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NCAP सिटी ग्वालियर में प्रदूषण पर सांसद की पैरवी?,भट्टा संचालकों को मोहलत दिलाने वाले पत्र से उठे गंभीर सवाल

रामकिशन प्रजापति, खुशालीराम समेत भट्टा संचालकों के आवेदन को सांसद ने कलेक्टर तक पहुंचाया; स्वच्छ वायु अभियान के बीच राहत की सिफारिश पर बहस तेज

ग्वालियर 21 मई 2026। राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) के तहत चिन्हित ग्वालियर शहर में वायु प्रदूषण नियंत्रण को लेकर प्रशासनिक कार्रवाई और राजनीतिक हस्तक्षेप का एक ऐसा चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसने स्वच्छ हवा के सरकारी दावों पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। ग्वालियर सांसद भारत सिंह कुशवाह द्वारा कलेक्टर ग्वालियर को भेजे गए पत्र में रामकिशन प्रजापति, खुशालीराय प्रजापति एवं अन्य भट्टा संचालकों के आवेदन का उल्लेख करते हुए उन्हें ईंट भट्टों के विस्थापन के लिए 6 से 7 माह का अतिरिक्त समय देने का अनुरोध किया गया है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह पत्र उस दौर का है जब नगर निगम सीमा में संचालित अवैध ईंट भट्टों और चिमनियों को लेकर प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई चल रही थी तथा प्रदूषण नियंत्रण को लेकर विभिन्न विभाग सक्रिय बताए जा रहे थे। ऐसे में सांसद द्वारा संचालकों के पक्ष में भेजे गए इस पत्र के हस्तक्षेप ने पूरे मामले को राजनीतिक रंग दे दिया है।

सांसद का पत्र और उठते सवाल

23 सितंबर 2024 को कलेक्टर ग्वालियर के लिए पत्र में सांसद ने लिखा है कि आवेदकगण उनके समक्ष उपस्थित हुए और ईंट भट्टों के विस्थापन हेतु 6-7 माह का समय देने का अनुरोध किया। इसके बाद सांसद ने आवेदन पत्र संलग्न करते हुए कलेक्टर से “नियमानुसार आवश्यक कार्यवाही” करने का आग्रह किया। यहीं से कई सवाल जन्म लेते हैं। यदि नगर निगम सीमा में संचालित भट्टों को लेकर पर्यावरणीय और प्रशासनिक आपत्तियां थीं तो फिर अतिरिक्त समय की मांग का औचित्य क्या था? और यदि संचालन पूरी तरह नियमों के अनुरूप था तो विस्थापन की आवश्यकता क्यों पड़ रही थी? क्या सांसद महोदय प्रदूषण और वायु सुधार प्रोग्राम से अनभिज्ञ है अथवा कोई मिली भगत है?

गौरतलब है कि ग्वालियर देश के उन शहरों में शामिल है जिन्हें बढ़ते वायु प्रदूषण के कारण NCAP के तहत विशेष निगरानी में रखा गया है। शहर की वायु गुणवत्ता सुधारने के लिए करोड़ों रुपये की योजनाएं संचालित की जा रही हैं। इसके बावजूद नगर निगम सीमा के भीतर वर्षों से संचालित दर्जनों चिमनियां और भट्टे लगातार विवाद का विषय बने हुए हैं।

संभाग आयुक्त के आदेशों का क्या हुआ

सूत्रों के अनुसार तत्कालीन संभाग आयुक्त सुदामा खंडे ने भी नगर निगम सीमा में संचालित भट्टों और चिमनियों के विरुद्ध डिस्मेंटल की कार्रवाई कर उन्हें हटाने संबंधी सख्त निर्देश दिए थे। इसके बावजूद स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं दिखाई दिया। प्रशासनिक आदेशों और जमीनी वास्तविकता के बीच मौजूद इस अंतर ने राजनीतिक संरक्षण की आशंकाओं को और बल दिया है। इसी के चलते प्रशासन इन पर ठोस करवाई करने से किनारा सा काट रहा है।

उधर, युग क्रांति द्वारा लगातार प्रकाशित खबरों के बाद जिला प्रशासन एवं मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड भी हरकत में आया है। बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी के अनुसार विभिन्न स्थलों पर जांच दल भेजे गए हैं और प्रतिवेदन तैयार किया जा रहा है। जांच रिपोर्ट प्राप्त होने के बाद नगर निगम, खनिज विभाग तथा जिला प्रशासन को आवश्यक कार्रवाई के लिए अवगत कराया जाएगा।

अब प्रश्न केवल एक पत्र का नहीं है। प्रश्न यह है कि जब ग्वालियर की हवा लगातार प्रदूषण का भार झेल रही थी, तब प्रदूषण से जुड़े विवादित भट्टों के संचालकों को अतिरिक्त समय दिलाने की पैरवी क्यों की गई? क्या जनप्रतिनिधि की प्राथमिकता स्वच्छ हवा थी या भट्टा संचालकों की मांग? क्या प्रशासनिक कार्रवाई राजनीतिक सिफारिशों के दबाव में कमजोर पड़ी? और सबसे बड़ा सवाल—यदि NCAP शहर में प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयों को राहत मिलती रही तो स्वच्छ वायु अभियान की जवाबदेही कौन तय करेगा?

वायु प्रदूषित करती चिमनियाग्वालियर की हवा में घुलते धुएं के बीच यह सवाल अब प्रशासन, जनप्रतिनिधियों और प्रदूषण नियंत्रण तंत्र—तीनों के सामने खड़ा है।