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VIP रोड का सपना अधूरा, सालों बाद भी जमीन पर नहीं उतरी योजना

ग्वालियर, बृजराज सिंह। शहर में वीआईपी मूवमेंट को आसान बनाने और ट्रैफिक पर दबाव कम करने के उद्देश्य से बरसों पहले एक अहम योजना तैयार की गई थी। प्रस्ताव था कि ग्वालियर एयरपोर्ट से महाराजपुर- जदेरूआ डैम से होते हुए मुरार उच्च विश्रांति गृह तक एक आधुनिक VIP मार्ग बनाया जाए, जिससे विशेष आगमन के दौरान शहर की सामान्य आवाजाही प्रभावित न हो साथ ही लोगों को वैकल्पिक आधुनिक मार्ग की सुविधा मिले। वर्तमान में जिसे ऊबड़- खाबड़ बीहड़ के लिए जाने वाले कच्चे मार्ग “नहर वाली रोड” के रूप मे देखा जा सकता है।

उस समय इस परियोजना को शहर के विकास की बड़ी कड़ी के रूप में पेश किया गया। योजनाएं बनीं, प्रस्ताव तैयार हुए, डीपीआर शासन को गई और जनता के सामने एक सुगम, व्यवस्थित और आधुनिक मार्ग की तस्वीर रखी गई। लेकिन समय बीतने के साथ यह सपना धीरे-धीरे फाइलों में सिमटता चला गया। करीब एक दशक से ज्यादा समय के बाद भी स्थिति यह है कि प्रस्ताव आगे बढ़ने के बावजूद काम जमीन तक नहीं आ सका है।

प्रस्ताव बने, दावे हुए… लेकिन काम शुरू नहीं

प्राप्त जानकारी अनुसार_ नगर निगम की ओर से इस संबंध में प्रस्ताव शासन को भेजा जा चुका है और क्षेत्रीय सांसद भारत सिंह कुशवाह ने भी इसमें रुचि दिखाते हुए केंद्र से सहयोग की बात कही थी। इसके बावजूद परियोजना आज तक अमल में नहीं आ पाई है। केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया, विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र तोमर, ऊर्जा मंत्री प्रद्युमन सिंह तोमर सहित कई बड़े नेताओ का इस ओर ध्यान आकर्षित कराया गया मगर इन्हें योजनाओं को लागू कराने के झूठे श्रेय लेने से सायद फुर्सत नहीं !

जमीनी हकीकत यह है कि जिस मार्ग को आधुनिक और सुगम बनाने की बात कही गई थी, वहां आज भी कई हिस्सों में स्थिति ऊबड़-खाबड़ और असुविधाजनक बनी हुई है। लोगों को अब भी उसी पुराने रास्ते से गुजरना पड़ रहा है, जबकि वर्षों पहले उन्हें बेहतर विकल्प का भरोसा दिलाया गया था।

जवाबदेही पर सवाल, नेताओं की ओर उम्मीद

यह स्थिति अब कई सवाल खड़े करती है—जब योजना तैयार थी तो काम शुरू क्यों नहीं हुआ, बजट और स्वीकृति की प्रक्रिया कहां अटकी, और आखिर जिम्मेदार कौन है? VIP सुविधा के नाम पर बनाई गई यह योजना भले ही खास वर्ग के लिए प्रस्तावित थी, लेकिन इसका लाभ पूरे शहर की यातायात व्यवस्था को मिलना था।

लगातार बीतते समय और चुनावों के बावजूद जब जमीन पर कोई बदलाव नजर नहीं आता, तो विकास के दावे खुद सवालों के घेरे में आ जाते हैं। अब यह मुद्दा सीधे तौर पर जनप्रतिनिधियों और संबंधित विभागों के जवाब का इंतजार कर रहा है। जनता की नजरें इस पर टिकी हैं कि आखिर कब यह योजना कागजों से निकलकर हकीकत बनेगी।