ब्रेकिंग

गुजरात की जहरीली शराब कांड में इंदौर आबकारी विभाग की भूमिका पर सवाल

तुलसी नगर की अवैध फैक्ट्री से उज्जैन कनेक्शन तक जांच क्यों नहीं पहुंची? गुजरात पुलिस के दावे ने खोली मध्यप्रदेश के आबकारी तंत्र की पोल

इंदौर/उज्जैन। गुजरात में कथित नकली और जहरीली शराब से 9 लोगों की मौत तथा 47 लोगों के बीमार होने की घटना ने मध्यप्रदेश के आबकारी तंत्र पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। गुजरात पुलिस का दावा है कि अवैध शराब का कनेक्शन उज्जैन से जुड़ा है। यही दावा अब करीब दो महीने पहले इंदौर के तुलसी नगर में पकड़ी गई अवैध शराब फैक्ट्री की जांच को भी सवालों के घेरे में खड़ा करता है।

युग क्रांति ने करीब दो महीने पहले तुलसी नगर में पकड़ी गई इस अवैध शराब फैक्ट्री को लेकर जो तथ्य सामने रखे थे, उनमें सबसे गंभीर पहलू फैक्ट्री में बड़े पैमाने पर तैयार की जा रही शराब और उसके संभावित सप्लाई नेटवर्क से जुड़ा था। कार्रवाई के दौरान जहरीली शराब और शराब बनाने में इस्तेमाल होने वाली सामग्री मिलने की बात सामने आई थी। मामले में आबकारी विभाग ने एक व्यक्ति को पकड़ा था।

लेकिन इस कार्रवाई का सबसे महत्वपूर्ण सिरा उस समय सामने आया, जब अंदरखाने यह जानकारी सामने आई कि पकड़े गए व्यक्ति ने कथित तौर पर इस अवैध कारोबार के संचालन और बड़े पैमाने पर सप्लाई के लिए उज्जैन से जुड़े एक कथित शराब माफिया की भूमिका बताई थी।

गुजरात पुलिस के दावे ने पुराने मामले को फिर जिंदा किया

अब गुजरात में हुई मौतों के मामले में पुलिस द्वारा शराब का कनेक्शन उज्जैन से जोड़े जाने के बाद सवाल यह है कि क्या इंदौर की तुलसी नगर फैक्ट्री और उज्जैन के कथित शराब नेटवर्क के बीच कोई संबंध था? और इससे भी बड़ा सवाल-क्या तुलसी नगर में तैयार होने वाली अवैध अथवा जहरीली शराब मध्यप्रदेश से बाहर भी भेजी जा रही थी?

यदि ऐसा कोई नेटवर्क था तो इंदौर आबकारी विभाग की जांच तुलसी नगर की फैक्ट्री तक सीमित क्यों रह गई? पकड़े गए व्यक्ति से कथित तौर पर सामने आए उज्जैन कनेक्शन की गहराई से पड़ताल क्यों नहीं हुई? और यदि जांच हुई तो उस जांच का परिणाम क्या रहा?

फैक्ट्री पकड़ी गई, लेकिन सप्लाई चैन का क्या हुआ?

अवैध शराब के किसी ठिकाने को पकड़ना केवल कार्रवाई का पहला चरण है। असली जांच वहां से शुरू होती है कि शराब बनाई किसने, कच्चा माल कहां से आया, पैसा किसने लगाया, माल किसे भेजा गया, परिवहन किस माध्यम से हुआ और अंतिम खरीदार अथवा वितरक कौन था। तुलसी नगर के मामले में यदि बड़े स्तर पर शराब निर्माण और सप्लाई की आशंका थी तो जांच का दायरा केवल फैक्ट्री संचालक तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं माना जा सकता।

विशेषकर तब, जब कथित तौर पर उज्जैन से जुड़े किसी बड़े नेटवर्क का नाम सामने आया हो। यहीं इंदौर आबकारी विभाग और विशेषकर सहायक आयुक्त तिवारी की भूमिका सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण एवं सवालिया हो जाती है।

क्या गुजरात पहुंची शराब का रास्ता इंदौर से होकर गुजरा?

