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23 साल की सत्ता, 21 साल बिना रोडवेज!

सड़कों और विकास के दावों के बीच मध्य प्रदेश के यात्री आज भी निजी बसों के भरोसे—2005 में सरकारी बसों का पहिया थमा, अब 25 सितंबर से PPP मॉडल पर नई सेवा का ऐलान

भोपाल/ग्वालियर। मध्य प्रदेश में भाजपा सरकार के लंबे शासन और विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच एक ऐसा सवाल है, जिसका जवाब प्रदेश का आम यात्री वर्षों से तलाश रहा है_आखिर मध्य प्रदेश की अपनी सरकारी रोडवेज बस सेवा क्यों नहीं है?

जिस प्रदेश में सरकार हजारों करोड़ रुपये की सड़क परियोजनाओं, एक्सप्रेस-वे, फ्लाईओवर, मेट्रो और आधुनिक परिवहन ढांचे को विकास की तस्वीर बताती है, उसी प्रदेश में एक सामान्य यात्री को आज भी एक जिले से दूसरे जिले, कस्बे से जिला मुख्यालय और गांव से शहर तक पहुंचने के लिए मुख्यतः निजी बस ऑपरेटरों पर निर्भर रहना पड़ता है।

यह सवाल इसलिए भी बड़ा है क्योंकि मध्य प्रदेश में राज्य सड़क परिवहन निगम की अपनी बसों का संचालन 2005 में ही बंद हो गया था। CAG की रिपोर्ट के मुताबिक वित्तीय संकट के चलते निगम ने अपनी बसों का संचालन बंद किया और निजी बसों को निगम के नाम से चलाने की व्यवस्था की गई। बाद में नवंबर 2008 में राज्य के भीतर अनुबंधित बस सेवाएं भी बंद कर दी गईं।

विकास का इंजन तेज, लेकिन यात्री परिवहन का पहिया जाम?

मध्य प्रदेश में भाजपा वर्ष 2003 से सत्ता में रही है, हालांकि 2018 से 2020 के बीच कांग्रेस सरकार का कार्यकाल भी रहा। इसके बावजूद करीब दो दशक से प्रदेश में नियमित सरकारी रोडवेज का अभाव बना हुआ है। 2014 के बाद केंद्र में भाजपा और मध्य प्रदेश में भाजपा सरकार के दौर को ‘डबल इंजन’ के रूप में विकास का मॉडल बताया जाता रहा है। ऐसे में सवाल और सीधा हो जाता है—अगर सरकार सड़कें बना सकती है, बड़े-बड़े पुल और कॉरिडोर बना सकती है, मेट्रो चला सकती है, तो आम आदमी के लिए एक भरोसेमंद सार्वजनिक बस व्यवस्था क्यों नहीं खड़ी कर सकी?

सार्वजनिक परिवहन केवल कमाई का कारोबार नहीं होता। यह गांव और शहर को जोड़ता है, विद्यार्थियों को शिक्षा तक पहुंचाता है, मरीज को अस्पताल तक पहुंचाता है, नौकरीपेशा व्यक्ति को रोजगार तक पहुंचाता है और छोटे व्यापारी को बाजार तक। लेकिन जहां निजी ऑपरेटर को यात्री और मुनाफा दिखाई देता है, वहां सरकार को जनसेवा और कनेक्टिविटी भी देखनी होती है।

CAG की रिपोर्ट ने भी उठाए थे गंभीर सवाल

सरकारी रोडवेज को खत्म करने के बाद निजी बसों के माध्यम से व्यवस्था चलाने का प्रयोग भी पूरी तरह सवालों से मुक्त नहीं रहा। CAG ने अपनी रिपोर्ट में दर्ज किया कि अगस्त 2010 में अंतरराज्यीय बस सेवा से निगम को करीब 50.30 लाख रुपये मासिक राजस्व मिल रहा था, जबकि मासिक खर्च करीब 32.13 लाख रुपये था। इसके बावजूद इस सेवा को अक्टूबर 2010 से बंद कर दिया गया। CAG ने मार्च 2011 तक लगभग 2.08 करोड़ रुपये के राजस्व नुकसान को दर्ज किया।

यानी सवाल केवल यह नहीं कि सरकारी बसें क्यों बंद हुईं।सवाल यह भी है कि जो व्यवस्था कुछ हिस्सों में राजस्व दे रही थी, उसे सुधारने और मजबूत करने के बजाय खत्म करने का रास्ता क्यों चुना गया?

