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एक वोट की ताकत क्या मिली, लोग भूल गए?

गुना में ग्रामीण ने सड़क के लिए मांगा समय रहते काम, कहा_“रोड नहीं डली तो वोट के समय आएंगे तो कोई वोट नहीं देगा”; सिंधिया ने आंख और उंगली दिखाकर कहा_“ऐसी भाषा मुझे कतई प्रयोग मत करना”

गुना। लोकतंत्र में जनता के पास सबसे बड़ी ताकत उसका वोट है। चुनाव के समय यही वोट किसी नेता को सत्ता की ताकत देता है और यही वोट जरूरत पड़ने पर सवाल पूछने का अधिकार भी देता है। लेकिन गुना में केंद्रीय मंत्री और एक ग्रामीण के बीच सड़क को लेकर हुई बातचीत ने लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि और मतदाता के रिश्ते पर एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।

ग्रामीण ने सड़क की समस्या को लेकर केंद्रीय मंत्री के सामने बड़े निवेदन के साथ समय रहते सड़क ठीक कराने की मांग रखी। लेकिन इसके बाद उसने वोट की ताकत का हवाला देते हुए दो टूक शब्दों में कहा कि “अगर यह रोड नहीं डली तो आप वोट के समय आएंगे तो हम लोग कोई वोट नहीं देगा।”

बात यहीं से बदल गई। ग्रामीण की यह बात केंद्रीय मंत्री को नागवार गुजरी। वीडियो में दिखाई देने वाले घटनाक्रम के अनुसार सिंधिया ने आंख और उंगली दिखाते हुए सख्त लहजे में कहा—“ऐसी भाषा मुझे कतई प्रयोग मत करना। कोई काम है तो मेरे पास आओ, निवेदन करो, काम होगा।”

सवाल सड़क का था या लोकतांत्रिक अधिकार का?

ग्रामीण की भाषा को शिष्टाचार की कसौटी पर अलग-अलग तरीके से देखा जा सकता है, लेकिन उसका मूल सवाल सड़क और उसके निर्माण का था। लोकतंत्र में मतदाता यदि यह कहता है कि काम नहीं हुआ तो वह अपना वोट किसी अन्य को देगा, तो यह उसका राजनीतिक अधिकार है। सवाल यह है कि जनप्रतिनिधि के सामने अपनी नाराजगी व्यक्त करने के लिए आम नागरिक की भाषा कितनी विनम्र होनी चाहिए और क्या उसके वोट के अधिकार का उल्लेख ही आपत्तिजनक भाषा मान लिया जाए?

यहां सबसे दिलचस्प पहलू यही है कि ग्रामीण पहले निवेदन करता है, समस्या बताता है और समय रहते सड़क बनाने की मांग करता है, लेकिन जैसे ही वह चुनाव में वोट नहीं देने की बात करता है, बातचीत का स्वर बदल जाता है।

आजाद भारत में वोटर को कितनी दूर तक ‘निवेदन’ करना होगा?

भारत आजाद हुए 79 वर्ष हो चुके हैं। राजशाही समाप्त हो चुकी है और लोकतंत्र में जनता ही अंतिम निर्णायक मानी जाती है। ऐसे में गुना का यह प्रसंग सिर्फ एक सड़क का मामला नहीं रह जाता। यह उस मानसिकता पर सवाल खड़ा करता है जिसमें जनता से अपेक्षा की जाती है कि वह जनप्रतिनिधि के सामने “निवेदन” करे, लेकिन वही जनता जब अपने वोट की ताकत की याद दिलाती है तो उसे अपनी भाषा बदलने की चेतावनी मिलती है।

सिंधिया राजघराने की पृष्ठभूमि से आते हैं—यह ऐतिहासिक तथ्य है। लेकिन आज का भारत राजशाही नहीं, लोकतंत्र है। यहां कोई “महाराज” जनता पर शासन करने के लिए नहीं, बल्कि जनता के वोट से चुनी गई व्यवस्था में प्रतिनिधित्व करने के लिए राजनीति करता है।

ग्रामीण का सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि सड़क जैसी बुनियादी सुविधा के लिए उसे चुनाव तक इंतजार क्यों करना पड़े? और यदि सड़क समय रहते नहीं बनती, तो चुनाव के समय मतदाता अपने वोट के माध्यम से जवाब देने की बात भी न कहे तो फिर लोकतंत्र में उसकी नाराजगी व्यक्त करने का रास्ता क्या है? सड़क कब बनेगी, यह प्रशासन और जनप्रतिनिधि के काम का विषय है; लेकिन वोट किसे देना है, यह फैसला ग्रामीण का अपना अधिकार है।