मोदी के जन्मदिन पर ‘आशीर्वाद का दीया’ बना पाखंड और घमंड की बहस—सोशल मीडिया कमेंट्स में 90% से ज्यादा प्रतिक्रियाएं विरोध में दिखीं, बिहार की बाढ़ से लेकर एमपी के कांडों तक जनता ने पूछे सवाल
भोपाल। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 17 सितंबर के जन्मदिन पर देशभर में ‘आशीर्वाद का दीया’ जलाने का अभियान भले ही सरकारी मशीनरी, भाजपा संगठन और समर्थक संगठनों की ताकत के सहारे बड़े पैमाने पर चला हो, लेकिन इस चमकदार आयोजन के पीछे सवालों की आग भी कम नहीं थी। मध्यप्रदेश में करोड़ों दीप जलाने से लेकर उज्जैन में 33.27 लाख दीपों के आयोजन तक सत्ता और संगठन ने इसे अभूतपूर्व बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। लेकिन दीपों की संख्या और जनभावना एक ही चीज नहीं होती।
‘युग क्रांति’ द्वारा 17 सितंबर के दौरान प्रधानमंत्री के जन्मदिन और ‘आशीर्वाद का दीया’ अभियान से जुड़े विभिन्न सोशल मीडिया वीडियो, पोस्ट और उनके नीचे आए कमेंट्स के अध्ययन में सामने आया कि बधाई और समर्थन वाली प्रतिक्रियाओं की तुलना में आलोचनात्मक प्रतिक्रियाओं की संख्या कहीं अधिक दिखाई दी। इस अनौपचारिक सोशल मीडिया ऑब्जर्वेशन में करीब 90 प्रतिशत से अधिक कमेंट्स विरोध, व्यंग्य या सवाल खड़े करने वाले नजर आए, जबकि लगभग 5–10 प्रतिशत प्रतिक्रियाएं ही सीधे बधाई अथवा समर्थन के पक्ष में दिखाई दीं।
यह किसी वैज्ञानिक जनमत सर्वे का परिणाम नहीं, बल्कि उपलब्ध सोशल मीडिया पोस्ट और कमेंट्स के हमारे अध्ययन का निष्कर्ष है। लेकिन इसे पूरी तरह नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता, क्योंकि इसी सोशल मीडिया पर अभियान के समर्थन और विरोध दोनों की आवाजें सार्वजनिक रूप से दिखाई देती रहीं।
देवताओं के दीप से जीवित नेता के जन्मदिन तक
सबसे बड़ा सवाल दीप जलाने पर नहीं, बल्कि दीप किसके लिए और किस धार्मिक भाव के साथ जलाया जा रहा है, इस पर उठा। भारतीय परंपरा में दीप का संबंध देव आराधना, मंगलकामना, ज्ञान और आध्यात्मिक प्रकाश से रहा है। ऐसे में एक जीवित राजनीतिक व्यक्ति के जन्मदिन पर देशभर से लोगों से उसके दीर्घायु और स्वास्थ्य की कामना करते हुए सामूहिक रूप से दीप जलाने का आह्वान किए जाने पर सोशल मीडिया से लेकर आम चर्चाओं तक सवाल उठना स्वाभाविक था। हालांकि हमारे देश में बच्चों के जन्मदिन पर भी दीप जलाने का प्रचलन है।
आलोचकों ने इसे व्यक्तिपूजा, पाखंड और राजनीतिक घमंड तक करार दिया। कुछ तीखी प्रतिक्रियाओं में तो यह सवाल भी उठाया गया कि लोकतंत्र में प्रधानमंत्री को जनता का सेवक माना जाता है या ऐसा व्यक्तित्व जिसके लिए धार्मिक प्रतीकों के साथ सामूहिक अनुष्ठान कराया जाए? और यहीं से वह टिप्पणी भी सोशल मीडिया पर चर्चा में आई जिसमें मोदी की तुलना पौराणिक पौंड्रक से करते हुए तंज किया गया कि कहीं सत्ता का अहंकार व्यक्ति को स्वयं को भगवान समझने की दिशा में तो नहीं ले जा रहा।
यह टिप्पणी किसी स्थापित तथ्य का बयान नहीं, बल्कि विरोधी सोशल मीडिया प्रतिक्रियाओं का हिस्सा है। मगर जिस तीखेपन से यह भाषा सामने आई, वह इस अभियान के प्रति लोगों की नाराजगी की तीव्रता जरूर दिखाती है।
सवाल यह भी_आशीर्वाद जनता दे रही है या व्यवस्था?
बिहार में तो यह सवाल और गंभीर रूप में सामने आया। सरकारी स्कूलों सहित विभिन्न संस्थानों में दीप जलाने को लेकर निर्देश और तैयारियां सामने आईं। कुछ रिपोर्टों में स्कूलों के लिए न्यूनतम दीपों की संख्या तक निर्धारित होने की बात सामने आई। विपक्ष और सामाजिक संगठनों ने सवाल उठाया कि क्या सरकारी संस्थानों को प्रधानमंत्री के व्यक्तिगत जन्मदिन समारोह से जोड़ना उचित है?
बिहार की बाढ़ ने इस सवाल को और धार दे दी। जब बड़ी संख्या में लोग बाढ़ और राहत की चिंता में थे, उसी समय ‘आशीर्वाद का दीया’ जलाने की अपीलों पर जनसुराज ने सवाल उठाया कि लोगों को दीयों से ज्यादा राहत और दवाओं की जरूरत है। यानी एक तरफ पानी में डूबता बिहार, दूसरी तरफ प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर दीपोत्सव। सवाल इसलिए उठा कि सत्ता की प्राथमिकता का प्रतीक क्या होना चाहिए—बाढ़ में फंसे नागरिक तक राहत पहुंचाना या प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर दीपों का समुद्र बनाना?