अब 21 साल बाद फिर बस सेवा की घोषणा

दिलचस्प है कि वर्षों तक सरकारी रोडवेज के अभाव के बाद अब सरकार ने 25 सितंबर 2026 से मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा शुरू करने की घोषणा की है। सरकार के मुताबिक नई व्यवस्था में PPP मॉडल के माध्यम से बस संचालन किया जाएगा। करीब 15 हजार बसों तक व्यवस्था विकसित करने की योजना है। 150 नगरीय, 450 अंतरनगरीय और 436 अंतरराज्यीय मार्गों का खाका तैयार किया गया है। GPS, CCTV, पैनिक बटन और डिजिटल मॉनिटरिंग जैसी सुविधाओं के साथ CNG और इलेक्ट्रिक बसों को बढ़ावा देने की बात भी कही गई है।

यानी 2005 में सरकारी बसों का पहिया थमने के करीब 21 साल बाद सरकार फिर प्रदेश के यात्री परिवहन को व्यवस्थित करने की कोशिश कर रही है।लेकिन यहां भी सबसे बड़ा सवाल अपनी जगह कायम है_क्या यह वास्तव में सरकारी रोडवेज की वापसी है या सरकारी निगरानी में निजी बसों की नई व्यवस्था? क्योंकि सरकार की घोषित नई व्यवस्था में निजी बस ऑपरेटरों की भागीदारी और PPP मॉडल महत्वपूर्ण हिस्सा है।

जनता पूछ रही है—इतने साल आखिर गए कहां?

प्रदेश के आम यात्री का सवाल बेहद साधारण है—2005 से 2026 तक सरकारें क्या कर रही थीं?                     

क्या 21 साल इतने कम समय हैं कि एक राज्य अपनी सार्वजनिक बस परिवहन व्यवस्था खड़ी नहीं कर सकता?

क्या मध्य प्रदेश की विकास नीति में सड़कें तो जरूरी हैं, लेकिन उन सड़कों पर आम आदमी के लिए नियमित, सुरक्षित और जवाबदेह सार्वजनिक परिवहन जरूरी नहीं?

क्या सरकारी परिवहन व्यवस्था को घाटे के डर से छोड़ देना आसान है, जबकि दूसरी ओर सरकार जनकल्याण की जिम्मेदारी निभाने की बात करती है?

और सबसे महत्वपूर्ण—क्या प्रदेश की जनता को हर रूट पर निजी ऑपरेटर की व्यावसायिक प्राथमिकताओं के भरोसे ही छोड़ दिया जाना चाहिए?

अब सिर्फ घोषणा नहीं, हिसाब भी चाहिए

25 सितंबर से शुरू होने वाली मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा निश्चित रूप से प्रदेश के यात्री परिवहन के लिए एक नई शुरुआत हो सकती है। लेकिन इस बार जनता को केवल बसों की संख्या नहीं, बल्कि रूट, समय-सारणी, किराया, बसों की उपलब्धता, सुरक्षा, जवाबदेही और दूरदराज के कम लाभ वाले मार्गों पर सेवा का स्पष्ट हिसाब चाहिए।

मध्य प्रदेश को सिर्फ कथित चमकती सड़कें नहीं चाहिए बल्कि उन सड़कों पर चलने वाली ऐसी सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था भी चाहिए, जिसके लिए आम आदमी को किसी निजी ऑपरेटर की मर्जी का मोहताज न होना पड़े।

23 साल की सत्ता और करीब 21 साल के रोडवेज-विहीन दौर के बाद अब सरकार के सामने असली परीक्षा देखने वाली बात यही है—क्या इस बार मध्य प्रदेश को सिर्फ ‘सुगम परिवहन’ का नाम मिलेगा, या सचमुच आम आदमी को सुगम, सुरक्षित और जवाबदेह सार्वजनिक बस सेवा भी मिलेगी?