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दतिया में दो माह तक खाली रहा जिला आबकारी अधिकारी का पद! चुनाव के दौरान पड़ोसी जिले के भरोसे चला सिस्टम, बारोड़ पर कार्रवाई की मांग

शासन के तबादला आदेश की खुली अवहेलना या विभागीय संरक्षण! आबकारी आयुक्त की कार्यप्रणाली पर भी सवाल

ग्वालियर /दतिया। मध्यप्रदेश आबकारी विभाग एक बार फिर गंभीर प्रशासनिक सवालों के घेरे में है। दतिया में विधानसभा चुनाव जैसे संवेदनशील दौर में क़रीब दो माह तक लगातार जिला आबकारी अधिकारी का पद व्यावहारिक रूप से खाली रहने का मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है। आरोप है कि शासन द्वारा स्थानांतरण आदेश जारी किए जाने और पूर्व पदस्थापना से कार्यमुक्त होने के बावजूद अधिकारी ने नई पदस्थापना पर कार्यभार ग्रहण नहीं किया, जबकि विभाग ने भी समय रहते कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की।

सूत्र अनुसार, शासन ने करीब दो माह पूर्व रामचंद्र बारोड़ का स्थानांतरण 16 जून 2026 को बड़वानी से दतिया कार्यवाहक प्रभारी जिला आबकारी अधिकारी के पद पर किया था। बताया जाता है कि वे अपनी पूर्व पदस्थापना से कार्यमुक्त भी हो चुके थे, लेकिन इसके बाद भी उन्होंने दतिया में पदभार ग्रहण नहीं किया। ऐसे में चुनाव जैसी अत्यंत संवेदनशील अवधि के दौरान दतिया जिले में नियमित जिला आबकारी अधिकारी उपलब्ध नहीं रहा।

चुनाव में शिवपुरी के अधिकारी के भरोसे रही व्यवस्था

सूत्रों के अनुसार, नियमित अधिकारी उपलब्ध न होने पर जिला प्रशासन को शिवपुरी के जिला आबकारी अधिकारी को अतिरिक्त प्रभार देकर चुनावी अवधि में व्यवस्थाएं संचालित करनी पड़ीं। सवाल यह है कि जब शासन का स्थानांतरण आदेश प्रभावी था, तब संबंधित अधिकारी के कार्यभार ग्रहण नहीं करने पर विभाग ने तत्काल अनुशासनात्मक कार्रवाई क्यों नहीं की? क्या शासन के आदेशों की अवहेलना को विभाग ने मौन स्वीकृति दे दी थी?

क्या विभाग जानबूझकर करता रहा इंतजार?

बताया जा रहा है कि इस पूरे मामले की ओर कई बार शासन और आबकारी विभाग का ध्यान आकर्षित किया गया, लेकिन कोई ठोस निर्णय सामने नहीं आया। यदि अधिकारी वास्तव में बिना वैध कारण के पदभार ग्रहण नहीं कर रहे थे, तो उनके विरुद्ध सेवा नियमों के तहत कार्रवाई क्यों नहीं की गई? यह प्रश्न अब विभागीय जवाबदेही पर भी खड़ा हो गया है। बता दें कि इसी आदेश अंतर्गत स्थानांतरित हुए_ बारोड़ के अलावा अन्य सभी अधिकारियों ने अपनी अपने नवीन पदस्थापना स्थल पर ज्वाइन कर लिया है।

आखिरकार विभाग में आयुक्त दीपक सक्सेना और प्रमुख सचिव अमन राठौर की भूमिका क्या है जो विभाग में इस कदर मनमानी और नाफरमानी सरेआम चल रही है!

अब उठी निलंबन और विभागीय जांच की मांग

चुनावी प्रक्रिया समाप्त होने के बाद अब मांग तेज हो गई है कि पूरे मामले की निष्पक्ष विभागीय जांच कराई जाए। यदि जांच में यह सामने आता है कि संबंधित अधिकारी की अनुपस्थिति के कारण जिला प्रशासन को दूसरे जिले के अधिकारी से काम चलाना पड़ा, तो उनके विरुद्ध तत्काल निलंबन सहित कठोर विभागीय कार्रवाई की जाए।

यद्यपि प्रशासनिक व्यवस्था और ढांचे को सुचारू रूप से बरकरा रखने के क्रम में यहां सख्त एक्शन की अनिवार्यता नजर आ रही है, लेकिन यह आयुक्त और प्रमुख सचिव की प्रशासकीय क्षमता और योग्यता पर निर्भर करेगा।

मेडिकल ग्राउंड का दावा है तो मेडिकल बोर्ड से हो परीक्षण

मामले में एक और गंभीर सवाल यह भी उठाया जा रहा है कि यदि अधिकारी मेडिकल ग्राउंड पर अवकाश पर थे और इसी कारण पदभार ग्रहण नहीं कर सके, तो शासन को उनका स्वतंत्र मेडिकल बोर्ड से स्वास्थ्य परीक्षण कराना चाहिए। प्रमुख सचिव वाणिज्यकर से मांग की जा रही है कि वर्तमान स्वास्थ्य स्थिति की आधिकारिक जांच कराई जाए और उसकी रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जाए।

जो व्यक्ति मेडिकल लीव पर हो तो वह आबकारी मुख्यालय के चक्कर भला कैसे लगा सकता है, अर्थात् क्या मेडिकल सर्टिफिकेट फर्जी तरीके से बनाया गया यह जांच का विषय है। इसीलिए स्वतंत्र डॉक्टरों की टीम से जाँच करानी चाहिए सरकार को

सरकार की साख से जुड़ा मामला

विभागीय हलकों में  यह चर्चा भी है कि यदि संबंधित अधिकारी अपनी सेवा संबंधी मामलों में लगातार मुख्यालय आ-जा सकते हैं और विभागीय प्रक्रियाओं का पालन कर सकते हैं, तो फिर दतिया में पदभार ग्रहण करने में असमर्थता का कारण क्या था? यह पहलू भी जांच का विषय बनाया जाना चाहिए।

यह मामला केवल एक अधिकारी की अनुपस्थिति तक सीमित नहीं है, बल्कि शासन के आदेशों के पालन, निर्वाचन कार्य प्रणाली की सुव्यवस्था, प्रशासनिक अनुशासन और विभागीय जवाबदेही से भी जुड़ा हुआ है। यदि कोई अधिकारी शासन के आदेशों का पालन न करे और विभाग उसके विरुद्ध समय पर कार्रवाई भी न करे, तो इससे पूरे प्रशासनिक तंत्र की कार्यप्रणाली पर सवाल उठना स्वाभाविक है।