अवैध परिवहन पर कार्रवाई को लेकर विभाग की भूमिका सवालों के घेरे में
कमिश्नर और विभागीय तंत्र पर संरक्षण के आरोप, मंत्री के निर्देशों के पालन को लेकर भी चर्चाएं तेज
भोपाल। मध्य प्रदेश की सड़कों पर बिना बिल, बिना ई-वे बिल और आवश्यक दस्तावेजों के पान मसाला, गुटखा तथा आयरन-स्क्रैप से लदे वाहनों के अवैध परिवहन को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि बड़े पैमाने पर हो रही इस कथित टैक्स चोरी के पीछे प्रभावशाली संरक्षण प्राप्त एक संगठित नेटवर्क सक्रिय है, जिसके कारण विभागीय कार्रवाई प्रभावी नहीं हो पा रही है।
सूत्रों की माने तो वाणिज्यकर मंत्री एवं उपमुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा और प्रमुख सचिव स्तर के दिशा-निर्देश एवं हस्तक्षेप की परवाह किए बिना पूरा वाणिज्य कर विभाग वन मैन आर्मी की तरह आयुक्त द्वारा चलाया जा रहा है।
वाणिज्यकर कर आयुक्त को लेकर चर्चाएं, विभागीय जवाबदेही पर सवाल
सूत्रों के अनुसार, पूरे मामले में वाणिज्य कर आयुक्त अनय द्विवेदी को लेकर भी विभिन्न स्तरों पर चर्चाएं हैं। यह भी दावा किया जा रहा है कि उनका पारिवारिक संबंध मुख्यमंत्री कार्यालय में पदस्थ ओएसडी महेश चौधरी से है। हालांकि, इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
इन चर्चाओं के बीच यह आरोप भी सामने आ रहे हैं कि विभाग के भीतर कुछ अधिकारियों का रवैया ऐसा है कि मंत्री स्तर से दिए जाने वाले निर्देशों का अपेक्षित प्रभाव दिखाई नहीं दे रहा। इसे लेकर विभागीय कार्यप्रणाली और जवाबदेही पर भी सवाल उठ रहे हैं।
राजस्व को लगातार नुकसान पहुंचने की आशंका
आरोप है कि बिना वैध दस्तावेजों के चल रहे वाहनों के कारण राज्य के राजस्व को प्रतिदिन भारी नुकसान हो रहा है। सवाल यह भी उठ रहे हैं कि यदि इस प्रकार का अवैध परिवहन हो रहा है, तो एंटी-इवेजन ब्यूरो और फ्लाइंग स्क्वॉड जैसी एजेंसियों द्वारा अपेक्षित स्तर पर कार्रवाई क्यों नहीं दिखाई दे रही।
जीएसटी प्रावधानों अंतर्गत आने वाली वाहन चेकिंग एवं प्रतिष्ठानों पर छापे की कार्रवाई पर आखिरकार आयुक्त द्विवेदी ने क्यों स्थाई विराम लगा रखा है जबकि यह करवाई न सर्फ टैक्स चोरी रोकती है बल्कि सरकार के राजस्व में भी काफी इजाफा करने में सहायक है। यद्यपि आयुक्त को अपने पूरे जमीनी अमला पर भरोसा नहीं है लेकिन आयुक्त स्वयं भी दूध के धुले नहीं है ऐसा आरोप आधिकारिक गलियारो की चर्चाओं में शुमार है। जहां तक कि ये आरोप इनकी सिंडिकेट के संरक्षक जैसी संदिग्ध भूमिका की ओर इशारा कर रहे हैं! अन्यथा क्या वजह है कि की चेकिंग और छापे जैसी प्रभावशील कार्रवाई पर रोक लगा रखी है।
उठ रहे हैं कई अहम सवाल
- यदि अवैध परिवहन की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं तो बड़े स्तर की कार्रवाई क्यों नहीं हो रही?
- क्या विभागीय निगरानी व्यवस्था प्रभावी है?
- क्या जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाएगी?
- यदि आरोप निराधार हैं, तो विभाग इस संबंध में सार्वजनिक रूप से स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं करता?
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि राज्य के मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव इस पर कब और कैसे संज्ञान लेंगे और सरकार इन आरोपों का संज्ञान लेकर पूरे मामले को गंभीरता से लेती है या नहीं। यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो यह न केवल राजस्व हानि का मामला होगा, बल्कि विभागीय जवाबदेही और सुशासन के दावों की भी बड़ी परीक्षा साबित होगा।
