ट्रांसफर आदेश ठंडे बस्ते में, अवैध शराब कारोबार पर भी सवाल
भोपाल-इंदौर 4 जुलाई 2026। एक ओर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का गृह नगर उज्जैन प्रदेश का पहला ऐसा बड़ा शहर बन चुका है, जहां शराब की दुकानों को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया है। वहीं दूसरी ओर मुख्यमंत्री के प्रभार वाले जिले इंदौर की तस्वीर बिल्कुल उलट दिखाई दे रही है। अवैध शराब कारोबार, अवैध आहते, अवैध शराब फैक्ट्रियां और खुलेआम सड़कों पर शराबखोरी की घटनाएं लगातार सुर्खियां बटोर रही हैं। इसके बावजूद आबकारी विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लग रहे हैं।
इंदौर के तीन इमली चौराहा, परदेसीपुरा चौराहा, पलसीकर चौराहा, बंगाली चौराहा सहित अनेक स्थानों पर सार्वजनिक सड़कों पर खुलेआम शराब पीने, जाम छलकाने और उससे उत्पन्न ट्रैफिक जाम की खबरें लगातार समाचार पत्रों और सोशल मीडिया में सामने आती रही हैं। सवाल यह है कि आखिर इतनी शिकायतों और लगातार प्रकाशित हो रही खबरों के बावजूद आबकारी विभाग कार्रवाई करने से क्यों बच रहा है?
सबसे बड़ा प्रश्न यह भी है कि क्या लोक बाधा उत्पन्न करने वाली इन अवैध गतिविधियों पर जिला प्रशासन की नजर नहीं पड़ रही, या फिर कार्रवाई जानबूझकर टाली जा रही है?
सहायक आयुक्त पर उठ रहे सबसे गंभीर सवाल
सूत्रों के अनुसार, इंदौर आबकारी विभाग में पर्दे के पीछे एक मजबूत तंत्र सक्रिय है, जिसके संरक्षण में खुलेआम आदेशों की नाफरमानी एवं अन्य अवैध गतिविधियां संचालित होने के आरोप लगाए जा रहे हैं। इन आरोपों के केंद्र में सहायक आबकारी आयुक्त अभिषेक तिवारी का नाम भी लगातार चर्चा में है।
कुछ समय पूर्व इंदौर की पॉश रिहायशी कॉलोनी तुलसी विहार में पकड़ी गई अवैध शराब फैक्ट्री इसका बड़ा उदाहरण मानी जा रही है। उस समय विभाग की ओर से दावा किया गया था कि इस फैक्ट्री के तार अंतरराष्ट्रीय स्तर तक जुड़े हो सकते हैं। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से पूरे मामले में केवल एक व्यक्ति की गिरफ्तारी कर अपेक्षाकृत सामान्य धाराओं में प्रकरण दर्ज किया गया और मामला वहीं ठंडे बस्ते में चला गया। यदि वास्तव में अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क सक्रिय था तो उसके अन्य सदस्यों तक जांच आखिर क्यों नहीं पहुंची? यह प्रश्न आज भी अनुत्तरित है।
16 जून के तबादला आदेश भी नहीं हुए लागू
इंदौर आबकारी विभाग पर सबसे बड़ा सवाल राज्य शासन के 16 जून 2026 के स्थानांतरण आदेशों की अवहेलना को लेकर उठ रहा है। सूत्रों के अनुसार, इंदौर से अन्य जिलों में स्थानांतरित किए गए पांच अधिकारियों को आज तक कार्यमुक्त (रिलीव) नहीं किया गया है। वहीं अन्य जिलों से इंदौर पदस्थ किए गए नौ अधिकारियों को भी अब तक जॉइनिंग नहीं दी गई। जबकि विभाग में कई अधिकारियों को दोहरा प्रभार सौंपे जाने की जानकारी सामने आ रही है।
प्राप्त जानकारी अनुसार छः आबकारी उप निरीक्षकों पर दुहरा प्रभार है, उनमें प्रियंका चौरसिया, आशीष जैन, त्र्यम्बिका शर्मा, सुनील मालवीय, भगवानदास अहिरवार और उप निरीक्षक मीना माल के नाम प्रमुख रूप से शामिल बताए जा रहे हैं। जिला में इन आबकारी अधिकारीयों की पदस्थापना संबंधी आदेशों का पालन कराने की जिम्मेदारी मुख्य रूप से सहायक आयुक्त तिवारी की है।
डेढ़ महीने से अधिक समय से जॉइनिंग का इंतजार
दूसरी ओर अन्य जिलों से इंदौर स्थानांतरित होकर आए अधिकारी 16 जून से अपनी पदस्थापना का इंतजार कर रहे हैं।
इनमें सहायक जिला आबकारी अधिकारी/कार्यवाहक सहायक जिला आबकारी अधिकारी प्रतीक्षा शर्मा, देवेंद्र शर्मा, निधि शर्मा, बबीता शिंदे और आकांक्षा गर्ग शामिल हैं। इसी प्रकार उप निरीक्षक सृष्टि गिरवाल, राजेश वट्टी, आकाश मेश्राम तथा वैशाली भगत भी लंबे समय से जॉइनिंग की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
आखिर किसके भरोसे चल रहा है इंदौर आबकारी विभाग में यह खेल
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि शासन के विधिवत जारी स्थानांतरण आदेशों का भी पालन नहीं हो रहा है तो इसके पीछे किसका संरक्षण है? क्या आबकारी विभाग में समानांतर व्यवस्था काम कर रही है? यदि नहीं, तो फिर शासन के आदेशों को लागू कराने की जिम्मेदारी किसकी है?
जिस जिले की कमान स्वयं मुख्यमंत्री के पास हो, वहां यदि अवैध शराब कारोबार, अवैध आहते, ट्रांसफर आदेशों की अवहेलना और विभागीय मनमानी जैसे आरोप लगातार सामने आ रहे हों, तो यह केवल आबकारी विभाग का नहीं बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र की जवाबदेही का विषय बन जाता है।
अब देखना यह होगा कि राज्य सरकार इन गंभीर सवालों पर संज्ञान लेकर निष्पक्ष जांच कराती है या फिर इंदौर आबकारी विभाग पर उठ रहे सवाल यूं ही फाइलों में दबकर रह जाएंगे।
