“दागी अफसरों” को संरक्षण देने वाला सिस्टम बेनकाब?
भोपाल/इंदौर/जबलपुर। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के खंडपीठ इंदौर और जबलपुर से सामने आए दो अलग-अलग मामलों ने मध्यप्रदेश के लोक निर्माण विभाग (PWD) की कार्यप्रणाली, पोस्टिंग सिस्टम और राजनीतिक-प्रशासनिक गठजोड़ पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक तरफ गंभीर आरोपों से घिरे अधिकारी को अतिरिक्त प्रभार देने पर हाईकोर्ट ने सरकार से जवाब तलब किया है, तो दूसरी ओर एक महिला इंजीनियर के निलंबन आदेश पर अदालत ने प्रारंभिक तौर पर ही आदेश को “वाग” और नियमविरुद्ध मानते हुए रोक लगा दी।
इन दोनों मामलों ने यह बहस फिर तेज कर दी है कि क्या लोक निर्माण विभाग में पोस्टिंग और प्रभार अब योग्यता या प्रशासनिक आवश्यकता से नहीं, बल्कि “मैनेजमेंट”, दबाव और अंदरूनी संरक्षण तंत्र से तय हो रहे हैं?
“दागी अधिकारी” को अतिरिक्त प्रभार देने पर हाईकोर्ट सख्त
जबलपुर हाईकोर्ट में दायर याचिका में आरोप लगाया गया कि जिन अधिकारी को पीडब्ल्यूडी ब्रिज ज़ोन भोपाल का अतिरिक्त प्रभार दिया गया, वे पहले से गंभीर विभागीय जांचों का सामना कर रहे हैं। याचिका में नए पुलों के ध्वस्त होने, वित्तीय अनियमितताओं और विभागीय कार्रवाई लंबित होने का हवाला दिया गया। न्यायालय ने दिनांक 7.5.2026 को प्रभारी मुख्य अभियंता पीसी वर्मा को हटाने एवं इसका अतिरिक्त प्रभार प्रभारी मुख्य अभियंता संजय मस्के को दिए जाने के आदेश पर स्टे दिया है।
अदालत ने मामले की गंभीरता देखते हुए पीडब्ल्यूडी के प्रमुख सचिव से व्यक्तिगत शपथपत्र मांगा और पूछा कि आखिर 2004 के उस सरकारी सर्कुलर के बावजूद ऐसा निर्णय क्यों लिया गया, जिसमें दागी अधिकारियों को उच्च प्रभार देने पर रोक का उल्लेख है। कोर्ट ने यह भी संकेत दिए कि यदि संतोषजनक जवाब नहीं मिला तो जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई पर विचार किया जा सकता है। साथ ही विवादित आदेश के प्रभाव पर अंतरिम रोक लगाते हुए यथास्थिति बनाए रखने के निर्देश दिए गए।
इंदौर में निलंबन आदेश पर भी कोर्ट की तल्ख टिप्पणी
इधर इंदौर खंडपीठ में इंजीनियर शुश्री गुरुणीत कौर भाटिया द्वारा चुनौती दिए गए निलंबन आदेश पर अदालत ने प्रथम दृष्टया माना कि आदेश में एम.पी. सिविल सर्विसेज नियमों के तहत आवश्यक संतुष्टि स्पष्ट नहीं है और आदेश “वाग” प्रतीत होता है। अदालत ने फिलहाल निलंबन आदेश के प्रभाव पर रोक लगा दी।
सबसे अहम बात यह रही कि राज्य सरकार ने तकनीकी आधार पर याचिका को खारिज करवाने की कोशिश की, लेकिन कोर्ट ने उस आपत्ति को भी दरकिनार कर दिया। इससे यह संदेश गया कि अदालत केवल औपचारिकता नहीं बल्कि प्रशासनिक निर्णयों की मंशा भी देख रही है।
क्या पीडब्ल्यूडी में “पोस्टिंग उद्योग” चल रहा है?
दोनों मामलों को यदि एक साथ देखा जाए तो तस्वीर बेहद चिंताजनक दिखाई देती है। लंबे समय से लोक निर्माण विभाग को लेकर यह आरोप लगते रहे हैं कि यहां मलाईदार पदों, ब्रिज ज़ोन, निर्माण इकाइयों और बड़े प्रोजेक्ट वाले क्षेत्रों में पोस्टिंग के लिए भारी स्तर पर लॉबिंग और सौदेबाजी होती है।
सूत्रों के अनुसार विभाग में कई बार ऐसे अधिकारियों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी जाती हैं जिन पर पहले से शिकायतें या जांच लंबित होती हैं, जबकि ईमानदार या नियमों का पालन करने वाले अधिकारियों को अचानक हटाना, साइडलाइन करना या निलंबित करना आम चर्चा का विषय बन चुका है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि विभागीय सर्कुलर मौजूद हैं, तो उनका पालन कौन कराएगा? और यदि अदालत को हस्तक्षेप कर यह पूछना पड़ रहा है कि “दागी अधिकारी” को अतिरिक्त प्रभार किस नीति के तहत दिया गया, तो फिर विभागीय निर्णय प्रक्रिया की पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।
मंत्री और सरकार की भूमिका पर भी उठे सवाल
इन घटनाओं के बाद राजनीतिक गलियारों में भी चर्चा तेज हो गई है कि आखिर लोक निर्माण विभाग में फैसले किस स्तर पर प्रभावित हो रहे हैं। क्या विभागीय तबादले और प्रभार केवल प्रशासनिक निर्णय हैं, या फिर इनके पीछे कोई बड़ा संरक्षण तंत्र काम कर रहा है?
विपक्ष लगातार आरोप लगाता रहा है कि प्रदेश में ट्रांसफर-पोस्टिंग “उद्योग” बन चुका है। अब जब हाईकोर्ट की टिप्पणियां भी सामने आ रही हैं, तब लोक निर्माण विभाग के मंत्री और शीर्ष प्रशासनिक नेतृत्व पर जवाबदेही का दबाव बढ़ना तय माना जा रहा है।
यदि समय रहते व्यवस्था में सुधार नहीं हुआ तो यह केवल विभागीय विवाद नहीं रहेगा, बल्कि करोड़ों रुपये की सार्वजनिक परियोजनाओं, पुलों की गुणवत्ता और जनता की सुरक्षा से जुड़ा बड़ा प्रश्न बन जाएगा।