मध्यप्रदेश में करोड़ों दीप, मगर सवाल भी करोड़ों
मध्यप्रदेश में 3.55 करोड़ दीप जलाए जाने का दावा सामने आया। उज्जैन में 33.27 लाख दीपों से शिप्रा के घाट रोशन किए गए और प्रधानमंत्री का चित्र भी दीपों से बनाया गया।लेकिन प्रदेश में उसी समय बालाघाट, इंदौर, सागर सहित अलग-अलग घटनाओं (कांड) और शासन-प्रशासन से जुड़े मुद्दे जनता की चर्चा में थे, जिनमें सैकड़ो जानें गई लिहाजा मातम के दौर में यह समय जवाबदेही का है नाकि दीपोत्सव का!
यहीं से सवाल निकलता है—क्या करोड़ों दीप जलाने से करोड़ों सवाल बुझ जाते हैं? क्या दीपोत्सव प्रशासनिक जवाबदेही का विकल्प हो सकता है? क्या नेता के जन्मदिन पर असाधारण उत्सव जनता की उन समस्याओं को ढक सकता है जिनका समाधान सरकार से अपेक्षित है? और क्या लोकतंत्र में सत्ता के शीर्ष व्यक्ति के इर्द-गिर्द धार्मिक प्रतीकों का इतना बड़ा घेरा बनना भविष्य की राजनीति के लिए एक नई परंपरा स्थापित नहीं कर रहा?
बारिश ने बुझाए कई दीप, मगर सवाल नहीं
दिलचस्प संयोग यह भी रहा कि मध्यप्रदेश, राजस्थान सहित कई इलाकों में दीप प्रज्ज्वलन के निर्धारित समय के आसपास बारिश ने कार्यक्रमों को प्रभावित किया। जहां आयोजक इसे प्रकृति की सामान्य घटना मानेंगे, वहीं सोशल मीडिया पर विरोधियों ने इसे अपने-अपने अंदाज में व्यंग्य का विषय बनाया।
किसी ने कहा—“जब सवालों की बारिश हो रही हो तो दीप कितनी देर टिकेंगे?” किसी ने इसे ‘कुदरत का संदेश’ कहा तो किसी ने महज संयोग। लेकिन तथ्य यही है कि बारिश ने कई जगह आयोजन को प्रभावित किया; हालांकि यह प्रकृति द्वारा अभियान के विरोध के रूप में प्रस्तुत करना एक व्यंग्यात्मक व्याख्या है, प्रमाणित तथ्य नहीं।
बधाई कम या विरोध ज्यादा—बहस यहीं नहीं रुकेगी
प्रधानमंत्री को बधाइयां देने वालों की कमी नहीं थी। भाजपा और उसके समर्थक संगठनों ने पूरे देश में अभियान चलाया और प्रधानमंत्री ने भी ‘आशीर्वाद का दीया’ को जनता के स्नेह की अभिव्यक्ति बताते हुए आभार व्यक्त किया।
लेकिन दूसरी तस्वीर भी उतनी ही स्पष्ट है—बिहार से लेकर राजस्थान तक इस अभियान के प्रशासनिक स्वरूप पर सवाल उठे और सोशल मीडिया पर आलोचना तेज रही। पटना में हुए आयोजन पर सोशल मीडिया प्रतिक्रियाओं में इसे लेकर तीखे व्यंग्य सामने आए।
इसलिए इस पूरे आयोजन को केवल “करोड़ों दीप जले, मोदी के प्रति जनता का प्रेम उमड़ा” कह देना भी तस्वीर का आधा हिस्सा ही होगा। दूसरा आधा हिस्सा वह है जिसमें जनता पूछ रही है—क्या प्रधानमंत्री का जन्मदिन अब राष्ट्रीय धार्मिक उत्सव का रूप लेगा?
क्या किसी जीवित नेता के लिए देव आराधना में प्रयुक्त प्रतीकों का सामूहिक इस्तेमाल लोकतांत्रिक मर्यादा की सामान्य सीमा है? क्या सरकारी मशीनरी और राजनीतिक संगठन की भागीदारी से पैदा हुआ विशाल दृश्य वास्तविक जनसमर्थन का प्रमाण माना जा सकता है?
और सबसे बड़ा सवाल—
सेवक का जन्मदिन या सत्ता-पुरुष का महोत्सव?
लोकतंत्र में प्रधानमंत्री जनता के मत से चुना गया प्रतिनिधि होता है। उसके जन्मदिन पर शुभकामनाएं देना सामान्य नागरिक अधिकार है। लेकिन जब जन्मदिन को सरकारी तंत्र, राजनीतिक संगठन, करोड़ों दीपों और धार्मिक प्रतीकों के विराट प्रदर्शन में बदल दिया जाए, तब सवाल केवल जन्मदिन का नहीं रहता। सवाल सत्ता की संस्कृति का हो जाता है।
दीप चाहे करोड़ों जलें, अगर जनता के मन में सवाल जल रहे हों तो सत्ता की चमक उन सवालों को बुझा नहीं सकती। और 17 सितंबर की रात यही दिखाई दिया—एक तरफ करोड़ों दीपों की रोशनी थी, दूसरी तरफ सोशल मीडिया, नुक्कड़ों और राजनीतिक बहसों में ‘पाखंड’, ‘घमंड’ और ‘व्यक्तिपूजा’ को लेकर उठते सवालों की आग।
अब देखना यह है कि यह दीपोत्सव केवल एक जन्मदिन का आयोजन बनकर रह जाता है या भारतीय राजनीति में व्यक्ति-केंद्रित उत्सव की एक नई परंपरा की शुरुआत के रूप में याद किया जाएगा।
