क्या देश की राजनीति के सामने खड़ा हो रहा है युवाओं का नया सवाल?
विशेष टिप्पणी, युग क्रांति। देश के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत से जुड़े कथित बयान को लेकर उपजे विवाद ने सोशल मीडिया पर अप्रत्याशित राजनीतिक और सामाजिक हलचल पैदा कर दी है। जिस शब्द को लेकर आक्रोश व्यक्त किया गया, उसी के प्रतिकार स्वरूप सोशल मीडिया पर उभरा “कॉकरोच जनता पार्टी” नामक अभियान कुछ ही दिनों में लाखों युवाओं को जोड़ने वाला मंच बन गया है। सोशल मीडिया पर इसकी बढ़ती लोकप्रियता ने राजनीतिक गलियारों में भी नई चर्चा छेड़ दी है।
विशेष रूप से Gen Z (16 से 31 वर्ष आयु वर्ग) के बीच इस मंच को मिल रहा समर्थन इस बात का संकेत माना जा रहा है कि देश का युवा वर्ग अब केवल चुनावी नारों या पारंपरिक राजनीतिक विमर्श तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि रोजगार, अवसर, पारदर्शिता और भविष्य से जुड़े सवालों को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में देखना चाहता है।
युग क्रांति ने हमेशा अपने समाचारों और विचारों के माध्यम से युवाओं को गुमराह होने से बचाने और उनकी वास्तविक शक्ति को पहचानने का संदेश दिया है। बड़े स्तर पर यह संदेश दिया_ ‘तकदीर उधर मुड़ जाती है जिस ओर जवानी चलती है’। हमारा विश्वास रहा है कि युवा केवल भीड़ नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की सबसे बड़ी ऊर्जा हैं। इसी भावना के साथ हमने बार-बार स्वामी विवेकानंद के संदेश—“उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए”—को युवाओं तक पहुँचाने का प्रयास किया है।
आज सोशल मीडिया पर दिखाई दे रही यह नई सक्रियता उसी जागरण की एक झलक प्रतीत होती है। हालांकि यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि किसी भी जनांदोलन, वैचारिक अभियान अथवा सामाजिक क्रांति का आधार केवल आक्रोश नहीं, बल्कि शुद्ध उद्देश्य, सकारात्मक चिंतन और राष्ट्रहित की स्पष्ट दृष्टि होना चाहिए। यदि कोई आंदोलन केवल प्रतिक्रिया या द्वेष की भावना के आधार से संचालित होगा तो उसकी ऊर्जा सीमित हो सकती है, जबकि रचनात्मक विचार उसे दीर्घकालिक परिवर्तन का माध्यम बना सकते हैं।
वर्षों से देश की राजनीति पर यह आरोप लगता रहा है कि छात्र नेतृत्व को मजबूत करने के बजाय छात्रसंघों जैसी संस्थाओं को कमजोर कुचला गया, जिससे लोकतांत्रिक नेतृत्व की नई पीढ़ी के विकास को बड़ा झटका लगा। दूसरी ओर चुनावी राजनीति में विभिन्न योजनाओं और मुफ्त सुविधाओं की प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ती जा रही है। आलोचकों का मानना है कि इससे तात्कालिक राजनीतिक लाभ तो मिल सकता है, लेकिन दीर्घकाल में देश की आर्थिक और उत्पादक क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
एक बड़ा प्रश्न यह भी है कि यदि सरकारें विकास के दावों पर पूरी तरह आश्वस्त हैं तो फिर जनता को योजनाओं और प्रलोभनों के माध्यम से लगातार आकर्षित करने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है? कानूनी दृष्टि से भले ऐसी योजनाएँ वैध हों, किंतु उनके नैतिक और वैचारिक पक्ष पर बहस लगातार जारी है।
सोशल मीडिया पर सक्रिय युवाओं का एक वर्ग मानता है कि “कॉकरोच जनता पार्टी” जैसे मंच का उभार केवल किसी एक बयान का विरोध नहीं, बल्कि उस व्यापक असंतोष की अभिव्यक्ति है जो रोजगार, शिक्षा, अवसरों की समानता और राजनीतिक जवाबदेही जैसे मुद्दों को लेकर देश के युवाओं के भीतर लंबे समय से मौजूद है।
जाति, वर्ग, धर्म और संप्रदाय की पारंपरिक राजनीतिक सीमाओं से परे आज का युवा अपने भविष्य से जुड़े प्रश्नों का उत्तर चाहता है। ऐसे में सत्ता और विपक्ष—दोनों के लिए यह संकेत है कि युवा मतदाता अब केवल वादों से संतुष्ट नहीं होगा, बल्कि परिणाम और जवाबदेही की अपेक्षा करेगा।
देश की राजनीति के सामने अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है—क्या राजनीतिक दल युवाओं की इस नई डिजिटल चेतना को समझ पाएंगे, या फिर सोशल मीडिया पर उठ रहा यह नया तूफान आने वाले समय में भारतीय राजनीति की दिशा और दशा दोनों को बदलने का कारण बनेगा?
(लेखक: बृजराज सिंह के विचार व्यक्तिगत हैं।)
