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राजस्व रिकॉर्ड में जमीन शून्य, फिर भी 1584 वर्गफुट की रजिस्ट्री! ग्वालियर में किसके संरक्षण में चला कथित भूमि खेल?

तहसीलदार और पटवारी को पहले ही लिखित शिकायत से किया गया था आगाह, फिर भी हुई रजिस्ट्री, नामांतरण और बैंक से भारी भरकम लोन..

ग्वालियर। मध्यप्रदेश का राजस्व विभाग इन दिनों लगातार विवादों और गंभीर आरोपों के कारण सुर्खियों में है। अब ग्वालियर से सामने आया एक नया मामला न केवल राजस्व व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है बल्कि कथित रूप से अधिकारियों, रजिस्ट्री तंत्र और वित्तीय संस्थानों की भूमिका को भी कटघरे में खड़ा करता है।

आरोप है कि राजस्व रिकॉर्ड में एक फीट भूमि शेष न होने के बावजूद करीब 1584 वर्गफुट भूमि की रजिस्ट्री, नामांतरण और उस पर प्रोजेक्ट लोन तक स्वीकृत कर दिया गया। यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो यह मामला राजस्व प्रशासन के इतिहास के सबसे चौंकाने वाले प्रकरणों में से एक साबित हो सकता है।

यह पूरा मामला ग्वालियर ग्रामीण तहसील (पुरानी छावनी) के ग्राम कल्याणपुर स्थित सर्वे क्रमांक 42 एवं 43 से जुड़ा हुआ है।

आखिर कहां से आ गई अतिरिक्त जमीन?

दस्तावेजों के अनुसार वर्ष 2001-02 में देवी अहिल्याबाई उच्च शिक्षा समिति से कविता अनिल सिंह चौहान एवं कमल सिकरवार ने सर्वे क्रमांक 42 एवं 43 मिन-1 की भूमि समान भागों में क्रय की थी। इस आधार पर घास मंडी निवासी अनिल सिंह चौहान के हिस्से में कुल 0.057 हेक्टेयर (लगभग 6135 वर्गफुट) भूमि आई थी।

तथ्य है कि चौहान ने अपने हिस्से की संपूर्ण भूमि अलग-अलग समय में निम्न व्यक्तियों को विक्रय कर दी—

  • वर्ष 2002-03 में सरस्वती देवी पत्नी प्रेम सिंह को 1800 वर्गफुट।
  • वर्ष 2002 में रणधीर सिंह तोमर को 1600 वर्गफुट।
  • वर्ष 2016 में कमला सिकरवार पत्नी आर.एस. सिकरवार को 2800 वर्गफुट।

यानी उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार लगभग 6200 वर्गफुट भूमि (संपूर्ण रकबा) का हस्तांतरण दस वर्ष पहले ही पूर्ण हो चुका था।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब अनिल सिंह चौहान के हिस्से की पूरी भूमि पहले ही विक्रय हो चुकी थी, तो 20 मार्च 2025 को उन्हीं के नाम से 1584 वर्गफुट का एक नया भूखंड आखिर कहां से प्रकट हो गया?

एक साल में दो बार बिकी वही जमीन !

दस्तावेज बताते हैं कि उक्त भूखंड की रजिस्ट्री ज्योति भदोरिया, प्रियंका भदोरिया, हितेंद्र सिंह एवं धर्मेंद्र यादव के नाम दिनांक 20-3-2025 की गई।

इसके बाद मात्र 11 माह के भीतर ही यही भूमि 12 फरवरी 2026 को उमा शर्मा पत्नी बृजमोहन शर्मा के नाम विक्रय कर दी गई। तदुपरांत आनन-फानन में उक्त भूमि पर प्रोजेक्ट विकसित करने की प्रक्रिया शुरू की गई और पीएनबी हाउसिंग फाइनेंस लि. से भारी भरकम ऋण भी प्राप्त कर लिया गया।

शिकायत पहले, कार्रवाई बाद में भी नहीं!

दस्तावेज

मामले को और गंभीर बनाती है वह शिकायत, जो शिकायतकर्ता रणधीर सिंह तोमर द्वारा 18 फरवरी 2025 में स्वयं पटवारी की उपस्थिति में तहसीलदार पुरानी छावनी/ग्वालियर ग्रामीण को व्यक्तिगत रूप से दी गई थी।

शिकायत में कथित अनियमितताओं की ओर पहले ही ध्यान आकर्षित किया गया था। इसके बावजूद न केवल रजिस्ट्री हुई बल्कि नामांतरण की प्रक्रिया भी पूरी कर दी गई।

यहीं से सवाल उठने लगे हैं कि आखिर शिकायत के बावजूद संबंधित अधिकारियों ने कौन-सी जांच की और किस आधार पर नामांतरण स्वीकृत किया?

पटवारी, तहसीलदार एवं सब-रजिस्ट्रार की भूमिका और पीएनबी हाउसिंग के विधिक परीक्षण पर उठे सवाल

पूरे प्रकरण में ग्राम कल्याणपुर के संबंधित पटवारी और तत्कालीन तहसीलदार की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। साथ ही यह प्रश्न भी चर्चा में है कि सब-रजिस्ट्रार यादव ने रजिस्ट्री से पहले उपलब्ध राजस्व रिकॉर्ड का परीक्षण क्यों नहीं किया? यदि भूमि वास्तव में उपलब्ध नहीं थी तो रजिस्ट्री कैसे हुई?

मामले का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू यह है कि प्रोजेक्ट लोन स्वीकृत करने से पहले वित्तीय संस्था द्वारा सामान्यतः विस्तृत टाइटल सर्च और विधिक परीक्षण कराया जाता है। ऐसी स्थिति में यह सवाल भी उठ रहा है कि ऋण स्वीकृति के लिए प्रस्तुत की गई सर्च रिपोर्ट में क्या तथ्य दर्ज किए गए थे और भूमि स्वामित्व की पुष्टि किस आधार पर की गई?

दो रजिस्ट्रियां, दो सीमाएं, दो तस्वीरें

सूत्रों के अनुसार एक ही भूखंड की एक वर्ष के भीतर हुई दोनों रजिस्ट्रियों में वर्णित चतुरसीमा (बाउंड्री) तथा मौके के फोटोग्राफ में उल्लेखनीय अंतर दिखाई देता है।

इतना ही नहीं, जिस भूमि को रजिस्ट्री दस्तावेजों में रिहायशी भूखंड बताया गया है, वह क्षेत्र टाउन एंड कंट्री प्लानिंग के रिकॉर्ड में औद्योगिक क्षेत्र के रूप में दर्ज बताया जा रहा है।

पूरा मामला सामने आने के बाद निगाहें अब जिला प्रशासन पर टिकी हैं। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या प्रशासन इस कथित भूमि घोटाले की निष्पक्ष जांच कराकर जिम्मेदारों के खिलाफ कार्रवाई करेगा, या फिर राजस्व विभाग, रजिस्ट्री तंत्र और कथित भू-माफिया के गठजोड़ पर पर्दा डाल दिया जाएगा?

यदि शिकायतकर्ता के आरोप और दस्तावेज सही साबित होते हैं तो यह मामला केवल एक फर्जी रजिस्ट्री का नहीं, बल्कि राजस्व रिकॉर्ड, नामांतरण प्रक्रिया, बैंकिंग सत्यापन और प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाने वाला प्रकरण बन सकता है।