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जौरासी हनुमान मंदिर ट्रस्ट पर गंभीर सवाल, निर्माण से लेकर चढ़ावे तक हिसाब अधूरा!

कलेक्टर को भेजी गई जांच रिपोर्ट में टेंडर, आमसभा की मंजूरी, कुएं की सुरक्षा और ऑडिट पर उठे सवाल; सरकारी एजेंसी से तकनीकी परीक्षण और आय-व्यय की जांच कराने की अनुशंसा

ग्वालियर/डबरा। आस्था के केंद्र जौरासी स्थित श्री हनुमान मंदिर एवं लक्ष्मी मंदिर ट्रस्ट के संचालन और निर्माण कार्यों को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। मंदिर ट्रस्ट के कथित आर्थिक कुप्रबंधन, निर्माण कार्यों में पारदर्शिता की कमी और मंदिर से सटी शासकीय भूमि पर स्थित प्राचीन कुएं को लेकर की गई शिकायत पर हुई प्रशासनिक जांच में कई महत्वपूर्ण बिंदु सामने आए हैं। अनुविभागीय अधिकारी डबरा एवं पंजीयक लोक न्यास दिव्यांशु चौधरी (आईएएस) द्वारा 24 जनवरी 2025 को कलेक्टर ग्वालियर को भेजे गए जांच प्रतिवेदन में निर्माण कार्य का तकनीकी परीक्षण, खर्च का मूल्यांकन, आमसभा की मंजूरी के दस्तावेजों की जांच और सरकारी एजेंसी से आय-व्यय का ऑडिट कराने जैसी अनुशंसाएं की गई हैं।

यह मामला इसलिए भी गंभीर है, क्योंकि मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए जाने वाले दान और चढ़ावे, निर्माण पर खर्च होने वाली राशि तथा सार्वजनिक न्यास की संपत्ति के प्रबंधन से जुड़े सवाल सीधे जनविश्वास से संबंधित हैं। हालांकि, जांच प्रतिवेदन में उठाए गए सवालों और अनुशंसाओं को अंतिम रूप से सिद्ध वित्तीय घोटाला या आपराधिक दोष का निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। इन बिंदुओं पर आगे की कार्रवाई और आधिकारिक निष्कर्ष महत्वपूर्ण होंगे।

टेंडर के बिना निर्माण, खर्च की मंजूरी के दस्तावेज कहां?

जांच प्रतिवेदन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू मंदिर के निर्माण एवं जीर्णोद्धार कार्यों से जुड़ा है। प्रतिवेदन में उल्लेख है कि निर्माण कार्य विधिवत टेंडर प्रक्रिया के माध्यम से नहीं कराया गया। इसके कारण निर्माण की गुणवत्ता और उस पर होने वाले खर्च का पूर्वनिर्धारण नहीं हो सका तथा पारदर्शिता पर सवाल पैदा हुए।

रिपोर्ट में यह भी दर्ज है कि मंदिर के जीर्णोद्धार एवं नवनिर्माण के प्रस्ताव तथा निर्माण पर होने वाले व्यय के लिए आमसभा की पूर्व स्वीकृति के समर्थन में संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए गए। ऐसे में जांच अधिकारी ने इस संबंध में स्पष्टीकरण लेने तथा निर्माण कार्य का तकनीकी परीक्षण एवं मूल्यांकन कराने को उचित बताया है।

अब सवाल है कि निर्माण कार्य पर कुल कितनी राशि खर्च हुई? किस मद से भुगतान किया गया? निर्माण सामग्री की गुणवत्ता किसने जांची? कार्य की लागत तय करने का आधार क्या था? और यदि आमसभा से पूर्व स्वीकृति ली गई थी, तो उसके दस्तावेज जांच के दौरान उपलब्ध क्यों नहीं कराए गए? इन सवालों का जवाब संबंधित अभिलेखों और निष्पक्ष तकनीकी जांच से ही सामने आ सकता है।

चढ़ावे और दान का हिसाब: ऑडिट रिपोर्ट में भी अधूरे दस्तावेज

मंदिर ट्रस्ट की आय-व्यय व्यवस्था भी जांच के केंद्र में रही। शिकायतकर्ता रामजीलाल ने आरोप लगाया था कि श्रद्धालुओं की चढ़ौती, दान और सोने-चांदी की भेंट का पारदर्शी लेखा-जोखा नहीं रखा जा रहा तथा ट्रस्ट की धनराशि के उपयोग में अनियमितताएं हैं।

