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आईआईटी बॉम्बे का प्रशिक्षण या भ्रष्टाचार पर पर्दा? मध्य प्रदेश के लोक निर्माण विभाग पर उठे बड़े सवाल

नियुक्ति से निर्माण तक यदि भ्रष्टाचार हावी है, तो केवल तकनीकी प्रशिक्षण से कैसे सुधरेगी गुणवत्ता?

भोपाल। मध्य प्रदेश सरकार ने दावा किया है कि लोक निर्माण विभाग (PWD) के अभियंताओं को भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) बॉम्बे में अत्याधुनिक तकनीकी प्रशिक्षण दिया जा रहा है, जिससे प्रदेश में गुणवत्तापूर्ण, सुरक्षित और आधुनिक अधोसंरचना निर्माण को नई गति मिलेगी।

लेकिन इस दावे के साथ ही एक बड़ा सवाल भी खड़ा हो गया है। यदि विभाग में नियुक्ति से लेकर पदस्थापना तक भ्रष्टाचार के आरोप लगातार सामने आते रहे हैं, और निर्माण कार्यों में कमीशनखोरी की शिकायतें आम हैं, तो क्या केवल प्रशिक्षण से व्यवस्था बदल जाएगी?

विभाग का कमीशन चार्ट

सूत्रों एवं ठेकेदारों की माने तो वर्क एडजस्टमेंट और विधायक/ सांसद निधि के कार्यों के अतिरिक्त_ सामान्यतः लोक निर्माण विभाग के अंतर्गत ठेकेदारों पर लागू होने वाला कमीशन इस प्रकार है।

उपयंत्री: 3-5%, सहायक यंत्री 3%, कार्यपालन यंत्री:2% और ऑफिस: 2%
* कुल कमीशन 10 से 12% (आंशिक परिवर्तनशील)

यदि जमीनी कार्य किए बिना MB पर कार्य चढ़ाते हुए जब बिल बनाया जाता है तो इस एडजस्टमेंट के आधार पर अलग कमीशन (%भागफल फार्मूला) अप्लाई होता है  और विधायक/ सांसद निधि के कार्यों पर लगभग 10% कमीशन अथवा अन्य म्युचुअल अंडरस्टैंडिंग की दरें प्रभावी होती है।

कंपटीशन के दौर में 30-40% से अधिक बिलो राशि पर स्वीकृत कार्य पर जब ठेकेदारों को इतना भारी भरकम कमीशन देना पड़ेगा तो गुणवत्ता की ऐसी तस्वीरें लाजमी है!

विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी तकनीकी संस्थान का प्रशिक्षण तभी प्रभावी होता है, जब उसे लागू करने वाली व्यवस्था पारदर्शी और जवाबदेह हो। यदि निर्माण कार्यों की गुणवत्ता पर तकनीकी मानकों के बजाय कमीशन और प्रभाव का दबाव हावी रहेगा, तो अत्याधुनिक प्रशिक्षण का लाभ भी सीमित रह जाएगा।

‘अंधेर नगरी, चौपट राजा’_ PWD के प्रशिक्षण अभियान पर उठे तीखे सवाल

प्रदेश में समय-समय पर सड़कें, पुल और अन्य निर्माण कार्य समय से पहले क्षतिग्रस्त होने के मामले सामने आते रहे हैं। ऐसे में सवाल यह भी उठ रहा है कि समस्या अभियंताओं के तकनीकी ज्ञान की है या फिर उस व्यवस्था की, जहां गुणवत्ता से अधिक प्राथमिकता कथित तौर पर अन्य हितों को दी जाती है।

विभाग के जानकारों का कहना है कि यदि सरकार वास्तव में अधोसंरचना की गुणवत्ता सुधारना चाहती है, तो केवल प्रशिक्षण कार्यक्रमों पर करोड़ों रुपये खर्च करने के बजाय नियुक्ति प्रक्रिया, पदस्थापना, ठेका प्रणाली, गुणवत्ता परीक्षण और जवाबदेही को पूरी तरह पारदर्शी बनाना होगा। तभी आईआईटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों का प्रशिक्षण वास्तविक परिणाम दे सकेगा।

अंधेर नगरी चौपट राजाफिलहाल विपक्ष और विभागीय जानकारों के बीच यह चर्चा तेज है कि जब मूल समस्या व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार बताई जा रही है, तब केवल प्रशिक्षण को “नई गति देने वाला कदम” बताना वास्तविकता से कितना मेल खाता है। मध्य प्रदेश की वर्तमान व्यवस्था पर लोगों के बीच प्रचलित यह कहावत भी बार-बार सुनाई दे रही है_ “अंधेर नगरी, चौपट राजा।”

हालांकि, सरकार का पक्ष है कि अभियंताओं का क्षमता विकास (Capacity Building) भविष्य में बेहतर गुणवत्ता वाले निर्माण कार्यों में सहायक होगा। अब यह देखने वाली बात होगी कि यह प्रशिक्षण धरातल पर गुणवत्ता सुधारने में कितना सफल होता है, या फिर यह केवल सरकारी दावों तक ही सीमित रह जाता है।