युग क्रांति की खबर पर कलेक्टर ने लिया संज्ञान, एसडीएम के निर्देश पर कार्रवाई के बावजूद नहीं रुका निर्माण
ग्वालियर । कथित भू-माफिया के हौसलों के सामने प्रशासनिक कार्रवाई कितनी प्रभावी है, इसका एक मामला ग्राम कल्याणपुर/मालनपुर, तहसील ग्वालियर ग्रामीण क्षेत्र में सामने आया है। जहां न केवल प्रशासनिक करवाई बार-बार बेअसर हो रही है बल्कि कोर्ट की अवमानना का खेल भी अभी जारी है।
सर्वे क्रमांक 42, 43 मिन से जुड़ा यह मामला इसलिए गंभीर है क्योंकि उपलब्ध राजस्व रिकॉर्ड के अनुसार अनिल सिंह चौहान के खाते में रजिस्ट्री के लिए कोई रकबा शेष नहीं था, यानी रकबा शून्य था। इसके बावजूद करीब 1600 वर्गफुट भूमि की रजिस्ट्री चार लोगों के नाम किए जाने और बाद में इन्हीं खरीदारों द्वारा उमा शर्मा के नाम रजिस्ट्री किए जाने का मामला सामने आया। दोनों चरणों के नामांतरण भी राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज किए गए।
युग क्रांति की खबर के बाद कलेक्टर ने लिया संज्ञान
इस पूरे मामले को युग क्रांति ने प्रमुखता से प्रकाशित किया था। खबर सामने आने के बाद कलेक्टर रुचिका चौहान ने मामले का संज्ञान लेते हुए तत्काल एसडीएम प्रदीप शर्मा को जांच एवं कार्रवाई के निर्देश दिए। कलेक्टर और एसडीएम के निर्देश पर तहसीलदार पुरानी छावनी ने मामले की जांच की हालांकि जांच प्रतिवेदन अभी तक कार्रवाई का रूप नहीं ले पाया, साथ ही विवादित भूमि का मामला ग्वालियर ग्रामीण एसडीएम न्यायालय तक पहुंचा।
एसडीएम न्यायालय ने विवादित भूमि पर उमा शर्मा की ओर से किए जा रहे निर्माण पर स्थगन आदेश पारित किया। राजस्व विभाग द्वारा न्यायालय के आदेश की तामीली भी कराई गई। इसके बावजूद मौके पर निर्माण गतिविधियां बंद नहीं हुईं तो फिर राजस्व अमला हजीरा पुलिस के साथ मौके पर पहुंचा और सख्त हिदायत देकर निर्माण रुकवाया, लेकिन इसके बाद भी निर्माण जारी रहा और आज 13 सितंबर की शाम तक चलता रहा।
स्टे के दौरान छत तक पहुंचा निर्माण, फिर प्रशासन कहां था?

सबसे गंभीर सवाल यह है कि जिस भूमि पर न्यायालय का स्थगन आदेश प्रभावी था, वहां निर्माण कार्य धीरे-धीरे आगे बढ़ता रहा और मामला छत डालने की स्थिति तक पहुंच गया। निर्माण रुकवाने के लिए एसडीएम के निर्देश पर पटवारी दल पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंचा। कार्रवाई की गई या केवल खानापूर्ति हुई—नतीजन_न्यायालय के स्थगन आदेश लगातार अवहेलना जारी रही।
यदि राजस्व विभाग के पास निर्माण रुकवाने, आदेश की तामीली कराने और मौके पर कार्रवाई करने के पर्याप्त प्रमाण मौजूद हैं, तो फिर उन्हीं तारीखों के मौके के फोटो-वीडियो और वर्तमान निर्माण की स्थिति का मिलान होना चाहिए। यही तुलना बताएगी कि न्यायालय के स्थगन आदेश के बाद निर्माण वास्तव में रुका था या कार्रवाई केवल दिखावे तक सीमित रही। साथ ही यही प्रमाण साबित करते हैं कि रेस्पोंडेंट उमा शर्मा की ओर से न्यायालय के आदेश की कितनी बार अवमनना हुई?
11 सितंबर की सख्त चेतावनी के बाद भी नहीं रुका निर्माण, 13 सितंबर को छत की ढलाई!
