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भोपाल में तीन बिल्डरों को जेल, भू-माफिया नेटवर्क पर बड़ा प्रहार!

चुनाभट्टी की बेशकीमती सरकारी जमीन बेचने के आरोप में रामनाथ, श्यामनाथ और अश्विनीनाथ शर्मा न्यायिक हिरासत में; 2019 की EOW FIR पर अब हुई बड़ी कार्रवाई, जेपी अस्पताल में भर्ती होने पर भी उठे सवाल

भोपाल। राजधानी भोपाल में सरकारी जमीन की कथित हेराफेरी के मामले में तीन बिल्डरों को न्यायिक हिरासत में भेजे जाने से रियल एस्टेट जगत में हलचल मच गई है। आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW) में वर्ष 2019 में दर्ज धोखाधड़ी के मामले में रामनाथ शर्मा, श्यामनाथ शर्मा और अश्विनीनाथ शर्मा के खिलाफ कार्रवाई हुई है।

मामला चुनाभट्टी क्षेत्र की बेशकीमती सरकारी जमीन को कथित तौर पर निजी संपत्ति बताकर बेचने के आरोपों से जुड़ा है। तीनों को अदालत के आदेश पर न्यायिक हिरासत में भेजा गया है। सवाल यह है कि जिस मामले में वर्षों पहले FIR दर्ज हुई थी, उसमें कार्रवाई की नौबत अब क्यों आई?

सरकारी जमीन को निजी बताकर बेचने का आरोप

मामले में आरोप है कि जमीन के कारोबार से जुड़े लोगों ने सहकारी समितियों के माध्यम से कम रकबे का डायवर्सन कराकर चुनाभट्टी क्षेत्र की सरकारी जमीन को निजी संपत्ति के रूप में बेचने की कोशिश की या उसे बेच दिया। इस कथित लेन-देन से शासन को आर्थिक नुकसान और खरीदारों के साथ धोखाधड़ी होने की आशंका जताई गई है। हालांकि, जमीन का वास्तविक रकबा, कथित बिक्री की कुल कीमत और शासन को हुए नुकसान की प्रमाणित राशि सामने आने पर ही घोटाले का पूरा वित्तीय पैमाना स्पष्ट होगा।

रामनाथ शर्मा, श्यामनाथ शर्मा और अश्विनीनाथ शर्मा का नाम हरेकृष्ण कॉलोनाइजर और जानकी बिल्डर से जुड़ा बताया गया है। EOW ने वर्ष 2019 में इस मामले में FIR दर्ज कर जांच शुरू की थी। अब तीनों को न्यायालय में पेश किए जाने के बाद न्यायिक हिरासत में भेजने की कार्रवाई हुई है।

छह साल पुरानी FIR, अब जेल की नौबत

इस मामले का सबसे अहम पहलू जांच और कार्रवाई के बीच बीता लंबा समय है। वर्ष 2019 में FIR दर्ज होने के बाद अब आरोपियों को जेल भेजे जाने की कार्रवाई सामने आई है। इससे जांच की प्रगति, साक्ष्य जुटाने की प्रक्रिया और अब तक हुई कार्रवाई पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

क्या जांच के दौरान जमीन के स्वामित्व संबंधी दस्तावेजों, राजस्व रिकॉर्ड, डायवर्सन आदेशों, सहकारी समितियों के रिकॉर्ड और बिक्री से जुड़े दस्तावेजों की पूरी पड़ताल की गई? क्या कथित लेन-देन से जुड़े सभी लाभार्थियों और अन्य संभावित जिम्मेदार लोगों की भूमिका भी जांच के दायरे में है? इन सवालों का जवाब EOW की विस्तृत जांच और आधिकारिक रिकॉर्ड से ही सामने आ सकेगा।

जेल वारंट के बाद जेपी अस्पताल में भर्ती, सुविधाओं पर सवाल

सूत्र एवं स्रोतों के मुताबिक, न्यायिक हिरासत के आदेश के बाद तीनों आरोपियों को भोपाल के जेपी अस्पताल में भर्ती कराया गया। उनकी तबीयत बिगड़ने की बात सामने आई, जबकि अस्पताल में कथित तौर पर विशेष सुविधाएं दिए जाने को लेकर भी सवाल उठे।

रिपोर्टों में स्वास्थ्य संबंधी शिकायतों के आधार पर अस्पताल में भर्ती किए जाने की जानकारी दी गई है। हालांकि, उनकी चिकित्सकीय स्थिति, भर्ती की आवश्यकता और उन्हें दी जा रही सुविधाओं के संबंध में आधिकारिक मेडिकल रिकॉर्ड के बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा। फिर भी यह मामला इस व्यापक सवाल को सामने लाता है कि न्यायिक हिरासत में भेजे गए आरोपियों के मामले में चिकित्सा व्यवस्था और सुरक्षा संबंधी प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है।

अब जांच की अगली कसौटी

तीनों बिल्डरों को न्यायिक हिरासत में भेजा जाना अपने आप में दोषसिद्धि नहीं है। मामले में आरोपों की पुष्टि न्यायिक प्रक्रिया और साक्ष्यों के आधार पर ही होगी। लेकिन सरकारी जमीन की कथित बिक्री से जुड़े इस प्रकरण में अब जांच एजेंसी की जिम्मेदारी और बढ़ गई है।

EOW को यह स्पष्ट करना होगा कि विवादित जमीन का वास्तविक मालिकाना हक किसका था, कथित बिक्री में किन दस्तावेजों का इस्तेमाल हुआ, आर्थिक लाभ किन लोगों तक पहुंचा और यदि किसी सरकारी अधिकारी या अन्य व्यक्ति की भूमिका सामने आती है तो उसके विरुद्ध क्या कार्रवाई की गई।

सवाल सिर्फ तीन बिल्डरों की गिरफ्तारी या न्यायिक हिरासत का नहीं, बल्कि सरकारी जमीन की सुरक्षा और भूमि कारोबार में जवाबदेही का है। यदि सरकारी जमीन को निजी बताकर बेचने के आरोप साक्ष्यों से पुष्ट होते हैं, तो खरीदारों को हुए नुकसान और शासन की संपत्ति की सुरक्षा के सवालों पर भी ठोस कार्रवाई जरूरी होगी। अब निगाहें EOW की आगे की जांच और न्यायालय में होने वाली कार्यवाही पर रहेंगी।