वर्षों खपाने वाले लाखों अभ्यर्थियों के लिए यह स्थिति निराशा का कारण बन रही है। उनका तर्क है कि अनुभव अवसर से ही जन्म लेता है। यदि युवाओं को जिम्मेदारी ही नहीं दी जाएगी, तो वे अनुभवी कैसे बनेंगे?
बेरोजगारी और बढ़ता असंतोष
प्रदेश में पहले से ही रोजगार के सीमित अवसरों के बीच आयु सीमा विस्तार को युवाओं के हितों पर कुठाराघात के रूप में देखा जा रहा है। एक ओर नई भर्तियों की प्रक्रिया धीमी है, दूसरी ओर सेवानिवृत्त कर्मियों की संविदा नियुक्तियां बढ़ रही हैं। इससे प्रशासनिक संरचना में पीढ़ीगत संतुलन प्रभावित होने की आशंका व्यक्त की जा रही है।
आर्थिक दृष्टि से भी सवाल
विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि सेवानिवृत्त अधिकारियों को पुनः नियुक्त करने पर उनका वेतनमान प्रायः नवचयनित युवाओं की तुलना में अधिक होता है। ऐसे में सरकार पर अतिरिक्त वित्तीय भार बढ़ना स्वाभाविक है। सीमित संसाधनों वाले राज्य में यह मॉडल कितनी दूर तक टिकाऊ है—यह भी विचारणीय प्रश्न है।
संतुलन की जरूरत
यह बहस अनुभव बनाम युवा शक्ति की नहीं, बल्कि संतुलन की है। वरिष्ठ अधिकारियों के मार्गदर्शन और युवाओं की ऊर्जा—दोनों का समन्वय ही सुशासन की कुंजी हो सकता है। यदि सरकार मेंटरशिप मॉडल, समयबद्ध नियमित भर्तियां और सीमित अवधि की स्पष्ट परिभाषित सलाहकार व्यवस्था लागू करे, तो दोनों पक्षों के हित साधे जा सकते हैं।
अंततः यह प्रश्न केवल आयु सीमा का नहीं, बल्कि अवसरों की समानता और आने वाली पीढ़ी के विश्वास का है। युवा शक्ति किसी भी राज्य की सबसे बड़ी पूंजी होती है। यदि उसे अवसर मिलेगा तो वही कल का अनुभव बनेगा; यदि अवसर रुके रहेंगे, तो असंतोष बढ़ेगा।
आज जरूरत है खुली, पारदर्शी और संतुलित नीति की—जहां अनुभव का सम्मान भी हो और युवाओं का भविष्य भी सुरक्षित रहे। यही समय की मांग है और यही युवा पीढ़ी की आवाज। सरकार के निर्णायक मंडल की दहलीज पर देश के युवाओं एवं राष्ट्री हित में “युग क्रांति” का यह आव्हान है।
