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दागियों से दाग-दाग मध्य प्रदेश और लोक निर्माण

वर्षों से प्रमोशन बंद, ‘चालू प्रभार’ बना भ्रष्टाचार का स्थायी दरबार

भोपाल। मध्य प्रदेश में वर्षों से लंबित पड़े प्रमोशन अब केवल प्रशासनिक देरी का मामला नहीं रह गया हैं, बल्कि यह व्यवस्था धीरे-धीरे एक ऐसे “सिस्टम” में बदलती दिखाई दे रही है जिसने विभागों के भीतर योग्यता, वरिष्ठता और पारदर्शिता को लगभग बंधक बना लिया है।

हालांकि मोहन यादव सरकार ने 2025 में वर्षों से लंबित प्रमोशन प्रक्रिया शुरू करने के लिए नई पदोन्नति नीति लागू करने का प्रयास किया था, लेकिन मामला न्यायालय पहुंचने के बाद मध्य प्रदेश हाई कोर्ट द्वारा अंतरिम रोक लगाए जाने से पूरी प्रक्रिया फिर अनिश्चितता में फंस गई, लेकिन इसी बीच विभागों में चालू प्रभार व्यवस्था लगातार फल-फूल रही है, जिसने अब पारदर्शिता और योग्यता आधारित प्रशासन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

स्थिति यह है कि नियमित पदोन्नति नहीं होने के कारण रिक्त पड़े पदों को “चालू प्रभार” के माध्यम से भरा जा रहा है। लेकिन यह व्यवस्था अब अस्थायी प्रशासनिक समाधान कम और कथित तौर पर “गोरखधंधा” अधिक बनती जा रही है।

लोक निर्माण सहित कई विभागों में ऐसे उदाहरण सामने आ रहे हैं जहां पात्रता से निम्नतर अधिकारियों/ कर्मचारियों को ऊंचे पदों के प्रभार सौंपे गए हैं। कुछ मामलों में तो दो-दो और तीन-तीन रैंक नीचे बैठे अधिकारियों को उच्च पदों की कुर्सियां सौंप दी गईं। यह मामला यही तक सीमित नहीं है, पीडब्ल्यूडी में तो एक -एक व्यक्ति को अनेको प्रभार सौंपने का मानो संस्कार बन गया है। इससे न केवल वरिष्ठ और पात्र अधिकारियों/ कर्मचारियों का मनोबल टूट रहा है, बल्कि पूरी प्रशासनिक संरचना की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न खड़े हो रहे हैं।

दरअसल, जानकारों का मानना है कि प्रभार व्यवस्था में सबसे अधिक “विवेकाधिकार” होता है और जहां विवेकाधिकार बढ़ता है, वहीं भ्रष्टाचार की संभावनाएं भी कई गुना बढ़ जाती हैं। नियमित पदोन्नति में जहां सेवा नियम, वरिष्ठता सूची और पात्रता लागू होती है, वहीं प्रभार व्यवस्था में चयन का आधार अक्सर अस्पष्ट बना रहता है। यही कारण है कि विभागों में कथित सेटिंग, लॉबिंग और आर्थिक लेन-देन की चर्चाएं लगातार जोर पकड़ रही हैं। प्रश्न यह भी उठता है कि यदि कोई अधिकारी किसी पद के लिए विधिवत पात्र नहीं है, तो उसे उसी पद के वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार किस आधार पर सौंपे जा रहे हैं? और यदि वही व्यक्ति वर्षों तक प्रभार में बना रहता है, तो फिर नियमित पदोन्नति प्रक्रिया का औचित्य क्या रह जाता है?

प्रभार संस्कृति का सबसे खतरनाक असर यह है कि इससे ईमानदार और योग्य अधिकारी हाशिए पर चले जाते हैं, जबकि “मैनेजमेंट” में माहिर लोग मलाईदार पदों तक पहुंच जाते हैं। परिणामस्वरूप विभागीय कार्यप्रणाली में जवाबदेही कमजोर होती है और भ्रष्टाचार को संस्थागत संरक्षण मिलने लगता है। लोक निर्माण सहित कई विभागों में यह चर्चा आम है कि प्रमोशन न होना अब कुछ लोगों के लिए फायदेमंद व्यवस्था बन चुका है। क्योंकि नियमित पदस्थापना होने पर जहां नियम लागू होंगे, वहीं प्रभार व्यवस्था में मनचाहे व्यक्ति को मनचाहे पद पर बैठाने की गुंजाइश बनी रहती है।

सरकार को यह समझना होगा कि वर्षों तक पदोन्नति रोककर केवल कर्मचारियों का भविष्य ही प्रभावित नहीं होता, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था की रीढ़ भी कमजोर होती है। यदि न्यायालयीय विवाद के समाधान तक सरकार कोई पारदर्शी अंतरिम व्यवस्था नहीं बनाती तो आने वाले समय में “प्रभार संस्कृति” प्रशासनिक व्यवस्था की सबसे बड़ी कमजोरी साबित होगी, जो प्रशासनिक अराजकता और भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा प्रतीक बन सकता है।

प्रमोशन भले कानूनी विवाद में फंसे हों, लेकिन इस खाली जगह में पनप रही “प्रभार व्यवस्था” पर सवाल उठना जरूरी है।