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अवैध चिमनियों पर प्रशासन की चुप्पी सवालों के घेरे में, मिलीभगत के संकेत?

एक साल पहले बंद कराने के निर्देश, फिर भी धड़ल्ले से जारी अवैध ईंट उद्योग

ग्वालियर, 22 अप्रैल 2026। शहर में वायु प्रदूषण को लेकर बैठकों में चिंता जताने वाला प्रशासन अब खुद कठघरे में नजर आ रहा है। एक ओर कलेक्टर मैडम विभागीय अधिकारियों के साथ समीक्षा बैठकों में वायु गुणवत्ता सुधार की बात करती हैं, वहीं दूसरी ओर जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट दिखाई दे रही है।

ग्वालियर के वार्ड 63 स्थित महू-जमाहर क्षेत्र और आसपास के इलाकों में दर्जनों अवैध चिमनियां खुलेआम संचालित हो रही हैं। इन चिमनियों के माध्यम से बड़े पैमाने पर ईंट निर्माण का अवैध कारोबार जारी है, जिससे न केवल पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है बल्कि प्रशासनिक निष्क्रियता भी उजागर हो रही है।

एक साल पहले जारी हुआ था बंद करने का आदेश

गंभीर बात यह है कि “21 मार्च 2025 को ही प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के ग्वालियर क्षेत्रीय कार्यालय द्वारा कलेक्टर, नगर निगम कमिश्नर, एसडीएम और जिला खनिज अधिकारी सहित संबंधित विभागों को स्पष्ट रूप से पत्र लिखकर खुशालीराम प्रजापति और रोहित प्रजापति की अवैध चिमनी बंद कराने के निर्देश” दिए गए थे।

इससे साफ होता है कि मॉनिटरिंग एजेंसी ने अपनी जिम्मेदारी निभाई, लेकिन जिन विभागों पर कार्रवाई की जिम्मेदारी थी, उन्होंने या तो जानबूझकर अनदेखी की या फिर कार्रवाई से दूरी बना ली।

100 से ज्यादा अवैध चिमनियां, कार्रवाई अब भी ‘तैयारी’ में

प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी दुर्ग विजय सिंह ने बताया कि ग्वालियर नगर निगम सीमा सहित जिले अंतर्गत 100 से अधिक अवैध चिमनियों और ईंट भट्टों का इसी प्रकार संचालन हो रहा है। इनमें से लगभग 80–85 के खिलाफ नोटिस जारी करने की तैयारी की जा रही है। उन्होंने कहा कि हमारा काम मॉनिटरिंग का है और जमीनी कार्यवाही क्रियान्वयन का जिम्मा संबंधित विभाग विभाग का है, जिन्हें हम समय-समय पर करवाई बाबत पत्र लिखकर अवगत कराते रहते हैं। साथ ही नियमों के उलंघन करने वालों को नोटिस वगैरा के माध्यम से हिदायत दी जाती है।

वहीं जिला अधिकारी रागिनी यादव ने भी स्पष्ट किया कि नगर निगम सीमा के भीतर इस तरह के चिमनी और ईंट भट्टों का संचालन पूरी तरह प्रतिबंधित है। इस संबंध में खुशालीराम प्रजापति /रोहित प्रजापति की NS फर्म द्वारा संचालित इस अनाधिकृत गतिविधि के बारे में पहले ही प्रशासन को अवगत कराया जा चुका है।

मॉनिटरिंग बनाम कार्रवाई: जिम्मेदारी कौन निभाएगा?

यह पूरा मामला एक गंभीर सवाल खड़ा करता है—जब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने समय रहते सूचना और निर्देश दे दिए थे, तो फिर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

स्पष्ट है कि बोर्ड केवल निगरानी एजेंसी है, जबकि जमीनी कार्रवाई की जिम्मेदारी जिला प्रशासन और नगर निगम की होती है। ऐसे में लंबे समय तक अवैध संचालन जारी रहना मिलीभगत या लापरवाही दोनों ही संभावनाओं को मजबूत करता है।

सबसे बड़ा सवाल अब यह है कि मामला सामने आने के बाद भी क्या संबंधित अधिकारी चुप्पी साधे रहेंगे, या फिर अपने दायित्वों का निर्वहन करते हुए ठोस कार्रवाई करेंगे? क्योंकि अगर कार्रवाई नहीं होती, तो यह केवल प्रदूषण का नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही और सुशासन का भी बड़ा मुद्दा बन जाएगा।