दूसरी ओर, ट्रस्ट अध्यक्ष की ओर से प्रस्तुत जवाब में कहा गया कि चढ़ावे का दैनिक हिसाब मैनेजर रखता है, दान की रसीदें दी जाती हैं और प्रतिवर्ष चार्टर्ड अकाउंटेंट से ऑडिट कराया जाता है। ट्रस्ट ने यह भी दावा किया कि आय-व्यय का विवरण कार्यकारिणी और साधारण सभा के सामने रखा जाता है।

लेकिन जांच प्रतिवेदन के अनुसार, ट्रस्ट की ओर से वर्ष 2003-04, 2021-22 और 2023-24 की ऑडिट रिपोर्ट प्रस्तुत की गईं, जबकि वर्ष 2003-04 से लगातार सभी वर्षों की ऑडिट रिपोर्ट की प्रतियां उपलब्ध नहीं कराई गईं। इसी आधार पर जांच अधिकारी ने मंदिर और ट्रस्ट की आय-व्यय व्यवस्था का सत्यापन कराने के लिए सरकारी एजेंसी से ऑडिट कराना उचित बताया।

यहीं से सबसे बड़ा सवाल उठता है—जब ट्रस्ट की ओर से नियमित ऑडिट का दावा किया जा रहा है, तो सभी संबंधित वर्षों के दस्तावेज जांच में उपलब्ध क्यों नहीं हुए? मंदिर की वास्तविक आय, निर्माण पर हुआ खर्च, दान की प्राप्ति और भुगतान का मिलान स्वतंत्र जांच में होना चाहिए, ताकि किसी भी प्रकार की अनियमितता की आशंका दूर हो सके।

प्राचीन कुएं पर छत और नया गेट: सुरक्षा का सवाल भी गंभीर

कुए को पाटाशिकायत में मंदिर से लगी शासकीय भूमि के सर्वे क्रमांक 28 पर स्थित प्राचीन कुएं को लेकर भी गंभीर आपत्ति उठाई गई थी। आरोप था कि कुएं को ऊपर से आरसीसी का लेंटर डालकर ढक दिया गया और उसके ऊपर मंदिर का एक अन्य प्रवेश द्वार बना दिया गया, जिससे श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ने पर दुर्घटना का खतरा पैदा हो सकता है।

ट्रस्ट की ओर से जवाब में कहा गया कि कुएं के संबंध में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की ग्वालियर खंडपीठ के प्रकरण डब्ल्यू.पी. 3599/2007 में दिए गए निर्देशों का पालन किया जा रहा है। ट्रस्ट ने आमजन के लिए कूलर, आरओ और पानी की टंकियों की व्यवस्था करने तथा सुरक्षा उपाय किए जाने की बात भी कही।

हालांकि, जांच प्रतिवेदन में दर्ज है कि उच्च न्यायालय के आदेश के बाद तथा वैकल्पिक रास्ता उपलब्ध होने के बावजूद कुएं को ढकने की आवश्यकता क्यों पड़ी, इस बारे में स्पष्ट जवाब नहीं मिला। रिपोर्ट में कुएं के ऊपर बनी आरसीसी छत कमजोर होने की स्थिति में दुर्घटना की आशंका का उल्लेख करते हुए आवश्यक निर्देश देने की अनुशंसा की गई है।

यह केवल निर्माण संबंधी विवाद नहीं, बल्कि श्रद्धालुओं की सुरक्षा और शासकीय भूमि के उपयोग से जुड़ा विषय भी है। प्रशासन को कुएं की वास्तविक स्थिति, उसकी संरचनात्मक मजबूती, भूमि के स्वामित्व और संबंधित न्यायालयीन आदेशों के अनुपालन का तकनीकी सत्यापन कराना चाहिए।

शिकायतकर्ता के आरोप और ट्रस्ट का जवाब आमने-सामने

ग्राम जौरासी निवासी रामजीलाल ने मध्य प्रदेश लोक न्यास अधिनियम की धारा 26 के तहत आवेदन देकर ट्रस्ट के संचालन, निर्माण कार्यों और आर्थिक पारदर्शिता पर सवाल उठाए थे। उन्होंने वर्तमान कार्यकारिणी को भंग करने, अंतरिम समिति नियुक्त करने, बैंक खातों के संचालन पर रोक लगाने, निर्माण संबंधी दस्तावेजों एवं लेखा-जोखा की जांच कराने तथा जिम्मेदार पदाधिकारियों के विरुद्ध आपराधिक कार्रवाई की मांग की थी।

