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पाकिस्तान के दो टुकड़े होने की संभावना! पूर्व थल सेना अध्यक्ष जनरल उपेंद्र द्विवेदी के संकेत से गरमाई चर्चा

‘बांग्लादेश का उदय’ पुस्तक विमोचन समारोह में 1971 के युद्ध से लेकर अफगानिस्तान और बलूचिस्तान के हालात तक पर रखे विचार; बोले— इतिहास, कूटनीति और सैन्य रणनीति से समझें बदलते भू-राजनीतिक समीकरण

ग्वालियर, 9 अक्टूबर 2026। पाकिस्तान के भविष्य और दक्षिण एशिया के बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों को लेकर पूर्व थल सेना अध्यक्ष जनरल उपेंद्र द्विवेदी के उद्बोधन में व्यक्त विचारों ने ग्वालियर में आयोजित एक साहित्यिक समारोह को सामरिक विमर्श का केंद्र बना दिया। वरिष्ठ पत्रकार एवं समाजसेवी डॉ. केशव पांडेय की पुस्तक ‘बांग्लादेश का उदय’ के विमोचन समारोह में जनरल द्विवेदी ने पाकिस्तान के दो हिस्सों में बंटने की संभावना की ओर संकेत किए। अपने उद्बोधन में उन्होंने अफगानिस्तान और बलूचिस्तान की मौजूदा परिस्थितियों तथा पाकिस्तान में लगातार जारी घटनाक्रमों के संदर्भ में यह संभावना व्यक्त की। उनके इस कथन ने 1971 के इतिहास और दक्षिण एशिया के भविष्य के बीच एक गंभीर विमर्श खड़ा किया।

समारोह में 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध, बांग्लादेश के जन्म, भारतीय सेना के पराक्रम, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और नेतृत्व की भूमिका पर विस्तार से चर्चा हुई। मुख्य अतिथि जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने कहा कि 1971 की विजय केवल सैन्य सफलता नहीं थी, बल्कि मानवता, न्याय और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा से जुड़ा ऐतिहासिक अध्याय थी। कार्यक्रम की अध्यक्षता कैप्टन वीरेश प्रताप सिंह ने की, जबकि विशिष्ट अतिथि के रूप में कैंसर अस्पताल एवं शोध संस्थान के निदेशक डॉ. बी.आर. श्रीवास्तव उपस्थित रहे।

1971 में बदला था दक्षिण एशिया का भूगोल, क्या इतिहास फिर कोई करवट लेगा?

1971 का भारत-पाकिस्तान युद्ध दक्षिण एशिया के इतिहास की निर्णायक घटनाओं में शामिल है। पूर्वी पाकिस्तान में मानवीय संकट, व्यापक अत्याचारों और शरणार्थियों के भारत पहुंचने से गंभीर परिस्थितियां पैदा हुई थीं। भारतीय सेना के सैन्य कौशल, रणनीतिक तैयारी और राजनीतिक नेतृत्व के फैसलों ने युद्ध की दिशा निर्धारित की। 16 दिसंबर 1971 को पाकिस्तानी सेना के आत्मसमर्पण के साथ बांग्लादेश स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में उभरा।

इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को केंद्र में रखकर डॉ. केशव पांडेय ने अपनी पुस्तक में युद्ध, कूटनीति, सैन्य रणनीति और मानवीय त्रासदी के विभिन्न पहलुओं को प्रस्तुत किया है। विमोचन समारोह में पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बलूचिस्तान के मौजूदा हालात के संदर्भ में व्यक्त विचारों ने इस ऐतिहासिक प्रसंग को समकालीन क्षेत्रीय परिस्थितियों से जोड़ दिया। हालांकि, पाकिस्तान के संभावित विभाजन को लेकर व्यक्त संभावना को जनरल द्विवेदी के विचार के रूप में ही देखा जाना चाहिए; इसे किसी निश्चित घटनाक्रम या आधिकारिक सैन्य आकलन के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।

‘1971 केवल सैन्य विजय नहीं, मानवता और न्याय की रक्षा का अध्याय’

मुख्य अतिथि जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने अपने संबोधन में कहा कि 1971 का वर्ष भारत के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। पूर्वी पाकिस्तान में जनता पर अत्याचार और मानवीय संकट के कारण बड़ी संख्या में लोगों को अपना घर छोड़कर भारत आना पड़ा। भारत ने मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए शरणार्थियों की सहायता की। उस समय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी जटिल परिस्थितियां थीं, लेकिन भारत ने अपनी स्वतंत्र विदेश नीति और राष्ट्रीय हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी।