इस मामले में 11 सितंबर को एसडीएम न्यायालय में हुई सुनवाई के दौरान रेस्पोंडेंट उमा शर्मा की ओर से उनके पुत्र उपस्थित हुए थे। सुनवाई के दौरान अनुविभागीय दंडाधिकारी ने उन्हें स्पष्ट और सख्त चेतावनी दी थी कि स्थगन आदेश के दौरान किसी भी प्रकार का निर्माण कार्य नहीं किया जाए तथा आदेश का उल्लंघन होने पर Contempt of Court की कार्रवाई की जा सकती है। लेकिन इस चेतावनी के बाद भी मौके पर निर्माण कार्य बंद नहीं हुआ। इसके विपरीत निर्माण लगातार आगे बढ़ता रहा। 13 सितंबर को निर्माण कार्य जारी रहने और विवादित भूमि पर छत की ढलाई किए जाने की सूचना मिलने के बाद प्रशासन को मौके पर पहुंचकर जमीनी कार्रवाई करनी पड़ी।
प्रशासनिक अमला मौके पर पहुंचा और निर्माण कार्य रुकवाने की कार्रवाई की, लेकिन कार्रवाई की प्रभावशीलता पर सवाल खड़ा करने वाला घटनाक्रम इसके बाद सामने आया। मौके से प्रशासनिक अमला हटने के करीब आधे घंटे बाद ही निर्माण कार्य फिर शुरू हो गया। यानी स्थिति यह है कि एक तरफ एसडीएम न्यायालय का स्थगन आदेश प्रभावी है, 11 सितंबर को न्यायालय स्वयं संबंधित पक्ष को आदेश के उल्लंघन पर कड़ी कार्रवाई की चेतावनी देता है, वहीं दूसरी तरफ निर्माण कार्य बंद होने के बजाय लगातार आगे बढ़ता रहता है और 13 सितंबर को प्रशासनिक कार्रवाई के बाद भी कुछ ही देर में दोबारा शुरू हो जाता है।
अब सवाल यह नहीं कि कार्रवाई हुई या नहीं, सवाल यह है कि कार्रवाई का बेअसर क्यों रही?
इस पूरे घटनाक्रम ने प्रशासन के सामने सबसे बड़ा सवाल यही खड़ा कर दिया है कि यदि न्यायालय के स्थगन आदेश के बावजूद निर्माण लगातार जारी रहता है और प्रशासन की मौके पर हुई कार्रवाई के महज आधे घंटे बाद ही काम फिर शुरू हो जाता है, तो आखिर प्रशासनिक आदेश और न्यायालय के आदेश को जमीन पर लागू कौन कराएगा? एसडीएम शर्मा द्वारा न्यायसंगत करवाई की मंशा आखिरकार कौन रौंद रहा है अन्यथा रेस्पोंडेंट उमा शर्मा की ओर ऐसा लगातार दुस्साहस_ एक बड़ा सवाल है?
राजस्व अमले के पास मौके पर की गई कार्रवाई के प्रमाण हो सकते हैं, लेकिन उन प्रमाणों का वास्तविकता से मिलान मौके पर खड़े निर्माण से किया जाना जरूरी है। कार्रवाई की तारीख, समय, पंचनामा, मौके की तस्वीरें और वीडियो तथा उसके बाद हुए निर्माण की स्थिति को सामने रख दिया जाए तो यह स्पष्ट हो सकता है कि प्रशासन की कार्रवाई वास्तव में कितनी प्रभावी रही।
अब एसडीएम न्यायालय की अगली कार्रवाई पर नजर
11 सितंबर की सुनवाई में न्यायालय द्वारा दी गई स्पष्ट चेतावनी और उसके बाद भी निर्माण जारी रहने की स्थिति में अब निगाहें एसडीएम न्यायालय की अगली कार्रवाई पर टिक गई हैं। 13 सितंबर को जारी निर्माण और छत की ढलाई के दौरान और इससे पहले हुई निर्माण कार्य को रोकने की दो बार की कार्रवाई स्वत: न्यायालय के आदेश की अवमानना साबित करती है।
अब देखना यह होगा कि बार-बार हिदायत और चेतावनी देने वाले एसडीएम न्यायालय के सामने 13 सितंबर की यह जमीनी स्थिति आने के बाद क्या कार्रवाई होती है। क्या केवल मौके पर जाकर निर्माण रुकवाने की औपचारिकता फिर दोहराई जाएगी या फिर न्यायालय के आदेश की लगातार अनदेखी एवं अवमानना के लिए जिम्मेदार पक्ष के विरुद्ध कानून के तहत प्रभावी कार्रवाई होगी?
सवाल सिर्फ निर्माण का नहीं, प्रशासनिक शिकंजे का है
मामला अब केवल एक भूमि की रजिस्ट्री, नामांतरण अथवा निर्माण का नहीं रह गया है। यह सवाल बन चुका है कि क्या ग्वालियर में भू-माफिया के खिलाफ प्रशासन का शिकंजा वास्तव में मजबूत है, या फिर न्यायालय के स्थगन आदेश और प्रशासनिक कार्रवाई के बावजूद निर्माण जारी रहने से यह शिकंजा जमीन पर कमजोर साबित हो रहा है?
यही वे सवाल हैं जो प्रशासन के कथित ‘भू-माफिया के खिलाफ शिकंजा’ अभियान की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े कर रहे हैं। कलेक्टर द्वारा अवैध प्लाटिंग और कॉलोनाइजिंग के खिलाफ अभियान चलाया जा रहा है, लेकिन यदि न्यायालय के स्थगन आदेश के बावजूद विवादित भूमि पर निर्माण छत तक पहुंच जाए और कार्रवाई के बाद भी काम जारी रहे, तो इससे कार्रवाई की गंभीरता और प्रशासनिक नियंत्रण दोनों पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
