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आरक्षण : वोटों की राजनीति या मानसिक निर्भरता की ओर बढ़ता समाज? : बृजराज सिंह

भारतीय संविधान ने सामाजिक न्याय की भावना को केंद्र में रखकर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा बाद में अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए अनेक विशेष प्रावधान किए। इनका उद्देश्य उन समुदायों को शिक्षा, रोजगार और अवसरों में आगे लाना था जो ऐतिहासिक और सामाजिक कारणों से लंबे समय तक वंचित रहे। इस उद्देश्य पर शायद ही किसी को आपत्ति हो।

लेकिन आज, स्वतंत्रता के लगभग आठ दशक बाद, यह प्रश्न गंभीरता से पूछा जाना चाहिए कि क्या आरक्षण का लगातार विस्तार अपने मूल उद्देश्य तक सीमित रहा है, या वह धीरे-धीरे वोटों की राजनीति का स्थायी माध्यम बन गया है?

मेरा मानना है कि इस विषय पर केवल राजनीतिक या संवैधानिक दृष्टि से नहीं, बल्कि शारीरिक संरचना, मनोविज्ञान और मानवीय विकास के आधार पर भी विचार किये जाने की जरूरत है।

मानव शरीर का एक सामान्य वैज्ञानिक सिद्धांत है कि जिस अंग का जितना अधिक उपयोग किया जाता है, उसका विकास उतना अधिक होता है। जिस अंग का उपयोग कम होता है, उसकी क्षमता अपेक्षाकृत कम विकसित होती है। यही सिद्धांत मस्तिष्क पर भी लागू होता है। शिक्षा व्यवस्था में कठिन विषयों का अध्ययन, गणितीय अभ्यास, विश्लेषणात्मक प्रश्न और प्रतियोगी परीक्षाएं केवल ज्ञान देने के लिए नहीं, बल्कि मस्तिष्क की क्षमता, निर्णय शक्ति और तार्किक सोच को विकसित करने के लिए भी होती हैं।

प्राकृतिक रूप से प्रत्येक मनुष्य का मस्तिष्क मूल संरचना और विकास की क्षमता लेकर जन्म लेता है। किसी भी जाति, वर्ग या समुदाय के लोगों के मस्तिष्क की मूल जैविक संरचना अलग नहीं होती। क्षमता का विकास अवसर, शिक्षा, अभ्यास, वातावरण और व्यक्तिगत परिश्रम से होता है।

यहीं से मेरा प्रश्न प्रारंभ होता है..

यदि किसी व्यवस्था में एक वर्ग को लगातार कम अंकों पर प्रवेश, कम प्रतिस्पर्धा में चयन या अन्य प्रकार की स्थायी रियायतें मिलती रहें, तो क्या इससे उस वर्ग के भीतर समान स्तर की प्रतिस्पर्धा के लिए आवश्यक मानसिक अभ्यास कम नहीं होगा? क्या यह व्यवस्था अनजाने में आत्मनिर्भरता की बजाय निर्भरता की भावना को बढ़ावा नहीं देती?

यह तर्क किसी व्यक्ति या समुदाय की क्षमता पर प्रश्न नहीं उठाता। इसके विपरीत मेरा मानना है कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़ा वर्ग अथवा सामान्य वर्ग—सभी मनुष्यों की बौद्धिक क्षमता का आधार समान है। यदि अवसर, शिक्षा और संसाधन समान हों तो कोई भी वर्ग केवल अपनी जाति के कारण पीछे रहने के लिए अभिशप्त नहीं है।

यही कारण है कि यह प्रश्न उठाना आवश्यक है कि क्या नेताओं ने यह मान लिया है कि कुछ वर्ग बिना स्थायी छूट के कभी प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाएंगे? यदि ऐसा है तो क्या यह उन वर्गों की क्षमता का सम्मान है या फिर उनकी योग्यता पर स्थायी संदेह? किसी को शारीरिक (मानसिक) क्षमता को पूर्वाग्रह के आधार पर कम आंकना_ मनुष्य की प्राकृतिक अवधरणा एवं संरचना के अनुरूप नहीं है। यह सामाजिक न्याय के बहाने एक मानसिक अन्याय है!

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भी विद्यार्थियों में आलोचनात्मक चिंतन (Critical Thinking), समस्या समाधान (Problem Solving), नवाचार (Innovation) और प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता विकसित करने पर विशेष बल देती है। विश्व के अधिकांश विकसित देशों में भी शिक्षा और रोजगार का प्रमुख आधार योग्यता, कौशल और प्रतिस्पर्धा को माना जाता है। ऐसे में यह विचार करना स्वाभाविक है कि क्या भारत को भी अंततः ऐसी व्यवस्था की ओर बढ़ना चाहिए जिसमें प्रत्येक नागरिक अपनी क्षमता के आधार पर आगे बढ़े।

मेरा यह भी मानना है कि किसी भी प्रकार की स्थायी रियायत यदि लंबे समय तक चलती रहे तो वह आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता की बजाय मनोवैज्ञानिक निर्भरता को जन्म दे सकती है। यदि किसी वर्ग के भीतर यह विश्वास बैठ जाए कि सफलता का प्रमुख आधार प्रतिस्पर्धा नहीं बल्कि विशेष प्रावधान हैं, तो यह स्थिति उस वर्ग के दीर्घकालीन हित में नहीं कही जा सकती।

यह लेख किसी वर्ग के विरोध में नहीं है। बल्कि मेरा आग्रह है कि प्रत्येक वर्ग अपने भीतर छुपी वास्तविक क्षमता को पहचाने और यह आत्मविश्वास विकसित करे कि वह किसी भी खुली प्रतियोगिता में अपनी योग्यता, परिश्रम और प्रतिभा के आधार पर सर्वोच्च स्थान प्राप्त कर सकता है। यदि ऐसा आत्मविश्वास विकसित होता है तो वही सामाजिक समरसता, समान अवसर और वास्तविक सामाजिक न्याय की दिशा में सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।

यह विषय भावनाओं का नहीं, बल्कि गंभीर चिंतन, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और राष्ट्रीय हित में खुले विमर्श का है।