उन्होंने कहा कि भारतीय सैनिकों ने अदम्य साहस और पराक्रम का परिचय दिया। 16 दिसंबर 1971 को पाकिस्तानी सेना के आत्मसमर्पण के साथ बांग्लादेश का जन्म हुआ। यह केवल भारत की सैन्य विजय नहीं, बल्कि मानवता, न्याय और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा से जुड़ी ऐतिहासिक घटना थी। उन्होंने कहा कि इतिहास हमें सिखाता है कि एकता, साहस, मजबूत नेतृत्व और देशहित के प्रति समर्पण किसी भी चुनौती का सामना करने की शक्ति देते हैं। वीर जवानों के साहस और बलिदान को नमन करते हुए उन्होंने जय हिंद और जय भारत के उद्घोष के साथ अपना संबोधन समाप्त किया।

1971 की विजय से बांग्लादेश का उदय, बदला था दक्षिण एशिया का इतिहास

1971 का भारत-पाकिस्तान युद्ध दक्षिण एशिया के इतिहास की निर्णायक घटनाओं में शामिल है। पूर्वी पाकिस्तान में मानवीय संकट और शरणार्थियों के भारत आने से गंभीर परिस्थितियां पैदा हुईं। भारतीय सेना के पराक्रम और रणनीतिक नेतृत्व के परिणामस्वरूप 16 दिसंबर 1971 को पाकिस्तानी सेना ने आत्मसमर्पण किया और बांग्लादेश के स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में उदय का मार्ग प्रशस्त हुआ। डॉ. केशव पांडेय की पुस्तक ‘बांग्लादेश का उदय’ इसी ऐतिहासिक घटनाक्रम को सैन्य, कूटनीतिक, राजनीतिक और मानवीय दृष्टिकोण से समझने का प्रयास है। समारोह में पाकिस्तान के भविष्य और क्षेत्रीय परिस्थितियों पर व्यक्त विचारों ने 1971 के इतिहास को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया।

डॉ. केशव पांडेय बोले— इतिहास को समझने की कोशिश है ‘बांग्लादेश का उदय’

पुस्तक के लेखक डॉ. केशव पांडेय ने स्वागत भाषण में कहा कि ‘बांग्लादेश का उदय’ केवल एक युद्ध की कहानी नहीं, बल्कि मानवीय पीड़ा, लोकतांत्रिक अधिकारों के संघर्ष, शरणार्थियों की त्रासदी, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और भारतीय नेतृत्व की दूरदृष्टि को समझने का प्रयास है। पुस्तक में 1971 के घटनाक्रम को ऐतिहासिक, सामरिक, कूटनीतिक और मानवीय दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया है।

डॉ. पांडेय ने जनरल उपेंद्र द्विवेदी की उपस्थिति को अपने लिए विशेष सम्मान बताते हुए आभार व्यक्त किया। उन्होंने कार्यक्रम अध्यक्ष कैप्टन वीरेश प्रताप सिंह के साथ अपने दो पीढ़ियों पुराने पारिवारिक संबंधों का उल्लेख किया। साथ ही, पांच दशक लंबी पत्रकारिता और समाजसेवा की यात्रा में ग्वालियर-चंबल की माटी, सहयोगियों, शुभचिंतकों और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े लोगों के योगदान को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने उद्भव सांस्कृतिक उत्सव के माध्यम से ग्वालियर की सांस्कृतिक विरासत को अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहचान दिलाने के प्रयासों का भी उल्लेख किया।

डॉ. पांडेय ने विश्वास व्यक्त किया कि यह पुस्तक पाठकों को अतीत की घटनाओं को जानने के साथ वर्तमान परिस्थितियों को समझने और भविष्य के लिए सीख लेने में भी सहायता करेगी।

कैप्टन वीरेश प्रताप सिंह ने बताया संग्रहणीय कृति

समारोह की अध्यक्षता कर रहे कैप्टन वीरेश प्रताप सिंह ने ‘बांग्लादेश का उदय’ को महत्वपूर्ण और संग्रहणीय कृति बताया। उन्होंने कहा कि 1971 के युद्ध ने सीमित तकनीकी संसाधनों के बावजूद भारतीय सेना के अदम्य साहस, शौर्य और देश के प्रति बलिदान की भावना को इतिहास में दर्ज किया। इस घटनाक्रम ने दुनिया के इतिहास के साथ भूगोल को भी बदल दिया।

उन्होंने कहा कि डॉ. पांडेय की लेखनी ने इस पुस्तक के माध्यम से भू-राजनीतिक विशेषज्ञों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में रुचि रखने वाले पाठकों की जिज्ञासाओं को संबोधित किया है। उन्होंने डॉ. पांडेय की पांच दशक लंबी पत्रकारिता, समाजसेवा और सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से ग्वालियर को वैश्विक पहचान दिलाने के प्रयासों की सराहना की तथा पुस्तक के प्रकाशन पर बधाई दी।

