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सरकारी लैब पर भरोसा नहीं या जांच को महंगा बनाने की कवायद?

ग्वालियर में कई शासकीय प्रयोगशालाएं मौजूद, फिर भी सचिन तेंदुलकर मार्ग की निर्माण सामग्री की जांच आगरा से कराने पर उठे सवाल!

ग्वालियर। सचिन तेंदुलकर मार्ग उन्नयन कार्य में निर्माण सामग्री की गुणवत्ता को लेकर शुरू हुई जांच अब एक नए विमर्श का कारण बन गई है। सवाल केवल निम्न गुणवत्ता की सामग्री के उपयोग का नहीं, बल्कि उस जांच प्रक्रिया का भी है, जिसमें ग्वालियर की उपलब्ध शासकीय प्रयोगशालाओं की बजाय परीक्षण के लिए नमूने आगरा भेजे जा रहे हैं।

कलेक्टर श्रीमती रुचिका चौहान ने 7 जुलाई 2026 को स्मार्ट सिटी परियोजना के इंजीनियरों को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए स्पष्ट कहा था कि निर्माण कार्य में प्रयुक्त मैनहोल कवर का स्रोत अनुमोदन कार्य प्रारंभ होने से पहले सुनिश्चित नहीं किया गया, साथ ही गुणवत्ता नियंत्रण एवं तकनीकी परीक्षण भी प्रभावी ढंग से नहीं कराया गया। कलेक्टर ने पूरे मामले में निष्पक्ष जांच और निर्माण सामग्री के परीक्षण के निर्देश भी दिए।

सूत्रों के अनुसार इस जांच की जिम्मेदारी सेतु संभाग के प्रभारी कार्यपालन यंत्री जोगेंद्र यादव को सौंपी गई है। यह भी चर्चा है कि निर्माण कार्य में प्रयुक्त कथित निम्न गुणवत्ता वाले मैनहोल कवर की जानकारी कलेक्टर तक इन्हीं के द्वारा पहुंचाई गई।

ग्वालियर की सरकारी लैब पर अविश्वास क्यों?

अब सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया है कि जब ग्वालियर में लोक निर्माण विभाग (PWD/RES), मध्यप्रदेश ग्रामीण सड़क विकास प्राधिकरण (MPRRDA) सहित विभिन्न शासकीय विभागों की परीक्षण प्रयोगशालाएं उपलब्ध हैं एवं एमआईटीएस (MITS) जैसे प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थान की प्रयोगशालाएं भी मौजूद हैं, तो फिर सामग्री की जांच के लिए आगरा का चयन क्यों किया गया? और यदि बड़ी विश्वसनीय की बात थी तो सीपीआरआई/सीएसआईआर द्वारा जांच क्यों नहीं कराई जा सकती !

यदि स्थानीय स्तर पर वही परीक्षण लगभग ₹1 लाख के भीतर संभव है, तो फिर कथित रूप से करीब ₹10 लाख तक का खर्च कर आगरा में परीक्षण कराने की आवश्यकता क्यों महसूस हुई? यह राशि निर्माण एजेंसी वहन करे या ठेकेदार, लेकिन सार्वजनिक परियोजना से जुड़े परीक्षण में अनावश्यक खर्च का औचित्य क्या है?

क्या ग्वालियर की सरकारी लैब निष्पक्ष नहीं हैं?

यह निर्णय कई गंभीर सवाल खड़े करता है—

  • क्या पीडब्ल्यूडी विभाग के सेतु संभाग के जांच अधिकारी को ग्वालियर की अपने मूल विभाग सहित अन्य शासकीय प्रयोगशालाओं की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर भरोसा नहीं है?
  • यदि स्थानीय सरकारी लैब मानकों पर खरी नहीं उतरतीं, तो फिर वे वर्षों से अन्य सरकारी निर्माण कार्यों का परीक्षण किस आधार पर कर रही हैं?
  • यदि भरोसा नहीं है, तो क्या राज्य सरकार को अपनी ही प्रयोगशालाओं की कार्यप्रणाली की समीक्षा नहीं करनी चाहिए?
  • यदि भरोसा है, तो फिर आगरा की निजी या बाहरी लैब को प्राथमिकता देने का आधार क्या है?

‘पसंदीदा लैब’ का मॉडल?

पूरे घटनाक्रम ने चिकित्सा क्षेत्र में प्रचलित उस व्यवस्था की याद दिला दी है, जहां कई बार मरीजों को विशेष पैथोलॉजी लैब में जांच कराने के लिए भेजा जाता है। निर्माण सामग्री की जांच में भी यदि किसी विशेष बाहरी लैब को प्राथमिकता दी जा रही है, तो स्वाभाविक रूप से प्रक्रिया की पारदर्शिता और उद्देश्य पर प्रश्न उठेंगे।

तकनीकी परीक्षण का उद्देश्य या खर्च बढ़ाने का तरीका?

सिविल इंजीनियरिंग के मानकों के अनुसार मैनहोल कवर, कंक्रीट, स्टील, इंटरलॉक, बिटुमिन और अन्य निर्माण सामग्री की गुणवत्ता जांच के लिए निर्धारित भारतीय मानक (BIS/IRC) और स्वीकृत परीक्षण प्रक्रियाएं उपलब्ध हैं। ऐसी जांच सामान्यतः मान्यता प्राप्त सरकारी अथवा NABL मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाओं में कराई जाती है। ऐसे में यदि ग्वालियर में उपलब्ध सक्षम संस्थानों को दरकिनार कर बाहर परीक्षण कराया जा रहा है, तो जांच अधिकारी को इस निर्णय का तकनीकी और प्रशासनिक आधार सार्वजनिक करना चाहिए। इस पर खर्च निर्माण एजेंसी का हो अथवा ठेकेदार का लेकिन फिजूल खर्ची को कम करना अधिकारी की जिम्मेदारी है।

जब जांच का उद्देश्य सच्चाई सामने लाना है, तब जांच प्रक्रिया भी उतनी ही पारदर्शी और तर्कसंगत दिखाई देनी चाहिए, अन्यथा निर्माण सामग्री की गुणवत्ता से अधिक चर्चा जांच की विश्वसनीयता पर होने लगेगी।