गुजरात में सामने आए मामले में यदि पुलिस की जांच उज्जैन तक पहुंच रही है, तो मध्यप्रदेश के जांच अधिकारियों के लिए तुलसी नगर प्रकरण को दोबारा खंगालना जरूरी हो जाता है।

जांच एजेंसियों को यह पता लगाना चाहिए कि—

  • तुलसी नगर की फैक्ट्री में कितनी शराब तैयार होती थी?
  • तैयार शराब की वास्तविक सप्लाई कहां-कहां होती थी?
  • फैक्ट्री से जुड़े मोबाइल नंबरों और आर्थिक लेन-देन की जांच हुई या नहीं?
  • परिवहन करने वाले लोगों और वाहनों का रिकॉर्ड खंगाला गया या नहीं?
  • पकड़े गए आरोपी से पूछताछ में उज्जैन के जिन लोगों के नाम सामने आए, उन पर क्या कार्रवाई हुई?
  • उज्जैन और इंदौर के बीच इस कथित नेटवर्क की कोई कड़ी मिली या नहीं?
  • क्या मध्यप्रदेश से गुजरात तक शराब पहुंचाने वाला कोई संगठित चैनल सक्रिय था?

इन सवालों के जवाब अब केवल इंदौर नहीं, बल्कि गुजरात में हुई मौतों की जांच के लिहाज से भी महत्वपूर्ण हो गए हैं।

आबकारी विभाग की ‘औपचारिक जांच’ कब खत्म होगी?

सबसे गंभीर सवाल यह है कि तुलसी नगर मामले में कार्रवाई के करीब दो महीने बाद भी यदि जांच औपचारिकताओं में ही उलझी है, तो इसका फायदा किसे मिल रहा है? अवैध शराब का कारोबार किसी एक छोटे ठिकाने से नहीं चलता। इसके पीछे निर्माण, कच्चे माल की व्यवस्था, पैकिंग, परिवहन, वितरण और बिक्री का पूरा नेटवर्क होता है।

ऐसे में केवल एक फैक्ट्री पकड़कर मामला खत्म कर देना अवैध शराब के असली नेटवर्क तक पहुंचने के बजाय उसकी निचली कड़ी पर कार्रवाई करने जैसा होगा। गुजरात की घटना ने अब यही सवाल और तीखा कर दिया है कि कहीं इंदौर की तुलसी नगर फैक्ट्री भी किसी बड़े अंतरराज्यीय नेटवर्क की एक कड़ी तो नहीं थी?

अब इंदौर आबकारी विभाग से जवाब जरूरी

इंदौर की अवैध शराब फैक्ट्रीगुजरात पुलिस के दावे के बाद मध्यप्रदेश के आबकारी विभाग को तुलसी नगर प्रकरण की जांच का रिकॉर्ड सार्वजनिक करना चाहिए। खासतौर पर यह स्पष्ट होना चाहिए कि कथित उज्जैन कनेक्शन की जांच किस स्तर तक हुई और जिस व्यक्ति पर बड़े नेटवर्क से जुड़े होने की बात सामने आई थी, उसके खिलाफ आगे क्या कार्रवाई की गई।

यदि तुलसी नगर फैक्ट्री और गुजरात में हुई मौतों के बीच कोई संबंध नहीं है, तो जांच एजेंसियों को इसे स्पष्ट रूप से सामने रखना चाहिए, लेकिन यदि दोनों मामलों के बीच कोई कड़ी सामने आती है, तो यह केवल अवैध शराब की एक फैक्ट्री का मामला नहीं रहेगा, बल्कि मध्यप्रदेश से दूसरे राज्यों तक जहरीली शराब पहुंचाने वाले संभावित संगठित नेटवर्क का मामला बन जाएगा।

इसलिए अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि गुजरात में जहरीली शराब कहां बनी। सवाल यह भी है कि मध्यप्रदेश में वह शराब बनी तो किसकी निगरानी में बनी, किसने उसे निकलने दिया और उसका नेटवर्क किसने नहीं पकड़ा?तुलसी नगर की फैक्ट्री से उज्जैन तक और उज्जैन से गुजरात तक की संभावित कड़ी की निष्पक्ष और गहन जांच ही इन सवालों का जवाब दे सकती है।