ट्रस्ट अध्यक्ष सुरेश चतुर्वेदी की ओर से प्रस्तुत जवाब में आरोपों को निराधार बताया गया। उनका पक्ष था कि ट्रस्ट का संचालन कार्यकारिणी के सर्वसम्मत निर्णयों के अनुसार हो रहा है, निर्माण कार्य आमसभा एवं कार्यकारिणी की स्वीकृति से कराया गया, ग्राम पंचायत से अनुमति ली गई और खर्च का हिसाब व ऑडिट रिकॉर्ड उपलब्ध हैं। ट्रस्ट की ओर से यह भी कहा गया कि शिकायतकर्ता कार्यकारिणी का सदस्य नहीं, बल्कि साधारण सभा का सदस्य है और शिकायतें पूर्व विवादों से प्रेरित हैं।

इस प्रकार, शिकायतकर्ता और ट्रस्ट ने अपने-अपने पक्ष में अलग-अलग दावे किए हैं। लेकिन जांच प्रतिवेदन में निर्माण के टेंडर, पूर्व स्वीकृति के दस्तावेज, लगातार वर्षों के ऑडिट रिकॉर्ड और कुएं की सुरक्षा जैसे बिंदुओं पर आगे परीक्षण की आवश्यकता दर्ज होना इस मामले को महज आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रहने देता।

प्रशासन के सामने अब जवाबदेही तय करने की चुनौती

जौरासी मंदिरजांच प्रतिवेदन में मंदिर में दान पात्र के माध्यम से दान लेने और उपयुक्त स्थानों पर सूचना-पट्ट लगाने, दान पेटियों को संबंधित न्यायालयीन आदेश के अनुसार खुलवाने, आय-व्यय में पारदर्शिता सुनिश्चित करने तथा भविष्य में ट्रस्ट का संचालन जिला न्यायालय के 25 अप्रैल 2003 के आदेश और ट्रस्ट के उद्देश्यों के अनुरूप करने की अनुशंसाएं भी की गई हैं।

गौरतलब है कि प्रतिवेदन में ट्रस्ट की पूरी कार्यकारिणी को भंग करने या आर्थिक गबन को सिद्ध घोषित करने के बजाय विशिष्ट बिंदुओं पर स्पष्टीकरण, तकनीकी परीक्षण, मूल्यांकन और सरकारी एजेंसी से ऑडिट कराने की जरूरत रेखांकित की गई है। इसलिए अब कलेक्टर एवं संबंधित लोक न्यास प्राधिकारी की भूमिका अहम है।

बड़ा सवाल यह है कि क्या निर्माण कार्य की वास्तविक लागत और गुणवत्ता की स्वतंत्र जांच होगी? क्या दान और चढ़ावे का वर्षवार हिसाब सार्वजनिक होगा? क्या प्राचीन कुएं की सुरक्षा और शासकीय भूमि की स्थिति का तकनीकी सत्यापन कराया जाएगा? और यदि जांच में वित्तीय या अन्य अनियमितताएं प्रमाणित होती हैं, तो जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई होगी?

आस्था के केंद्रों का संचालन केवल धार्मिक गतिविधि नहीं, बल्कि सार्वजनिक विश्वास और जवाबदेही से भी जुड़ा है। जौरासी मंदिर ट्रस्ट के मामले में आरोपों का सच दस्तावेजी जांच से सामने आना चाहिए—न किसी को पहले से दोषी ठहराकर, न ही गंभीर सवालों को अनदेखा करके। श्रद्धालुओं के दान और मंदिर की संपत्ति से जुड़े हर रुपये का हिसाब स्पष्ट होना ही जनविश्वास की सबसे बड़ी कसौटी है।

खबर अभी बाकी है..

करोड़ों रुपए खर्च होने के बावजूद महालक्ष्मी मंदिर के हालात, आखिर कहां लगा यह पैसा ? किराएदार बना करोड़पति ?… आगे एपिसोड में