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हाईकोर्ट की फटकार भी बेअसर! PWD में ‘बैक डोर एंट्री’ का खेल जारी

क्या वल्लभ भवन_ सरकार और न्यायपालिका से भी ऊपर?”

भोपाल। मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा लोक निर्माण विभाग (PWD) में उच्च पदों पर मनमाने ढंग से अतिरिक्त प्रभार देने की प्रवृत्ति पर कड़ी टिप्पणी और “बैक डोर एंट्री” जैसी व्यवस्था पर गंभीर चिंता जताने के बावजूद विभाग में नियमों और न्यायिक निर्देशों की खुलेआम अनदेखी जारी है। सवाल उठ रहा है कि क्या लोक निर्माण विभाग और वल्लभ भवन की नौकरशाही खुद को सरकार और न्यायपालिका से भी ऊपर मानने लगी है?

हाल ही में जबलपुर हाईकोर्ट में एक रिट याचिका की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने स्पष्ट कहा था कि प्रशासनिक सुविधा के नाम पर वैधानिक पात्रता और पदोन्नति नियमों को दरकिनार नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने यह तक कहा कि यदि कनिष्ठ अधिकारियों को उच्च पदों का प्रभार देकर वरिष्ठ अधिकारियों की पूरी श्रेणी को नजरअंदाज किया जाता रहा तो यह “पिछले दरवाजे से प्रवेश” (Backdoor Entry) के समान होगा, जिससे पक्षपात, भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।

इसके बावजूद विभाग में नियमों की धज्जियां उड़ाने का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। प्रदेश में ऐसे अनेक उदाहरण सामने हैं, जहां कार्यपालन यंत्रियों को मुख्य अभियंता और अधीक्षण यंत्रियों को अभियंता प्रमुख जैसे दो-दो पद ऊपर का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है। इतना ही नहीं, कई मामलों में ऐसे अधिकारियों को भी उच्च पदों का दायित्व दिया गया है, जो पदोन्नति के लिए निर्धारित “जोन ऑफ कंसिडरेशन” में भी नहीं आते।

ग्वालियर में प्रभारी मुख्य अभियंता बी.के. झा और प्रभारी अभियंता प्रमुख के के लच्छे के मामलों सहित प्रदेश के अनेक उदाहरण इस बात की पुष्टि करते हैं कि “बैक डोर एंट्री” अब अपवाद नहीं, बल्कि विभागीय परंपरा और नज़ीर बनती जा रही है। सवाल यह है कि जब उच्च न्यायालय स्वयं इस प्रवृत्ति पर गंभीर चिंता जताते हुए विभाग के प्रमुख अधिकारी प्रमुख सचिव शुखबीर सिंह को कड़ी फटकार लगा चुका है, तब भी आखिर किसके संरक्षण में यह खेल जारी है?

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में प्रमुख सचिव लोक निर्माण विभाग को भी कड़ी फटकार लगाते हुए कहा था कि न्यायालय द्वारा मांगे गए स्पष्ट जवाब देने के बजाय सामान्य और बचावात्मक उत्तर प्रस्तुत किए गए, जिससे ऐसा प्रतीत होता है मानो संबंधित अधिकारियों को बचाने का प्रयास किया जा रहा हो। न्यायालय ने भविष्य के लिए प्रमुख सचिव शुखबीर सिंह स्पष्ट निर्देश दिए कि उच्च पदों का अतिरिक्त प्रभार केवल उन्हीं अधिकारियों को दिया जाए जिनका सेवा रिकॉर्ड निष्कलंक हो और जो पदोन्नति के निर्धारित दायरे में आते हों।

इसके बावजूद यदि विभाग में वही पुरानी व्यवस्था जारी है तो यह केवल नियमों की अवहेलना नहीं, बल्कि न्यायपालिका की भावना की भी उपेक्षा मानी जाएगी। बड़ा सवाल यह है कि आखिर किसके इशारे पर लोक निर्माण विभाग में “बैक डोर एंट्री” का यह मॉडल लगातार फल-फूल रहा है? और क्या वल्लभ भवन में बैठी नौकरशाही अब न्यायालय की नसीहतों को भी महज औपचारिकता मानने लगी है?

विभागीय गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि “आखिरकार प्रमुख सचिव शुखबीर सिंह साहब के दोनों कार्यकाल में इनकी कार्यशैली का यह अंतर हैरान करने वाला है, वर्तमान शुखवीर सिंह में अब ‘शुख‘ और ‘वीर‘ दोनों ही नजर नहीं आते”।