शाम 7 बजे घर-घर दीप जलाने का आह्वान, MP में लाखों दीपों का लक्ष्य; समर्थक इसे कृतज्ञता बता रहे, आलोचकों ने पूछा—लोकतंत्र में नेता के नाम पर ‘भक्ति’ का संदेश क्यों?
भोपाल 17 सितंबर 2026। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर आज देश के विभिन्न हिस्सों में शाम 7 बजे दीप प्रज्ज्वलित करने का आह्वान किया गया है। भारतीय जनता पार्टी ने इसे ‘आशीर्वाद का दीया’ नाम दिया है और 17 सितंबर से 17 अक्टूबर तक चलने वाले ‘सेवा संकल्प अभियान’ के तहत इसे प्रधानमंत्री के सार्वजनिक जीवन के 25 वर्षों की सेवा यात्रा से जोड़ा है।
मध्य प्रदेश में इस आयोजन को विशेष रूप से बड़े पैमाने पर किया जा रहा है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने प्रदेशभर में अधिक से अधिक जनभागीदारी सुनिश्चित करने और दीप प्रज्ज्वलन का विश्व रिकॉर्ड बनाने के निर्देश दिए हैं। उज्जैन के महाकाल महालोक सहित ग्राम पंचायतों और नगरीय निकायों के वार्डों में शाम 7 बजे दीप जलाने की योजना है।
दीपक की परंपरा और ‘आशीर्वाद’ का सवाल
भारतीय धार्मिक-सांस्कृतिक परंपरा में दीपक केवल रोशनी का माध्यम नहीं है। दीप प्रज्ज्वलन को सामान्यतः अंधकार पर प्रकाश, अज्ञान पर ज्ञान और नकारात्मकता पर सकारात्मकता के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। जन्मदिन, धार्मिक अनुष्ठान और शुभ अवसरों पर किसी व्यक्ति की दीर्घायु और मंगलकामना के लिए दीप जलाना भी सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवहार का हिस्सा रहा है। लेकिन इस बार सवाल दीप जलाने से ज्यादा उसके राजनीतिक संदर्भ और शब्दावली पर है।
जब इसे ‘आशीर्वाद का दीया’ कहा जाता है और लोगों से प्रधानमंत्री के नाम पर दीप जलाने का आग्रह किया जाता है, तो समर्थक इसे अपने लोकप्रिय नेता के प्रति कृतज्ञता और सम्मान का प्रतीक बता रहे हैं। मध्य प्रदेश सरकार की ओर से भी इसे मोदी के सार्वजनिक जीवन के 25 वर्षों की सेवा और जिम्मेदारी के प्रति आभार से जोड़ा गया है और इस अवसर पर दीप जलाने का विश्व रिकॉर्ड कायम करने की बात कही है, लेकिन आलोचक इसे अलग नजर से देख रहे हैं।
सम्मान से ‘भक्ति’ तक—लकीर कहां खिंचेगी?
प्रधानमंत्री किसी राजनीतिक दल के नेता होने के साथ-साथ देश के निर्वाचित प्रधानमंत्री हैं। ऐसे में उनके जन्मदिन पर पार्टी द्वारा सेवा कार्यक्रम, रक्तदान, स्वच्छता अभियान अथवा जनकल्याण गतिविधियां आयोजित करना एक राजनीतिक-सामाजिक कार्यक्रम के रूप में देखा जा सकता है। लेकिन किसी जीवित राजनीतिक नेता के नाम पर सामूहिक रूप से दीप जलाने और उसे ‘आशीर्वाद’ से जोड़ने की परंपरा क्या राजनीति को व्यक्ति-केंद्रित बनाने की दिशा में ले जा रही है? यही वह सवाल है जिस पर अब बहस शुरू हो गई है।
सोशल मीडिया पर आलोचनात्मक प्रतिक्रियाओं में इसे ‘भक्ति’ से जोड़कर सवाल उठाए गए हैं। क्या किसी जीवित राजनेता के जन्मदिन पर उसके नाम से सामूहिक दीप प्रज्ज्वलन और ‘आशीर्वाद’ जैसी धार्मिक-सांस्कृतिक भाषा का इस्तेमाल धीरे-धीरे राजनीतिक सम्मान को धार्मिक प्रतीकों के करीब ले जा रहा है?
सेवा, सम्मान या व्यक्तिकेंद्रित राजनीति?
इस पूरे आयोजन के दो अलग-अलग अर्थ दिखाई देते हैं।समर्थकों के लिए यह प्रधानमंत्री के 25 वर्षों के सार्वजनिक जीवन, विकास योजनाओं और सेवा कार्यों के प्रति आभार व्यक्त करने का तरीका है। दूसरी ओर आलोचकों के लिए सवाल यह है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में संस्थाओं और नीतियों के बजाय किसी एक व्यक्ति को केंद्र में रखकर ऐसे प्रतीकों का इस्तेमाल व्यक्तिकेंद्रित राजनीतिक संस्कृति को कितना बढ़ाता है।
दीया आज शाम जलेगा—लेकिन सवाल यह है कि उसकी रोशनी केवल सम्मान और कृतज्ञता तक सीमित रहेगी या भारतीय राजनीति में व्यक्ति और विचारधारा के बीच की सीमाओं पर एक नई बहस भी रोशन करेगी?
