नई दिल्ली। देश की राजनीति में एक बार फिर यह बहस तेज हो गई है कि क्या प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) और अन्य जांच एजेंसियां भ्रष्टाचार के खिलाफ निष्पक्ष कार्रवाई के लिए काम कर रही हैं या फिर उनका उपयोग राजनीतिक दबाव और सत्ता विस्तार के साधन के रूप में किया जा रहा है।
हाल के दिनों में पंजाब, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में विपक्षी दलों के सांसदों, विधायकों और प्रमुख नेताओं के टूटकर भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। देशभर में चल रही इस राजनीतिक सियासत ने एक बार फिर उन आरोपों को हवा दी है, जिनमें विपक्ष लंबे समय से केंद्रीय एजेंसियों के दुरुपयोग का आरोप लगाता रहा है।
क्या राजनीतिक दल बदलते ही खत्म हो जाते हैं गुनाह?
राजनीतिक विरोधियों का दावा है कि गंभीर मामलों की जांच और कार्रवाई के भय से घिरे कई नेता सत्ता की छत्रछाया में पहुंचने के बाद अचानक “स्वच्छ” हो जाते हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जो नेता भाजपा में आने से पहले भ्रष्टाचार, मनी लॉन्ड्रिंग अथवा अन्य मामलों के आरोपों से घिरे बताए जाते हैं, वे भाजपा में शामिल होने के बाद राजनीतिक और नैतिक रूप से पाक-साफ कैसे हो जाते हैं?
चुनाव सुधार संस्था एडीआर (Association for Democratic Reforms) की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2014 से 2021 के बीच देशभर में कुल 500 सांसदों और विधायकों ने दल बदला। इनमें सबसे अधिक 173 सांसद और विधायक भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए और यह सिलसिला अभी जोरों पर है। इस प्रकार भाजपा इस अवधि में दल-बदल का सबसे बड़ा लाभार्थी दल बनकर उभरी।
यहां गौर करने वाली बात यह है कि जिन मामलों को लेकर विपक्षी नेताओं के खिलाफ कार्रवाई की आशंका जताई जाती है, वे किसी राजनीतिक दल के खिलाफ नहीं बल्कि देश की जनता और सरकारी तंत्र के खिलाफ कथित भ्रष्टाचार अथवा धोखाधड़ी से जुड़े मामले होते हैं। ऐसे में यदि कोई व्यक्ति वास्तव में दोषी है, तो किसी राजनीतिक दल की सदस्यता उसके खिलाफ लगे आरोपों का स्वतः निस्तारण कैसे कर सकती है?
सत्ता का विस्तार या एजेंसियों का भय ? देश में छिड़ी नई बहस
सीबीआई, ईडी अथवा अन्य केंद्रीय और राज्य स्तरीय एजेंसियां संविधान और कानून के तहत स्थापित संस्थाएं हैं। वे किसी राजनीतिक दल के अनुषांगिक संगठन नहीं हैं कि उनका उपयोग विपक्षी दलों को राजनीतिक रूप से कमजोर करने या सत्ता के विस्तार के लिए किया जाए।
लोकतंत्र में किसी भी दल को अपने संगठन का विस्तार करने का अधिकार है, लेकिन यदि राजनीतिक दल बदलने के साथ ही गंभीर आरोपों से घिरे नेताओं को नैतिक और राजनीतिक क्लीन चिट मिल जाती है, तो इससे जांच एजेंसियों की निष्पक्षता और लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
देश की जनता के बीच अब यह मांग भी उठने लगी है कि केंद्रीय और राज्य स्तरीय जांच एजेंसियों की स्वतंत्रता और जवाबदेही सुनिश्चित की जाए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि वे संविधान और जनता के प्रति उत्तरदायी हैं या फिर किसी राजनीतिक दल के हितों के प्रति।
