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क्या नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटना केवल चुनावी रणनीति या संगठन के एक युग का अंत?

ग्वालियर-दतिया, बृजराज सिंह तोमर मध्य प्रदेश की राजनीति में लंबे समय तक प्रभावशाली भूमिका निभाने वाले पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा का विधानसभा उपचुनाव में टिकट कटना केवल एक चुनावी निर्णय नहीं, बल्कि प्रदेश की राजनीति में दूरगामी संदेश देने वाला घटनाक्रम बन गया है। दतिया से लेकर भोपाल और दिल्ली तक राजनीतिक गलियारों में यही सवाल गूंज रहा है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि वर्षों तक पार्टी का मजबूत चेहरा रहे नेता को अचानक चुनावी मैदान से बाहर कर दिया गया।

राजनीति में लंबे समय तक सत्ता और प्रभाव के केंद्र में रहने वाले नेताओं में आत्मविश्वास कभी-कभी अहंकार या दंभ के रूप में भी दिखाई देने लगता है। इतिहास और पौराणिक कथाओं में भी ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं। जिसमें देवताओं के राजा देवराज इन्द्र को अक्सर अहंकार की मूरत के रूप में जाना गया तो फिर यह तो सिर्फ नरों में उत्तम-नरोत्तम है। तो भला इनके व्यक्तित्व में समय के साथ कदापि ऐसी कोई छवि बनी हो तो यह राजनीतिक विश्लेषण का विषय हो सकता है, लेकिन क्या केवल यही किसी ऐसे नेता को किनारे करने का पर्याप्त कारण था, जिसने वर्षों तक संगठन और सरकार दोनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई?

भाजपा की ओर से यह तर्क सामने आया कि संगठन और पार्टी विजिलेंस द्वारा कराए गए अलग-अलग सर्वेक्षणों में नरोत्तम मिश्रा की चुनावी स्थिति कमजोर बताई गई थी और उनके हारने की आशंका जताई गई थी। यदि यही निर्णय का सबसे बड़ा आधार था तो एक स्वाभाविक प्रश्न भी खड़ा होता है। यदि पार्टी के पास इतनी सटीक, विश्वसनीय और लगभग अचूक सर्वे व्यवस्था है कि वह पहले से ही चुनावी परिणामों का सही आकलन कर सकती है, तो फिर प्रत्येक विधानसभा और लोकसभा चुनाव में उसकी सभी सीटों पर जीत क्यों सुनिश्चित नहीं हो पाती? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सर्वेक्षण किसी भी निर्णय का महत्वपूर्ण आधार हो सकते हैं, लेकिन वे अंतिम सत्य नहीं होते। भारतीय राजनीति में अनेक ऐसे चुनाव हुए हैं, जहां मतदाताओं ने सभी पूर्वानुमानों और सर्वेक्षणों को गलत साबित कर दिया।

टिकट कटने के बाद जिस प्रकार दतिया जिले के भाजपा पदाधिकारियों और बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं ने अपने-अपने पदों से इस्तीफे दिए, उसे केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह घटनाक्रम इस बात का भी संकेत देता है कि जिले में संगठन की जो मजबूत संरचना आज दिखाई देती है, उसके निर्माण और विस्तार में नरोत्तम मिश्रा की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यदि किसी नेता के एक निर्णय पर पूरा जिला संगठन इस तरह प्रतिक्रिया देता है, तो यह उसके राजनीतिक प्रभाव और संगठनात्मक पकड़ का भी प्रमाण माना जाएगा। नरोत्तम मिश्रा की एक विशेष पहचान हमेशा उनकी सहज उपलब्धता रही है। डबरा से विधायक बनने के शुरुआती दौर से लेकर आज तक उनका वही पुराना मोबाइल नंबर होना और स्वयं लोगों के फोन उठाना उन्हें आम नेताओं से अलग पहचान देता है। समर्थकों के अनुसार, यही वह गुण है जिसने उन्हें एक जमीनी नेता और कुशल जनप्रतिनिधि के रूप में स्थापित किया।

आशुतोष तिवारी के नामांकन के अवसर पर आयोजित सभा में नरोत्तम मिश्रा का भावुक हो जाना भी पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बना। मंच पर उनकी भावनाएं इतनी प्रबल हो गईं कि मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव को उन्हें संभालकर कुर्सी पर बैठाना पड़ा। इसे केवल व्यक्तिगत भावुकता नहीं माना जा सकता। यह उस नेता की पीड़ा भी हो सकती है, जिसने वर्षों तक जनता के बीच रहकर राजनीति की हो और अचानक स्वयं को चुनावी दौड़ से बाहर पाया हो।

राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी तेज है कि भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व अब राज्यों में अत्यधिक प्रभावशाली क्षेत्रीय नेताओं की बजाय संगठन के प्रति पूरी तरह जवाबदेह नए चेहरों अथवा कठपुतली को अधिक प्राथमिकता दे रहा है। हालांकि इस धारणा की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन नरोत्तम मिश्रा के टिकट कटने के बाद यह बहस पहले से अधिक मुखर हो गई है।

अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या दतिया में यह फैसला केवल एक टिकट परिवर्तन साबित होगा या फिर यह उस राजनीतिक अध्याय का अंत माना जाएगा, जिसने वर्षों तक भाजपा को इस क्षेत्र में मजबूत आधार दिया। इसका अंतिम उत्तर जनता देगी, क्योंकि लोकतंत्र में किसी भी सर्वेक्षण, किसी भी संगठनात्मक आकलन और किसी भी राजनीतिक रणनीति से बड़ा फैसला अंततः मतदाता का ही होता है।