डॉ. बी.आर. श्रीवास्तव ने जनरल द्विवेदी की सैन्य सेवाओं को सराहा

विशिष्ट अतिथि डॉ. बी.आर. श्रीवास्तव ने जनरल उपेंद्र द्विवेदी को मध्य प्रदेश की माटी का गौरव बताते हुए उनके सैन्य जीवन और उपलब्धियों का शायराना अंदाज में उल्लेख किया। उन्होंने जनरल द्विवेदी के कार्यकाल में भारतीय थल सेना की उपलब्धियों, शौर्य, वीरता और आधुनिकीकरण से जुड़े प्रयासों को रेखांकित किया।

डॉ. श्रीवास्तव ने डॉ. केशव पांडेय की लेखन क्षमता, सामाजिक सरोकारों और पांच दशक की पत्रकारिता एवं समाजसेवा यात्रा की सराहना करते हुए कहा कि निरंतर सामाजिक गतिविधियों के बीच लेखन और सृजन के लिए समय निकालना अपने आप में उल्लेखनीय है।

लघु वृत्तचित्र, पुस्तक समीक्षा और पोर्ट्रेट भेंट ने बढ़ाई समारोह की गरिमा

उद्भव सांस्कृतिक एवं क्रीड़ा संस्थान के सचिव दीपक तोमर ने जनरल उपेंद्र द्विवेदी के जीवन, लगभग 42 वर्षों की सैन्य सेवा, महत्वपूर्ण कमान संबंधी जिम्मेदारियों, राष्ट्रीय सुरक्षा, सैन्य आधुनिकीकरण और तकनीकी रूपांतरण में योगदान का परिचय प्रस्तुत किया। जनरल द्विवेदी के सैन्य जीवन और उपलब्धियों पर केंद्रित एक लघु वृत्तचित्र भी प्रदर्शित किया गया।

मंचासीन अतिथियों ने सामूहिक रूप से पुस्तक का विमोचन किया। इसके बाद सेवानिवृत्त ग्रुप कैप्टन राम चंसौरिया ने पुस्तक की समीक्षा प्रस्तुत करते हुए इसके ऐतिहासिक और सामरिक महत्व पर प्रकाश डाला।

समारोह का एक विशेष आकर्षण सुश्री कृतिका चौहान द्वारा बनाया गया जनरल उपेंद्र द्विवेदी का पोर्ट्रेट रहा, जिसे डॉ. केशव पांडेय ने उन्हें भेंट किया। पोर्ट्रेट निर्माण में मार्गदर्शन देने वाले अंशुमान सोनी और प्रोफेसर सामंत सिंह सिंगर भी इस अवसर पर मंच पर उपस्थित रहे।

जनरल द्विवेदी के आगमन पर नवनीत कौशल ने माखनलाल चतुर्वेदी की प्रसिद्ध कविता ‘चाह नहीं मैं सुरबाला के गहनों में गूंथा जाऊं’ का सस्वर संगीतमय गायन किया। आयोजन समिति की युवतियों ने पुष्पवर्षा कर उनका अभिनंदन किया। इसके बाद स्वर्गीय शीतला सहाय के चित्र पर माल्यार्पण और पुष्पांजलि अर्पित की गई तथा दीप प्रज्वलन के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ।

गणमान्य नागरिकों की रही उपस्थिति

समारोह में उद्भव सांस्कृतिक एवं क्रीड़ा संस्थान के सचिव दीपक तोमर, संयुक्त सचिव प्रवीण शर्मा, कोषाध्यक्ष मनोज अग्रवाल, समाजसेवी किशन मुद्गल, वरिष्ठ पत्रकार टी.एन. मनीष, क्रिएटिव हेड अक्षत तोमर, श्रीमती किरण भदौरिया, प्रोफेसर राजरानी शर्मा, संतोष वशिष्ठ, जीवाजी विश्वविद्यालय कार्य परिषद के सदस्य प्रदीप शर्मा, देवेंद्र अहिरवार, भूपेंद्रकांत, वरिष्ठ आईएएस अधिकारी बी.एम. शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार सुरेश सम्राट और साहित्यकार महेश कटारे सहित साहित्य, कला, पत्रकारिता, चिकित्सा, शोध और सामाजिक क्षेत्र से जुड़ी अनेक हस्तियां मौजूद रहीं। इंटरनेशनल सेंटर फॉर मीडिया एक्सीलेंस के सदस्यों ने भी अतिथियों का स्वागत किया। सभी अतिथियों को स्मृति चिह्न भेंट किए गए।

कार्यक्रम का संचालन श्याम सुंदर ओझा ने किया। अंत में उद्भव सांस्कृतिक एवं क्रीड़ा संस्थान के संयुक्त सचिव प्रवीण शर्मा ने अतिथियों और आयोजन में सहयोग देने वाले सभी लोगों के प्रति आभार व्यक्त किया। राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के साथ समारोह का समापन हुआ।