प्रदेश के 3000 से अधिक हायर सेकेंडरी स्कूल प्राचार्य विहीन, फिर भी मनचाही पदस्थापना से वंचित रहे वरिष्ठ प्राचार्य; 18 साल पुरानी काउंसलिंग व्यवस्था अचानक समाप्त करने के फैसले पर उठी आपत्ति
भोपाल। मध्यप्रदेश के स्कूल शिक्षा विभाग में प्राचार्यों की पदोन्नति और पदस्थापना की प्रक्रिया एक बार फिर सवालों के घेरे में है। उच्च पद प्रभार के दौरान वरिष्ठता के बावजूद वांछित पदस्थापना से वंचित रहे कुछ हाईस्कूल प्राचार्यों को पदोन्नति के बाद भी राहत नहीं मिल सकी। आरोप है कि विभाग ने पदोन्नति उपरांत पदस्थापना में 18 वर्षों से चली आ रही स्वैच्छिक काउंसलिंग व्यवस्था को अचानक समाप्त कर दिया, जिसके चलते कई वरिष्ठ प्राचार्यों को अपने नजदीकी क्षेत्र में रिक्त पद होने के बावजूद दूसरे ब्लॉक में पदस्थापना स्वीकार करने की स्थिति में पहुंचा दिया गया।
इस पूरी प्रक्रिया ने स्कूल शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली, पारदर्शिता और समान अवसर के सिद्धांत पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
कहीं पहले से पदस्थ को लाभ, तो कहीं वरिष्ठता के बावजूद उपेक्षा
प्रभावित प्राचार्यों की ओर से सामने आए तथ्यों के अनुसार, कुछ हाईस्कूल प्राचार्य ऐसे हैं जिन्हें उच्च पद प्रभार के दौरान अथवा उसके बाद अपने वांछित स्थान के हायर सेकेंडरी स्कूलों में पदस्थापना मिल गई थी। पदोन्नति के बाद भी उन्हें उन्हीं स्थानों पर यथावत पदस्थ रखा गया। ऐसे साथियों को बधाई देते हुए प्रभावित पक्ष ने सवाल उठाया है कि जिन वरिष्ठ प्राचार्यों को कार्यालयीन लापरवाही के कारण पहले ही नुकसान उठाना पड़ा, उन्हें पदोन्नति के बाद समान अवसर क्यों नहीं दिया गया?
बताया गया है कि उच्च पद प्रभार की प्रक्रिया के दौरान कुछ प्राचार्यों के नाम केवल इसलिए छूट गए क्योंकि कार्यालय स्तर पर उनकी एसीआर (वार्षिक गोपनीय चरित्रावली) उपलब्ध नहीं हो सकी थी। बाद में वरिष्ठता के आधार पर उनके नाम उच्च पद प्रभार के लिए शामिल तो किए गए, लेकिन तब तक पूर्व की काउंसलिंग में कनिष्ठ साथियों को वांछित हायर सेकेंडरी स्कूलों में पदस्थापना का अवसर मिल चुका था। नतीजतन, वरिष्ठ होने के बावजूद संबंधित प्राचार्यों को बाद की काउंसलिंग में असहमति जताकर हाईस्कूल प्राचार्य के रूप में ही कार्य करने के लिए मजबूर होना पड़ा।
18 साल की काउंसलिंग व्यवस्था अचानक बंद, चार महीने तक लगाई गुहार
सबसे बड़ा सवाल स्वैच्छिक काउंसलिंग व्यवस्था को समाप्त किए जाने को लेकर है। प्रभावित पक्ष का कहना है कि प्रदेश में लगभग 18 वर्षों से पदस्थापना की प्रक्रिया में चली आ रही स्वैच्छिक काउंसलिंग व्यवस्था को पदोन्नति के समय अचानक रोक दिया गया।
इसकी आशंका पहले से जताई जा रही थी। यही वजह है कि करीब चार महीने तक शासन-प्रशासन को बार-बार ज्ञापन भेजकर स्वैच्छिक काउंसलिंग जारी रखने की मांग की गई। लेकिन इन मांगों और ज्ञापनों का कोई सकारात्मक परिणाम सामने नहीं आया। आरोप है कि इस फैसले से उन प्राचार्यों को लाभ मिला जो पहले से ही मनचाहे स्थानों पर पदस्थ थे, जबकि उच्च पद प्रभार के दौरान कार्यालयीन कारणों से अवसर गंवाने वाले वरिष्ठ प्राचार्य एक बार फिर नुकसान में रहे।
3000 से अधिक स्कूल प्राचार्य विहीन, फिर भी नजदीकी रिक्तियां नजरअंदाज?
प्रभावित प्राचार्यों ने एक और गंभीर तथ्य की ओर ध्यान आकर्षित किया है। उनके मुताबिक प्रदेश में 3000 से अधिक हायर सेकेंडरी स्कूलों में प्राचार्यों के पद रिक्त हैं। इसके बावजूद कई ऐसे प्राचार्यों को उनके नजदीकी स्थान, संकुल अथवा संकुल के अंतर्गत उपलब्ध रिक्तियों का लाभ नहीं दिया गया और उन्हें दूसरे स्थानों, यहां तक कि ब्लॉक के बाहर पदस्थापना दे दी गई। सवाल यह है कि जब प्रदेश में इतनी बड़ी संख्या में प्राचार्यों के पद रिक्त हैं, तब पदोन्नत प्राचार्यों की पदस्थापना में उनकी वरिष्ठता और उपलब्ध रिक्तियों को प्राथमिकता क्यों नहीं दी गई?
प्रभावित पक्ष का मानना है कि यदि समय रहते संबंधित प्राचार्य स्वैच्छिक काउंसलिंग की मांग को लेकर न्यायालय पहुंचते तो संभवतः न्यायालय के हस्तक्षेप से शासन-प्रशासन को इस प्रक्रिया पर पुनर्विचार करना पड़ता।
समानता के अधिकार पर उठे सवाल
पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण सवाल समान अवसर और समानता के अधिकार का है। एक ओर पहले से वांछित स्थानों पर पदस्थ प्राचार्यों को पदोन्नति के बाद भी वहीं बनाए रखा गया, दूसरी ओर कार्यालयीन लापरवाही के कारण पहले अवसर से वंचित रहे वरिष्ठ प्राचार्यों को पदोन्नति के बाद भी उनकी पसंद और निकटता के स्थानों पर पदस्थापना का मौका नहीं मिला।
अब प्रभावित प्राचार्य अपने साथ हुई कथित नाइंसाफी की जानकारी सामने लाने की अपील कर रहे हैं, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि पदोन्नति और पदस्थापना की प्रक्रिया में कितने लोगों को वास्तविक रूप से नुकसान उठाना पड़ा है।
सवाल शासन और स्कूल शिक्षा विभाग से है कि जब हजारों पद रिक्त हैं, तब 18 वर्षों से चली आ रही स्वैच्छिक काउंसलिंग व्यवस्था को समाप्त करने की जरूरत आखिर क्यों पड़ी? क्या विभाग के पास इस फैसले का कोई तार्किक आधार है और क्या वरिष्ठता के बावजूद वंचित रहे प्राचार्यों को न्याय दिलाने के लिए अब कोई पहल की जाएगी?
